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गन्ना किसानों की कौन सुनेगा

Mon, 01 Jul 2013 02:06 PM IST
Updated Mon, 01 Jul 2013 02:06 PM IST
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problems of up sugarcane farmers

शायद किसान अकेला ऐसा उत्पादक है, जो अपने उत्पाद के दाम भी तय नहीं कर पाता। वह भी तब, जब तमाम राजनीतिक दल और सरकारें किसान हितैषी होने का दम भरती हैं। कुछ मामलों में यह बात अपवाद हो सकती है, लेकिन गन्ना किसानों के मामले में तो यह सच्चाई एकदम सही है।

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गन्ना किसानों के मामले केवल दाम तय करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें गन्ने का भुगतान कब और कैसे मिलेगा, यह भी सरकार और चीनी मिलें तय करती हैं। ऐसा नहीं है कि इसके लिए कोई नियम-कानून नहीं है। वे सब हैं, लेकिन उनको लागू करने वाले ही लापरवाह हो जाएं, तो फिर कोई क्या कर सकता है!
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उत्तर प्रदेश के करीब 54 लाख गन्ना किसानों के मामले में ऐसा ही हो रहा है। यही वजह है कि पेराई सीजन समाप्त हो जाने के करीब तीन माह बाद तक चीनी मिलों पर किसानों का करीब पांच हजार करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। अधिकांश चीनी मिलों ने मध्य फरवरी के बाद से आपूर्ति किए गए गन्ने का भुगतान नहीं किया है। लेकिन किसानों का यह संकट उत्तर प्रदेश सरकार के एजेंडा में कहीं नहीं दिखता।
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दूसरी ओर उद्योग के हित में तत्पर केंद्र और राज्य सरकार ने चीनी मिलों की वित्तीय सेहत और कामकाज में आजादी के लिए तमाम फैसले लिए। ये फैसले लेते समय कहा गया कि इससे किसानों को गन्ने का बेहतर दाम मिलेगा।

चीनी मिलों की मदद की शुरुआत केंद्र सरकार ने की। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चैयरमैन सी. रंगराजन की अध्यक्षता में बनी समिति की सिफारिशों के आधार पर देश के चीनी उद्योग को काफी हद तक नियंत्रण मुक्त कर दिया गया है। यह फैसला विगत अप्रैल में लागू भी हो गया।

इसकी अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसमें उद्योग को हर माह जारी होने वाले खुले बाजार की बिक्री कोटा की व्यवस्था समाप्त करने के साथ ही सस्ती कीमत पर राशन के लिए दी जाने वाली 10 फीसदी चीनी की बाध्यता से भी छूट दी गई है। केवल लेवी चीनी की 10 प्रतिशत की अनिवार्यता समाप्त होने से उद्योग को तीन हजार करोड़ रुपये सालाना का फायदा होने का अनुमान है। बाकी लाभ इससे अलग हैं।
 
बात यहीं नहीं रुकी, उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों को चालू पेराई सीजन के लिए गन्ना क्रय कर में छूट दी है। इसके साथ ही शीरे पर लगी पाबंदी हटा दी गई। नई चीनी मिलें लगाने के लिए कई तरह की छूट का ऐलान किया गया।

पेट्रोल में पांच फीसदी एथनॉल मिलाने का प्रावधान भी लागू होना है। इसके लिए चीनी मिलों को एथनॉल की औसत कीमत 40 रुपये लीटर से अधिक मिलेगी, जो चीनी मिलों की आय में इजाफे का नया स्रोत है। चीनी मिलों द्वारा बनाई जा रही बिजली को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने खरीदा है और उसके लिए उसने 800 करोड़ रुपये के जल्द भुगतान का ऐलान किया है।

लेकिन इन सब सहूलियतों के बावजूद चीनी मिलों पर राज्य के गन्ना किसानों का 4,884 करोड़ रुपये का भुगतान बकाया है। जब राज्य सरकार ने गन्ने का दाम तय किया था, तब भुगतान सुनिश्चित करना भी उसकी जिम्मेदारी बनती है।

बात केवल निजी चीनी मिलों तक सीमित नहीं है, राज्य की सहकारी चीनी मिलों पर भी गन्ना किसानों का बकाया है। यह बकाया 500 करोड़ रुपये के आसपास है, जो राज्य सरकार के लिए बहुत बड़ा बोझ नहीं है। बेहतर होता कि राज्य सरकार यह भुगतान कर निजी चीनी मिलों को संदेश देने की कोशिश करती, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 
उत्तर प्रदेश में लगभग 54 लाख किसान गन्ने की खेती करते हैं। किसानों के लिए यह सबसे अहम नकदी फसल है, जिसके सहारे वह परिवार के खर्च से लेकर अपनी तमाम आर्थिक जिम्मेदारियां पूरी करता है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य की अधिकांश चीनी मिलें अप्रैल में बंद हो गईं और गन्ने का भी पूरा भुगतान नहीं मिला।

पूरे एक साल में गन्ने की फसल तैयार होती है, और उसके बाद किसान को छह महीने तक भुगतान का इंतजार करना पड़े, तो इससे बड़ी दिक्कत किसान के लिए क्या होगी। वहीं उसके ऊपर देनदारियां भी हैं। उसके लिए कोई छूट नहीं है। राज्य सरकार और बैंकों के बकाये का तगादा जारी है।

पिछले दिनों बागपत जिले में बैंक के कर्ज के भुगतान को लेकर जब वसूली टीम एक किसान के खेत में पहुंची, तो उससे डरकर ट्रैक्टर लेकर भाग रहे किसान की दर्दनाक मौत हो गई। बकाया भुगतान के चलते किसान किस तरह की दिक्कतों से जूझ रहे हैं, इसका एहसास उन रिपोर्टों से होता है, जो संकट झेल रहे किसानों के पास पहुंच कर इसी अखबार के रिपोर्टरों ने तैयार की और केस स्टडी के रूप में प्रकाशित की।

चौंकाने वाली बात यह है कि इस ज्वलंत मुद्दे को उठाने या आंदोलन करने के लिए हमारे राजनीतिक दलों के पास समय ही नहीं है। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वी. एम. सिंह को छोड़ दें, तो राज्य में किसी किसान संगठन ने इस मुद्दे पर सरकार और चीनी मिलों पर दबाव बनाने के लिए सड़क पर उतरने की जरूरत नहीं समझी।

ऐसे में किसान कहां जाएं? कुछ किसान न्यायालय की शरण में गए हैं। हो सकता है, पहले की तरह वहां से किसानों को कुछ राहत मिले। लेकिन साल दर साल पैदा होने वाले इस संकट के हल के लिए हर बार यह रास्ता कोई स्थायी समाधान नहीं है।


बेहतर होगा कि राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी समझे। साथ ही, किसानों को संगठित होकर चीनी मिलों और सरकार के साथ बराबरी के प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर अपना हक हासिल करने की ताकत जुटानी होगी।

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