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'मजबूत' प्रधानमंत्रियों के साथ समस्या, पढ़ें रामचंद्र गुहा का ये आलेख

रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 20 Sep 2020 05:18 AM IST
इंदिरा गांधी-नरेंद्र मोदी
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प्रधानमंत्री के रूप में इंदिरा गांधी की पहली वाशिंगटन यात्रा से ऐन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने हमारे राजदूत से पूछा था कि उन्हें किस तरह संबोधित करना चाहिए, क्या वह उन्हें 'श्रीमती गांधी' या 'मैडम प्रधानमंत्री' कह सकते हैं? राजदूत ने जवाब के लिए दिल्ली संपर्क किया। प्रधानमंत्री ने संक्षिप्त-सा जवाब भेजा, कि उनके अपने कैबिनेट मंत्री उन्हें 'सर' कहते हैं।

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मुझे यह कहानी पिछले हफ्ते एक दुर्लभ टीवी चैनल द्वारा जीडीपी के आंकड़ों के पतन पर दुर्लभ किस्म का कार्यक्रम आयोजित करने पर याद आ गई। इस बहस के दौरान एक बार तो समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता ने भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता से यही पूछ लिया कि अभी कृषि मंत्री कौन हैं। यह क्षेत्र सर्वाधिक लोगों को रोजगार देता है; सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ता को तो जानना ही चाहिए कि यह क्षेत्र किस मंत्री के प्रभार में है? मगर भाजपा प्रवक्ता को पता नहीं था। त्रासद सच्चाई यह है कि उससे यह अपेक्षा भी नहीं है कि उसे यह पता हो। इस सरकार के प्रदर्शन के लिए सिर्फ एक ही नाम है, 'मोदी! मोदी! मोदी!', ठीक उसी तरह से जैसे 1970 के दशक में कांग्रेसियों के लिए सिर्फ एक नाम अहमियत रखता था, 'इंदिरा! इंदिरा! इंदिरा!'


2013-14 में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत की थी, तो उनकी अपील का एक अहम हिस्सा यह था कि वह मौजूदा 'कमजोर' प्रधानमंत्री की तुलना में 'मजबूत' साबित होंगे। उनका यह आरोप सही था, खासतौर से दूसरे कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह अनिश्चित और ढुलमुल थे, साथ ही कांग्रेस के प्रथम परिवार के प्रति उनका श्रद्धाभाव बढ़ गया था। सितंबर, 2013 में उनकी कमजोरी तब सामने आई, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए आदर्श पसंद हैं, और वह उनके नेतृत्व में काम करके 'खुश' होंगे। उनकी इस टिप्पणी से उनके कार्यालय की प्रतिष्ठा कम हुई थी। उस समय डॉ. सिंह प्रधानमंत्री के रूप में नौ साल से अधिक का समय बिता चुके थे और वह रिजर्व बैंक के गवर्नर के पद पर भी रह चुके थे। जबकि प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी की एकमात्र योग्यता यही थी कि वह सोनिया गांधी के बेटे हैं।

नरेंद्र मोदी ने मनमोहन सिंह की सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित कमजोरी को कुशलतापूर्वक अवसर में बदल दिया। उन्होंने खुद के बारे में कहा, 'छप्पन इंच की छाती।' 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने मजबूत नरेंद्र मोदी और कमजोर मनमोहन सिंह के विरोधाभासों को प्रचारित किया। लेकिन ताकतवर होने की उनकी छवि ने क्या प्रधानमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने में कोई मदद की? ऐसे समय जब देश कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसा लगता है कि नहीं की। इन संकटों के लिए काफी हद तक यह सरकार जिस

तरह से एक व्यक्ति के प्रदर्शन के रूप में चल रही है, उसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसमें कैबिनेट, नौकरशाही, और खुद यह देश उसके सनकी फैसलों का बंधक बन गया है।
शासन की मंत्रिमंडल वाली प्रणाली में प्रधानमंत्री को समान लोगों में प्रथम (फर्स्ट अमंग इक्वल) माना जाता है। मंत्रीगण प्रधानमंत्री के निर्देशों के अधीन काम जरूर करते हैं, लेकिन वे उनके अधीन आने वाली जिम्मेदारियों के लिए सीधे जवाबदेह होते हैं। यह तो हुई सिद्धांत की बात। लेकिन व्यवहार में प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के प्रथम कार्यकाल में किसी भी कैबिनेट मंत्री को किसी तरह की स्वायत्तता नहीं थी। यहां तक कि वित्त मंत्री को भी, जो मोदी के लंबे समय से भरोसेमंद थे, प्रधानमंत्री द्वारा एकतरफा तय की गई बड़ी आर्थिक नीतियों से अलग रखा गया। विदेश मंत्री अनुभवी होने के साथ ही अत्यंत विद्वान राजनीतिक थीं, उन्होंने पाया कि उनकी जिम्मेदारी परेशानी में फंसे भारतीयों की मदद के लिए ट्वीट करने तक रह गई है।
प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के दूसरे कार्यकाल में गृह मंत्री को आंशिक स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन किसी और को नहीं। सारी महत्वपूर्ण नीतियां प्रधानमंत्री कार्यालय में तैयार होती हैं और वही निर्देश देता है। हालांकि यदि कुछ गलत हो जाता है, तो अन्य लोगों पर दोष मढ़ा जाता है, मसलन, विपक्षी पार्टियों की राज्य सरकारें, नेहरू का भूत, उदारवादी, अर्बन नक्सल और जैसा कि हाल में किया गया, खुद भगवान पर।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की केंद्रीकृत तथा आत्म प्रशंसात्मक शैली भाजपा के प्रथम प्रधानमंत्री से एकदम उलट है। अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में शामिल लालकृष्ण आडवाणी, यशवंत सिन्हा, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, प्रमोद महाजन, अरुण शौरी और सुषमा स्वराज इन सभी को अपने कामकाज में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त थी। ऐसा ही जॉर्ज फर्नांडीज और ममता बनर्जी जैसे उन मंत्रियों के साथ था, जो भाजपा से बाहर के थे।

