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मुश्किलें इधर भी हैं, उधर भी

Tue, 16 Feb 2016 08:06 PM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Tue, 16 Feb 2016 08:06 PM IST
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Problems in both sides

अचानक ही कांग्रेसी खेमे की उदासी थोड़ी कम होती दिख रही है। मई, 2014 की चुनावी आपदा के 21 महीने बाद तमिलनाडु में वह द्रमुक सहयोगी के रूप में वापस लौट आई है, जबकि पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट भी ऐसी संभावना पर विचार कर रहे हैं। असम में तरुण गोगोई की उम्मीदें मतों के भारी विभाजन पर टिकी हुई हैं और उन्हें लगता है कि चुनाव बाद बना गठबंधन उनकी सत्ता में वापसी करेगा। केरल में भी चुनाव होने वाले हैं, जहां संभव है कि कांग्रेस सत्ता गंवा बैठेगी, लेकिन इसका लाभ भाजपा को नहीं मिलेगा, बल्कि वहां वाम दल फिर से सत्ता में वापसी के लिए तैयार दिखते हैं।

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एक व्यापक राष्ट्रीय परिदृश्य में हैदराबाद से दिल्ली तक छात्रों का आंदोलन विपक्षी एकता को अवसर देने की क्षमता रखता है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि एक दलित छात्र की आत्महत्या ने जातिगत आधार पर व्याप्त बेचैनी को बाहर ला दिया है, जिसका प्रभाव अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है।
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आर्थिक मंदी सबसे चिंता की बात है। नरेंद्र मोदी सरकार मजबूत राष्ट्रवादी/ देशभक्ति की भावनाओं के पीछे राहत महसूस कर सकती है, लेकिन अर्थव्यवस्था में सुधार की शुरुआत और अच्छे दिन लाने में मोदी शासन की विफलता देश भर के विभिन्न धर्मों एवं तबकों के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। यहां तक कि कुछ हद तक मोदी के कट्टर समर्थक भी बाबा रामदेव और गौतम अडानी के आर्थिक साम्राज्य की वृद्धि, पाकिस्तान से संबंध को लेकर ढुलमुल नीति और कथित तौर पर स्विस बैंक में छिपाए गए काले धन को वापस लाने के बारे में सरकार की चुप्पी पर बात करने में असहज महसूस करते हैं। किसानों की दुर्दशा, आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े, सरकारी बैंकों में बढ़ती गैर निष्पादित संपत्तियां (एनपीए), कश्मीर में पीडीपी के साथ गठजोड़, रेल यात्रा का बढ़ता खर्च जैसे कई मुद्दे हैं, जो लाखों उन लोगों को बेचैन कर रहे हैं, जिन्होंने मोदी को एक उद्धारक के रूप में देखा था।
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लेकिन मोदी को विफल बताना सही नहीं होगा। उनकी लोकप्रियता अब भी काफी है, लेकिन समय बीता जा रहा है। कैबिनेट में फेरबदल के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं, जो व्यापक रूप से राजनीतिक एवं प्रशासनिक कारणों से अपेक्षित है। संसदीय लोकतंत्र में चुनावी और राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए कैबिनेट में फेरबदल किसी भी प्रधानमंत्री के लिए जरूरी औजार होता है। इसलिए फेरबदल एक रणनीतिक उपकरण है, जिसका उपयोग प्रधानमंत्री पार्टी के भीतर के अपने विरोधियों से निपटने और चुनावी जीत के लिए कर सकते हैं। एक प्रधानमंत्री का अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल का निर्णय सत्तारूढ़ पार्टी और गठबंधन में उसकी ताकत का संकेत करता है। इसके अलावा यह प्रधानमंत्री का अपने पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों के साथ सामंजस्यपूर्ण रिश्ते को भी दर्शाता है।

