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युवराज हठ नहीं करते
राजेंद्र शर्मा
Updated Sun, 06 Oct 2013 06:31 PM IST
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न युवा हठ और न युवराज हठ। हमें तो दूर-दूर तक इसमें हठ नजर ही नहीं आता। सिर्फ इसलिए कि इसमें एक डायलॉग था-फाड़कर फेंक दो और डॉयलाग बोलने वाले युवराज थे, इस आधार पर इसे हठ का मामला नहीं कहा जा सकता। तब तो और नहीं, जब एक बकवास को फाड़कर लालू और रशीद मसूद को कुर्सी से उतार कर फेंका जा चुका है।
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इसके बाद भी भाई लोग हठ-हठ की हठ पकड़े हुए हैं। पर हमें तो इसमें हठ का एक भी लक्षण दिखाई नहीं देता। सिर्फ इसलिए कि युवराज पुत्र हैं और साम्राज्ञी माता, इसे बाल हठ की तर्ज पर युवराज हठ नहीं मान लिया जाएगा। युवराज को आप सिर्फ युवा नहीं कह सकते कि इसे बालहठ से आगे की चीज करार दी जाए। यहां युवा के पीछे राज यानी गद्दी की पूंछ लगी हुई है। ऐसे लोग हठ नहीं करते, किसी से कुछ मांगा नहीं करते, बल्कि जब जो मर्जी आए, वह कर सकते हैं। अगर वह चाहते, तो खुद उसे फाड़कर फेंक सकते थे, उन्हें भला कौन रोक सकता था! लेकिन उन्होंने गजब की लोकतांत्रिक भावना दिखाई, और जोर से ही, लेकिन शालीन शब्दों में जो कुछ कहा, उसका मतलब यही था कि जनता इसे फाड़कर फेंक देने के पक्ष में है।
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हठ करने वाली एक और बात बताएं। पिछले जमाने में एक और गांधी हुए थे। वह अंग्रेजों से देश को आजादी दिलाने पर अड़ गए थे। उन्होंने आजादी दिला भी दी। क्या उसे गांधी हठ कहते हैं? सीनियर गांधी का अड़ना तो हठ नहीं हुआ और जूनियर गांधी का अड़ना हठ हो गया! सही चीज के लिए अड़ने को हठ नहीं कहते। युवराज ने जो किया, वह तो मसीहा जैसा काम था। और मसीहा की तो लात में भी आशीर्वाद होता है। फिर सरकार की बेइज्जती का शोर क्यों मचाया जा रहा है? बल्कि इससे तो उल्टे देसी पब्लिक की नजरों में भी इज्जत बढ़ती है और ओबामा की नजरों में भी। आखिर, कोई तो है, जो जरूरत पड़ने पर सुधार सकता है। टाइमिंग की गलती की शिकायत भी सही नहीं है। मसीहा की लात टाइम नहीं देखा करती। जब भी पड़ जाए, वही लात का सही टाइम है।
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इसके बाद भी जो लोग इसे हठ का मामला मनवाने का हठ पकड़े हुए हैं, इसकी एक अच्छाई से तो वे भी इनकार नहीं कर सकते हैं। बाल हठ और तिरिया हठ से लेकर हम्मीर हठ तक अपने यहां पहले से चलन में थे। इस सूची में एक और हठ जुड़ रहा है-युवराज हठ। कम से कम यह खुशहाली तो देखिए!