नेतृत्व की यह परामर्शात्मक और सहयोगात्मक शैली निश्चित रूप से एक प्रमुख कारण है कि कुछ प्रमुख मामलों में-अर्थव्यवस्था, विदेश नीति, रक्षा तैयारी, दुनिया में हमारी स्थिति- वाजपेयी के भारत ने मोदी के भारत की तुलना में बहुत बेहतर किया। यह नहीं कहा जा सकता कि एनडीए की पहली सरकार ने कोई गलती नहीं की; मगर ये गलतियां भीषण होतीं, यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया सिर्फ प्रधानमंत्री तक सीमित होती।

जो प्रधानमंत्री सलाह-मशविरा करते हैं, वे एकतरफा फैसला लेने वाले प्रधानमंत्रियों की तुलना में देश के लिए बेहतर होते हैं, यह बात हमारे देश में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू के करियर से पुष्ट होती है। अपने पहले कुछ वर्षों में नेहरू वाजपेयी की तरह थे। उनके मंत्रिमंडल में महान दिग्गज थे, जिनमें प्रधानमंत्री की अपनी कांग्रेस पार्टी से वल्लभभाई पटेल, सी राजगोपालचारी, राजकुमारी अमृत कौर और मौलाना आजाद के साथ ही डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे दूसरी पार्टी से आए शानदार प्रशासक भी शामिल थे। नेहरू ने सहयोगियों का सम्मान कर और उन्हें व्यापक रूप से स्वतंत्रतापूर्वक काम करने की छूट देकर विभाजन के जख्मों को भरने, देश को एक संविधान के नीचे एकजुट करने और बहुदलीय लोकतंत्र की बुनियाद रखने में भारी योगदान दिया। प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के अंतिम कुछ वर्ष उनके खुद के लिए और भारत के लिए हताशा भरे थे। उस समय तक ऐसे सहयोगियों का, जिन्हें वह अपने बराबर मानते थे, या तो निधन हो गया, या वे रिटायर हो गए या फिर विपक्ष में चले गए थे।

उनका मंत्रिमंडल अपेक्षाकृत युवाओं से बना था, जो उनसे पूरी तरह से भिन्न थे। उनसे सवाल करने वाला या चुनौती देने वाला कोई नहीं था। यहां तक कि सलाह देने वाला भी। नतीजतन यह 1959 में केरल की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने और 1962 में चीन से सीमा युद्ध में मिली अपमानजनक हार जैसी महंगी चूक साबित हुआ। 

इंदिरा गांधी की तरह नरेंद्र मोदी अपने मंत्रियों से पूरी श्रद्धा की अपेक्षा रखते हैं। अनेक कैबिनेट मंत्रियों ने प्रधानमंत्री की महानता बताते हुए आलेख लिखे। वाजपेयी ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों से कभी ऐसी अपेक्षा नहीं की। और न ही जवाहरलाल नेहरू ने, यहां तक कि तब भी, जब उन्होंने अपने मंत्रियों से दूरी बनानी शुरू की थी।

नरेंद्र मोदी की खुद की छवि और सार्वजनिक प्रस्तुति एक मजबूत और अधिनायकवादी नेता जैसी है। मनोचिकित्सक हैरत कर सकते हैं कि क्या व्यक्तिगत जीवन में भी वह अपनी सार्वजनिक छवि जैसे हैं। आखिर 56 इंच की छाती वाला कोई शख्स संवाददाता सम्मेलन से बचता है? नोटबंदी और लापरवाही से आगे बढ़ाया गया जीएसटी प्रधानमंत्री के एकतरफा कदम थे। इसी तरह से महामारी की शुरुआत में कड़ाई से लागू किया गया लॉकडाउन भी। इसी तरह से शी जिनपिंग के साथ मोदी ने जो रिश्ता बढ़ाया, वह भारी पड़ा और देश उसकी कीमत चुका रहा है। और यह मोदी ही थे, जिन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारत की तटस्थता को एकतरफा तरीके से छोड़ दिया, जिसकी कीमत देश को चुकानी पड़ सकती है।

मनमोहन सिंह निस्संदेह अपने दूसरे कार्यकाल में कमजोर और ढुलमुल थे। देश ने इसकी कीमत चुकाई। जो लोग यह सोच रहे थे कि कोई अधिनायकवादी नेता देश को मुक्ति दिला सकता है, तो उन्हें अब जवाब मिल गया होगा। यदि प्रधानमंत्री अत्यंत कमजोर हों, तो वे देश के हित के लिए जोखिम साबित हो सकते हैं, यदि प्रधानमंत्री अधिक मजबूत होते हैं, तो वे बड़ा जोखिम साबित हो सकते हैं।

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