इस संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल है कि क्या प्रधानमंत्री की नजर चार बड़े मंत्रालयों-गृह, रक्षा, वित्त एवं विदेश पर होगी। पारंपरिक ज्ञान के मुताबिक इन चारों मंत्रालयों में निरंतरता होनी चाहिए। लेकिन मोदी की उच्च लोकप्रियता और पार्टी एवं सहयोगी दलों की विनम्रता पर नियंत्रण को देखते हुए लगता है कि प्रधानमंत्री इस स्थिति में हैं कि वह कोई भी परिवर्तन, जो उन्हें उचित लगे, कर सकते हैं।

इन सबके बावजूद संसद के कामकाज एवं एनडीए के राजनीतिक प्रबंधन से संबंधित कुछ गंभीर मुद्दे हैं। यहां तक कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मानते हैं कि सुषमा स्वराज या अरुण जेटली संसदीय कार्य मंत्री के रूप में आसानी से जीएसटी बिल पारित करवाने में सक्षम होंगे और खंडित विपक्ष से राज्य सभा में ज्यादा रियायतें हासिल कर पाएंगे। लेकिन अगर सुषमा स्वराज विदेश मंत्रालय का कार्यभार आगे भी संभालती हैं, तो उनके पास फ्लोर मैनेजमेंट के लिए पर्याप्त समय नहीं होगा। हालांकि यदि उन्हें संसदीय कार्य मंत्रालय के साथ यदि मानव संसाधन विकास जैसा बड़ा मंत्रालय दिया जाता है, तो संसद के कामकाज से संबंधित मोदी की बड़ी चिंता काफी हद तक कम हो सकती है। वैसे भी अटल बिहारी वाजपेयी के समय से विदेश मंत्रालय प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) का ही विस्तार बनकर रह गया है।


पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक ऐसी विकट स्थिति से जूझ रही है, जहां के स्थानीय कार्यकर्ता तृणमूल कांग्रेस को दबाने के लिए वाम दलों के साथ गठजोड़ करना चाहते हैं। शीर्ष कांग्रेस नेताओं और वाम नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई बाधाएं हैं। बंगाल कांग्रेस के कार्यकर्ता 34 वर्षों से स्वाभाविक रूप से वाम विरोधी हैं, लेकिन जबसे ममता राइटर्स बिल्डिंग में आई हैं, वह काफी पीड़ित रहे हैं। इसलिए वह न चाहते हुए भी विकल्पहीनता की स्थिति में वाम दलों के साथ गठजोड़ करना चाहते हैं। हालांकि राहुल और सोनिया गांधी के लिए भी वाम दलों के साथ गठजोड़ आसान नहीं होगा, क्योंकि पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव केरल के साथ होगा, जहां कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार को वाम दलों के नेतृत्व वाले गठबंधन के कड़ी चुनौती मिल रही है।  राहुल ने बंगाल के कांग्रेसी नेताओं से कहा है कि उन्हें हर राज्य के लिए अलग राजनीतिक/चुनावी रणनीति की जरूरत है। यह एक खुला रहस्य है कि कांग्रेस की केरल इकाई ने बंगाल में राष्ट्रीय इकाई के चुनावी गठजोड़ के इस विचार की कटु आलोचना की है। राहुल की प्रमुख समस्या लोगों तक अपनी बात ठीक से नहीं पहुंचा पाना है, जिसके कारण वह लगातार विफल रहे हैं। मई, 2014 से एआईसीसी का सत्र नहीं बुलाया गया है। क्षेत्रीय एवं संभागीय स्तर के नेताओं को इस तरह के गठजोड़ पर अपने विचार रखने का मौका नहीं मिला। औपचारिक मंच के अभाव में रणनीतिक गठजोड़ जैसे महत्वपूर्ण फैसले 24, अकबर रोड या 10 जनपथ से थोपे जाते हैं। यह याद रखा जाना चाहिए कि आगामी पांच विधानसभा चुनावों में भाजपा का नहीं, बल्कि कांग्रेस का भाग्य दांव पर है। इसलिए राहुल को अपनी नेतृत्व क्षमता कहीं न कहीं साबित करनी ही होगी।

वरिष्ठ पत्रकार और 24 अकबर रोड के लेखक

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