फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Prayer at home

घर में रहकर ही साधना-अध्ययन

Sun, 06 Oct 2013 06:24 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Sun, 06 Oct 2013 06:24 PM IST
विज्ञापन
Prayer at home

महात्मा शिबि बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। धर्मशास्त्रों के ज्ञाता तथा परम तपस्वी होने के कारण ऋषि-महर्षि भी उनका सम्मान करते थे। शिबि ने अपने पुत्र सत्यकाम को धर्मशास्त्रों का ज्ञान कराने के लिए महर्षि पिप्पलाद के पास भेजा। गुरु के सान्निध्य में रहकर सत्यकाम उच्च कोटि का विद्वान बन गया।

विज्ञापन


सत्यकाम की प्रतिभा से संतुष्ट होकर शिबि ने महर्षि पिप्पलाद से अनुरोध किया कि वह पुत्र को उत्तराधिकारी बनाने का संस्कार संपन्न करा दें। सत्यकाम चिंतित हो उठे कि उत्तराधिकार सौंपने के बाद पिताश्री घर से निकल गए, तो वह निराश्रित हो जाएंगे। शुभ मुहूर्त पर महर्षि पिप्पलाद ने उत्तराधिकार संस्कार संपन्न कराया। यज्ञादि के बाद शिबि ने संकल्प दोहराया, पुत्र, मैं अपनी वाणी के समस्त सद्गुण, नेत्रों में विद्यमान विमल दृष्टि, कर्म प्रवृत्ति, बुद्धि, ज्ञान सब तुम्हें सौंपता हूं। पुत्र ने कहा, मैं स्वीकार करता हूं।
विज्ञापन


पिता ने पुत्र के सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। सत्यकाम ने गुरुदेव से प्रार्थना की, ऐसी व्यवस्था करें कि पिताश्री घर त्यागकर न जाएं।

पुत्र का आग्रह देख शिबि ने कहा, शास्त्र में दोनों प्रकार के विधान हैं। मैं घर में भी रह सकता हूं। मेरी आध्यात्मिक ऊर्जा, भौतिक संपत्ति अब तुम्हारी है। दायित्व का हस्तांतरण करने के बाद मैं तुम्हारा आश्रित हो गया हूं। सत्यकाम दायित्व निर्वाह में जुट गया। पिता घर में रहकर ही साधना-अध्ययन में लीन रहने लगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed