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युधिष्ठिर के संशय का निवारण

Wed, 21 Aug 2013 06:55 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Wed, 21 Aug 2013 06:55 PM IST
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Prevention of Yudhisthira's doubt

महाभारत युद्ध खत्म हो चुका था। भीष्म पितामह बाणों

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की शैय्या पर लेटे थे। युधिष्ठिर अचानक उनके दर्शन करने आ पहुंचे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर भीष्म पितामह को प्रणाम किया। पितामह की यह अवस्था देखकर उनकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी।

भीष्म समझ गए कि उनकी इस दशा के लिए युधिष्ठिर स्वयं को जिम्मेदार समझकर दुखी हैं। उन्होंने युधिष्ठिर की आत्मग्लानि दूर करने के उद्देश्य से कहा, युधिष्ठिर, सतयुग में राजा देय का राज्य था। वह कुसंग और अहंकार के कारण अपना राजधर्म भूलकर पथभ्रष्ट हो गया।

देय प्रजा पर अत्याचार करने लगा। चारों ओर हाहाकार मच गया, तो ऋषियों को तपस्या छोड़कर उसका वध करना पड़ा। देय के बेटे पृथु को राजगद्दी संभालने को राजी किया गया। ऋषियों ने उसे राजधर्म की शिक्षा दी और बताया कि अन्याय का समर्थन कदापि न करना। यदि किसी के साथ सगा-संबंधी भी अन्याय करे, तो उसे दंडित करना राजा का परम धर्म है। देवताओं ने भी राजा पृथु को आश्वासन दिया कि अपराधियों व बुरे कर्म करने वालों को दंड देने में पाप नहीं लगता।

भीष्म पितामह ने फिर कहा, वत्स, तुम पांडवों ने धर्ममार्ग से विचलित हुए बिना कौरवों से युद्ध किया। यह धर्मयुद्ध था। अपने वचन की रक्षा के लिए मुझे कौरवों का साथ देना पड़ा। तुमने जो वध किए हैं, वे धर्मानुसार थे, इसलिए मन से हीन भावना निकाल दो।

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