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पाक अधिकृत कश्मीर पर दबाव में इस्लामाबाद

Fri, 25 Sep 2015 08:07 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Fri, 25 Sep 2015 08:07 PM IST
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pressure on Islamabad for pok

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के नागरिकों की दुर्दशा के बारे में सारी दुनिया जानती है। पाक अधिकारियों के पक्षपाती रवैये से वहां के लोगों में इस्लामाबाद के खिलाफ अविश्वास बढ़ रहा है। हाल ही में पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री अब्दुल मजीद ने इस्लामाबाद को दोटूक कहा है कि अधिकृत कश्मीर पाकिस्तान का अंग नहीं है, इसलिए गिलगित और बल्तिस्तान के बारे में उसे निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं है।

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पाक अधिकृत कश्मीर के प्रधानमंत्री की इस धमकी ने इस्लामाबाद को परेशानी में डाल दिया है। हाल ही में अंजुमन मिनहास-ए-रसूल के अध्यक्ष मौलाना सैयद अजहर हुसैन देहलवी ने पाक अधिकृत कश्मीर के पांच दिन के दौरे से लौटने के बाद कहा है कि जिस तरह भारत सरकार ने कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों की बड़े पैमाने पर मदद की, उससे पाक अधिकृत कश्मीर के लोग न सिर्फ खुश हैं, बल्कि 99 प्रतिशत लोग भारत के साथ जाना चाहते हैं।
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दरअसल पाक अधिकृत कश्मीर के लोग इस्लमाबाद से पूछ रहे हैं कि 1963 में कश्मीर का 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र उसने चीन को उपहार में देने से पहले उनसे पूछा क्यों नहीं? उसने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को क्यों नहीं माना, जिसके अनुसार जनमत संग्रह कराने से पहले पाकिस्तान को यह सारा इलाका खाली करना था?
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एक तरफ पाकिस्तान दावा करता है कि उसे कश्मीरियों की चिंता सता रही है, जबकि इस कब्जाए हुए क्षेत्र को सांविधानिक रूप से न कोई देश माना गया है, न कोई प्रांत। वहां पर कठपुतली सरकार, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनाए जाते हैं। वहां के लोग पाक सरकार से इसलिए भी नाराज हैं कि नियंत्रण रेखा के आस-पास से स्थानीय आबादी को हटाकर वहां पंजाब के आतंकवादियों, अफगान शरणार्थियों व पाक परस्त दहशतगर्दों को बसा दिया गया है। इन लोगों की मदद से इस्लामाबाद जम्मू-कश्मीर में विध्वंसक कार्रवाइयां करा रहा है। वहां की जनता किराये के इन आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली चोरी, अपहरण, बलात्कार और हत्या की घटनाओं से तंग है। जनता समझ चुकी है कि पाक सरकार को क्षेत्र के विकास में कोई रुचि नहीं है। इसलिए वे भारत का हिस्सा बनना चाहते हैं। पिछले साल सितंबर में नवाज शरीफ जब वहां के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में पहुंचे थे, तब उनका स्वागत, 'गो नवाज, गो' नारों से किया गया।

वारखान कॉरीडोर के जरिये मध्य एशिया के लिए प्रवेश द्वार होने तथा प्रचुर जल संसाधन के कारण यह इलाका भारत के लिए रणनीतिक महत्व का है। पिछले 67 वर्षों से हमने पाक द्वारा हड़पे गए कश्मीर के इस हिस्से को वापस लेने का कभी प्रयास ही नहीं किया। 1994 में भारतीय संसद ने प्रस्ताव पारित किया था कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के उन हिस्सों को तुरंत खाली करे, जिन पर उसने नाजायज कब्जा बना रखा है। पर इस पर अमल नहीं हुआ।


अलबत्ता पिछले कुछ दिनों में केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों के बयानों से पाक अधिकृत कश्मीर के मुद्दे पर नीतिगत बदलाव का संकेत मिलता है। प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। इससे जुड़ा कोई मुद्दा है, तो यह कि पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के कब्जे से छुड़वाकर किस तरह भारत में शामिल किया जाए। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा है कि भारत कश्मीर नहीं, पाक से पाक अधिकृत कश्मीर पर वार्ता को तैयार है। यानी भारत अब कश्मीर के बजाय पाक अधिकृत कश्मीर पर दुनिया का ध्यान ले जाना चाहता है, ताकि पाकिस्तान पर दबाव बना रहे और दुनिया के सामने सही तस्वीर आ सके।

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