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मुश्किलें कम नहीं हैं कांग्रेस की

Wed, 25 Sep 2013 07:48 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Wed, 25 Sep 2013 07:48 PM IST
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Problem of Congress

वर्ष 2014 की चुनावी जंग आजादी के बाद से अब तक की सबसे ज्यादा खतरनाक चुनावी जंग होने जा रही है। दांव बहुत ऊंचा है और भाजपा एवं कांग्रेस, दोनों ने अपने हथियार तेज कर लिए हैं। कांग्रेस अब तक नरेंद्र मोदी को महान बनाने के प्रति सावधान थी। कांग्रेसी नेता उनकी टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देने में बचते रहे थे, तो उसकी वजह यही थी। लेकिन पार्टी ने अब यह रक्षात्मक रवैया अपनाने का विचार त्याग दिया है। इसीलिए उसने मोदी द्वारा एनडीए के दौर में हासिल सबसे ऊंची विकास दर के दावे की धज्जियां उड़ाने के लिए न सिर्फ अपने सबसे अनुभवी आदमी पी चिदंबरम को मोर्चे पर लगाया, बल्कि उसने ठान लिया है कि अब मोदी के हर निराधार दावे का जवाब दिया जाएगा।

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एकता परिषद की बैठक के बाद वित्त मंत्री ने मोदी पर निशाना साधते हुए कहा ही कि वह 'तथ्यों के साथ फर्जी मुठभेड़' करते हैं। इससे पहले मोदी ने कांग्रेस पर एबीसीडी (आदर्श, बोफोर्स, कोलगेट एवं दामाद) के जरिये हमला किया था। कांग्रेस ने इसका तुरंत जवाब दिया, ईएफजी (एनकाउंटर, फेक, गोधरा) राजनीति के बारे में मोदी के क्या विचार हैं? कांग्रेस ने एक विशेष इकाई का भी गठन किया है, जो मोदी द्वारा या उनकी ओर से रखे जाने वाले तथ्यों और आंकड़ों की जांच करेगी।
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एकता परिषद की बैठक में वित्त मंत्री ने बताया कि राजग शासन के दौरान हासिल औसत विकास दर संप्रग शासन की औसत विकास दर से कमतर थी। जबकि भाजपा का कहना है कि जब राजग ने सत्ता छोड़ी थी, तब विकास दर 8.4 फीसदी थी, जो आज नौ वर्षों बाद 4.8 फीसदी रह गई है। साफ है कि आने वाले दिनों में दोनों पक्षों की जुबानी जंग में अन्य चीजों के अलावा आंकड़ों का राजनीतिकरण बढ़ सकता है।
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कांग्रेस के कुछ नेता मानते हैं कि मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाकर भाजपा ने उनकी राह आसान कर दी है। इससे या तो कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की तीसरी बार सरकार बनेगी या कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनेगी। मोदी को सामने करने के बाद अल्पसंख्यकों से उम्मीद की जा सकती है कि वे भाजपा को हराने वाले उम्मीदवारों के समर्थन में सामने आएंगे। लेकिन इससे बिहार एवं उत्तर प्रदेश में क्षेत्रीय दलों को ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि वहां कांग्रेस इतनी मजबूत स्थिति में नहीं है कि मुसलमानों द्वारा रणनीतिक तरीके से मतदान करने का फायदा उठा सके। मुजफ्फरनगर दंगे के बाद लगता है कि उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला बसपा एवं भाजपा के बीच होगा, क्योंकि अखिलेश सरकार की विफलता के कारण मुसलमान सपा के साथ कांग्रेस से भी नाराज हैं। फिर भी मुस्लिम वोट वहां बसपा, सपा, कांग्रेस, पीस पार्टी व वेलफेयर पार्टी जैसे दलों के बीच बंट जाएगा। इसी तरह बिहार में नीतीश कुमार एवं लालू यादव के बीच मुस्लिम वोटों का बंटवारा होगा, जहां कांग्रेस नैनो पार्टी के रूप में दिखती है, जिसके मात्र चार विधायक हैं, और जो एक नैनो कार में समा सकते हैं!

जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है, वहां भी कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं होने जा रहा। दिल्ली और राजस्थान में वह सत्ता-विरोधी रूझान से जूझ रही है, तो मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेता साथ मिलकर काम करने में सक्षम नहीं हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश भेजे जाने से कुछ फर्क पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि शिवराज सिंह की लोकप्रियता बरकरार रहने के बावजूद उनके मंत्रियों एवं पार्टी विधायकों के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। लेकिन सिंधिया को वहां भेजने का फैसला देर से लिया गया। इसी तरह कांग्रेसी नेताओं की नक्सलियों द्वारा हत्या के बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पक्ष में जो सहानुभूति पैदा हुई, आंतरिक मतभेदों के कारण कांग्रेस ने वह बेहतरीन मौका खो दिया।

कांग्रेस को उम्मीद है कि देश का दक्षिणी एवं पूर्वी इलाका मोदी के विजय रथ को रोक देगा। मगर ऐसा नहीं है कि उन क्षेत्रों में कांग्रेस का कब्जा हो जाएगा, क्योंकि वहां भी क्षेत्रीय दल वोट साझा करेंगे। कांग्रेस आज कर्नाटक में मजबूत है, लेकिन केरल में इसे वाम मोर्चे से कड़ी चुनौतियां मिल रही हैं। तमिलनाडु में इसका लगभग सफाया हो चुका है। आंध्र प्रदेश में 2004 और 2009 के लोकसभा चुनावों में उसे 33 सीटें मिली थीं, लेकिन मौजूदा स्थिति अनिश्चित है। तेलंगाना के फैसले से यह उस क्षेत्र में कुछ हद तक अपना खोया जनाधार पा सकती है, लेकिन सीमांध्र एवं रायलसीमा क्षेत्र में पार्टी का सफाया होने जा रहा है। जहां तक पूर्वी इलाकों की बात है, तो पश्चिम बंगाल और ओडिशा में पार्टी गिनती में नहीं है।


कांग्रेस की परेशानियों की तीन वजहें हैं- आगामी चुनाव में नेतृत्व देने के लिए उसके पास कोई चेहरा नहीं है, लगातार घोटालों ने उसकी छवि खराब की है, और कठिन परिस्थिति में जूझने की प्रतिबद्धता का उसमें अभाव है। जब विपक्ष में नरेंद्र मोदी हों, तब कांग्रेस के लिए चुनौती वाकई बहुत बड़ी है। नीतीश कुमार जैसे नए साथी के साथ मिलकर वह भाजपा का मुकाबला कर सकती है। अलबत्ता आगामी चुनाव में अपने क्षेत्रीय नेताओं के साथ उसे भरपूर तालमेल बिठाना होगा। सिद्धारमैय्या, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, तरुण गोगोई, पृथ्वीराज चव्हाण, वीरभद्र सिंह, जीके वासन, अजित जोगी, यहां तक कि दिग्विजय सिंह और कमल नाथ जैसों का भी उसे भरपूर साथ चाहिए। मोदी का रथ रोकने के लिए फिलहाल कांग्रेस राहुल गांधी की रणनीति पर चलने से भी बचेगी, जिसमें सहयोगियों के बजाय अकेले ही आगे बढ़ने की बात की जाती है।

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