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आदिम मनुष्य कविता के पास था

Sun, 05 Jan 2020 01:44 AM IST
Bhalchandra Nemade भालचंद नेमाड़े
Updated Sun, 05 Jan 2020 01:44 AM IST
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Primitive man was close to poetry, poetry was born before all languages says Bhalchandra Nemade
प्रतीकात्मक तस्वीर

यह बात सच है कि सभी भाषाओं में कविता का जन्म पहले हुआ है। इसके अनेक कारण बताए जाते हैं। किसी ने यह सिद्धांत रखा कि भाषा ध्वनि-सादृश्य से आई है। इसकी एक माव-माव थियरी है। एक बाव-बाव थियरी भी है। कुत्ते की तरह बाव-बाव करते थे, इसलिए बाव-बाव। मगर इसमें कोई सच्चाई नहीं है। दरअसल, भाषाशास्त्रियों के अनुसार भाषा की निर्मिति हमारे अवचेतन में होती है। बाद में वह चेतना के स्तर पर आती है। हमारे अवचेतन में भाषा का कोई सुस्पष्ट आकार नहीं होता। जैसे, हमें सपने में कुछ अगम्य दिखाई देता है, लेकिन उसे हमारी तर्कपूर्ण भाषा का आकार नहीं दिया जा सकता है।


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अवचेतन में भाषा का उत्स होने के कारण मूलतः वह काव्यात्मक, तरल, प्रवहमान और अखंड होती है। फिर वह चेतना के स्तर तक आती है। उस समय उसका अलग-अलग विश्लेषण किया जा सकता है। बाद में वह तार्किक रूप में अभिव्यक्त होती है। भाषा का यह सफर मन ही मन होता है। भारतीय दर्शन में भाषा का अस्तित्व परा, पश्चंती, मध्यमा और वैखरी आदि रूपों में देखा गया है, जो मुझे अधिक सुविधाजनक प्रतीत होता है। अंतिम स्थिति वैखरी होती है। यह मस्तिष्क के लिए बोधगम्य स्थिति होती है।

इससे पूर्ववर्ती मध्यमा अवस्था चेतना के अधिक गहरे रूप में, हमारी विवेकशील बुद्धि के लिए अगम्य होती है। मगर इस अवस्था में मन ही मन कविता की भाषा व्यक्त होने का प्रयास करती रहती है। पश्चंती और परा-ये अवस्थाएं बोधगम्यता के अधिक रहस्यमयी भाग को दर्शाती हैं। सारांश यह कि गीतिकाव्य की भाषा इस अवचेतन स्थिति के करीब होती है। इसी कारण कविता को अनन्यसाधारण महत्व प्राप्त है।

कविता हमारे अवचेतन में घटित होने वाली घटना है। अवचेतन मन की संरचना हम कविता से ही जान सकते हैं। उदाहरण के लिए, कबीरा कुआं एक है पानी भरे अनेक। भांडे में ही भेद है सबका मालिक एक।। इस दोहे में जो लय मन पर अंकित हो जाती है, वह तार्किक नहीं होती, बल्कि वह उसके पीछे के अवचेतन से आती है। इस तरह कविता ठेठ अभिव्यक्ति होती है। अवचेतन मन का सीधे-सीधे कवि की भाषा में परिवर्तन होता है। इसलिए हर भाषा में कविता प्राथमिक और महत्वपूर्ण मानी जाती है। वह मानवीय सभ्यता की आदिम संस्कृति से नाता जोड़ती है। उसका मौखिकता से संबंध है। 

लिखित भाषा बहुत बाद में, लिपि के अन्वेषण के बाद यानी मिस्र या सिंधु संस्कृति के बाद ही बीते चार हजार वर्षों में गद्य रूप में अवतरित हुई है। मानवीय इतिहास में सर्वत्र गद्य से बहुत पहले काव्य के युग संपन्न हो चुके हैं। हमारे वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद आदि के समय को ईसा पूर्व लगभग पांचवीं शती की कविता के युग से जोड़ा जाता है। पहला सूत्र रूप गद्य स्मृतियों के समय में ही आया न? ईसा पूर्व दूसरी-तीसरी शती में कविता ही सर्वत्र सार्वभौम थी। काव्य समाप्त होने के बाद गद्य का दौर शुरू हुआ। फिर उसमें विवेकशील गद्य शुरू हुआ। 

शुरुआती आदिम अवस्था में मनुष्य कविता के पास था। मगर परवर्ती दौर में गद्य की विवेकशीलता बढ़ती चली गई। माटी के संस्कार यानी उस जगह के संस्कार, जहां मनुष्य का जन्म हुआ है, जिस जगह पर हम पले-बढ़े, वहां के झाड़-झंखाड़, उस क्षेत्र के पक्षी-प्राणी, प्रकृति और कुल मिलाकर परिवेश के अस्तित्व का असर हम पर होता है, जो हमारे मन में, हमारी पहली भाषा में अंकित होने लगता है। इस कारण माटी से हमारा नाता बना रहता है। 

माता-आपके द्वारा बताया गया दूसरा तत्व है। मनुष्य का शुरुआती संवाद तो मां से ही होता है। जन्म से भी पहले से। बच्चे को दूध पीना होता है। भूख लगने पर उसका रोना। विशिष्ट ढंग से रोने पर माता को पता चलता है कि इसे भूख लगी है। माता में भी जैविक रूप से यह संवेदना होती है। धीरे-धीरे वह बालक मां से बात करता हुआ तुतलाने लगता है। फिर अम्मां, मां। दो अक्षरों वाले, तीन अक्षरों वाले शब्द। फिर टूटे-फूटे वाक्य। मुझे भूख लगी है। खाना दो, वगैरह मोटी तार्किक वाक्य रचना शुरू हो जाती है। 

इसके लिए बालक को सप्रयास उस भाषा की परंपरा द्वारा पहले से बनी संकेत-व्यवस्था सीखनी पड़ती है, जिस परिवेश में वह जन्म लेता है। यानी, कर्ता, कर्म, क्रियापद आदि वाक्य में कहां आ सकते हैं, क्रिया-क्रियाविशेषण कहां आएंगे वगैरह-वगैरह। इसलिए शुरू में जो माटी और माता के प्रभाव का उल्लेख किया है, वह बिल्कुल ठीक है। हम भाषा को यों ही मातृभाषा नहीं कहते।

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