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पृथ्वीराज चौहान : इतिहास छलिया प्रेमी है या बहुरूपिया शिकारी, कर देता है सवालिया कठघरे में खड़ा
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सम्राट पृथ्वीराज
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अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
विस्तार
Samrat Prithviraj Chauhan : ऐतिहासिक फिल्म का चलना या न चलना उस फिल्म की इतिहास सम्मतता को न खारिज करता है, न सिद्ध। मुझे यकीन है कि भारतीय इतिहास के अकादमिक गलियारों में भी इस फिल्म ने हलचल पैदा की होगी। डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी लिखित- निर्देशित सम्राट पृथ्वीराज नामक फिल्म पृथ्वीराज रासो पर आधारित है, यानी उसका सिनेमाई रूपांतरण है, यह ग्रंथ अप्रामाणिक या फर्जी नहीं है, किसी अलग सूचना वाले अकेले स्रोत की सीमा तो होती है, पर इतिहास लेखन में समकालीन स्रोत की अलग अहमियत होती है।
केवल एक समकालीन स्रोत भी स्थापित धारणा को सवालिया कठघरे में खड़ा कर देता है, चाहे उसकी पुष्टि दूसरे स्रोत से न हो रही हो। कम से कम दो अलग किस्म के स्रोत एक ही बात करें, तो वह बात इतिहास में प्रमाणित तथ्य मानी जाने की ओर बढ़ती है। पृथ्वीराज रासो एक किताबी समकालीन स्रोत है। जैसे कोई बात जो सिर्फ एक किताबी स्रोत से पता चली हो, किसी पुरातत्विक स्रोत से पुष्ट हो जाए, तो बात बन जाती है।
यानी, केवल एक विपरीत समकालीन स्रोत सर्वस्थापित धारणा/सिद्धांत को विवादित बना देता है। यही इतिहास की पद्धति है। समकालीन स्रोत यानी प्राथमिक स्रोत! प्राथमिक स्रोतों को इतिहास लेखन में सदा द्वितीयक स्रोतों से ज्यादा अहम माना गया है, द्वितीयक यानी जो किसी के कहे को दोहराते हैं, उस काल के नहीं है। साहित्यिक दुनिया के बड़े युवतर लेखक ने आधुनिक भारतीय इतिहास के एक विषय पर किताब लिखी, उनकी स्नातकोत्तर शिक्षा प्राचीन भारतीय इतिहास की थी।
मैंने जब उनसे कहा कि आप साहित्य लिखते हो तो विश्व स्तरीय होता है। इतिहास की किताब टेक्स्ट बुक जैसी है, नया शोध नहीं है। तो बुरा मान गए। मैंने विनम्रता से कहा कि प्रिय लेखक जी, आपने किताब में एक भी प्राथमिक स्रोत उद्धृत नहीं किया, जो किया है, द्वितीयक के हवाले से किया है। तो बोले, सब ऐतिहासिक महत्व की किताबें मेरे संदर्भ ग्रंथ हैं। मैंने कहा- निस्संदेह।
पर वे सब ग्रंथ उस काल से बाद के हैं, जो समयकाल आपने किताब के लिए चुना है। कहने का आशय यह था कि अगर मैं कहूं कि ऋग्वेद के फलां प्रकाशक के संस्करण में फलां अध्याय पर तीसरे श्लोक में कोई खास बात कही गई है, तो यह प्राथमिक स्रोत का इस्तेमाल है, अगर इसे इस तरह पेश करूं कि रामधारी सिंह दिनकर अपनी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में ऋग्वेद को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि....।
तो यह हुआ कि मैंने सीधे प्राथमिक स्रोत को नहीं देखा। तो यह इतिहास लेखन में एक पद्धतिमूलक दोष है। दरअसल, आधुनिक भारतीय इतिहास और समकालीन भारतीय इतिहास में झीना-सा फर्क है, इसे समझे बिना एक पाठक का तो काम चल सकता है, इतिहास लिखने वाले का नहीं। उन अग्रज मित्र से चूक यहीं हुई थी। मेरे कहने पर शायद उन्हें अपनी इस चूक का अहसास तो हो गया था, पर स्वीकारने में हिचक बाकी रही। उनकी चूक की ओर इशारा तो किया, पर मैंने अपना आदर उनके लिए यथावत रखा। उसमें कमी नहीं आने दी।
इतिहास के विद्यार्थी के रूप में मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती कि कोई कलाधर्मी किसी एक स्रोत या समकालीन ग्रंथ को आधार बनाकर अपनी नई कलाकृति का सृजन करे। यह लोकतांत्रिक चुनाव भी है। कोई एकल दृढ़ विश्वास भी विचार और ज्ञान की दुनिया में बदलाव लाने में सक्षम रहा है, इसके कई उदाहरण मिल जाते हैं। फिल्म सम्राट पृथ्वीराज ने बॉक्स ऑफिस पर असफल होकर भी सांस्कृतिक खित्तों में महत्वपूर्ण डिस्कोर्स खड़ा किया है।
जिम्मेदार इतिहास लेखन प्रोपोगैंडा या किसी खास विचारधारा की क्रीड़ास्थली नहीं है। चाहे वह एक विचारधारा कितनी भी सुंदर क्यों न हो, दिव्य क्यों न हो! इतिहास पर फिल्म निर्माण इसका अपवाद हो सकता है, प्रायः होता है, निजी यानी व्यक्ति या संगठन और सरकारी दोनों ही स्तरों पर ऐसी कोशिशें होती आई है, यह मीडियम की ताकत है कि उसे साधन बनाया जाता है।
कला या इतिहास को साध्य मानकर कितने फिल्मकार इतिहास के आसपास फिल्म बनाते होंगे भला! शायद ही कोई ऐतिहासिक किरदारों या समय वाली फिल्म इतिहास के साथ पूरी ईमानदार होती है, मैंने तो आज तक नहीं देखी। तो अब यह अपेक्षा भी नहीं करता। किसी पक्ष के भाव के साथ ईमानदार होना ही यथेष्ट है।
यथासंभव ईमानदारी! उदाहरण के लिए कश्मीर और पंजाब के खास पक्ष ही सिनेमा में आए हैं, अन्य पक्ष आने ही नहीं दिए गए। किसी खास फिल्म से, कतई जरूरी नहीं कि सब बातों से मेरी सहमति हो, तथ्यों का वह रूप मेरे अध्ययन और अनुभव से आगे का सच हो सकता है, यह अंतर संभव है कि मेरी इस असहमति का निर्माण करता हो!
इतिहास आधारित फिल्म अपनी बॉक्स ऑफिस की सफलता या असफलता से आगे अपने उद्देश्यों में कामयाबी या नाकामयाबी के लिए जेरे बहस होनी चाहिए, और यह प्रभाव दूरगामी होता है। (- लेखक फिल्म गीतकार- स्क्रिप्ट राइटर और स्वतंत्र इतिहासकार हैं)