{"_id":"ad260731c1baa579f00a4bf56b6a4dfa","slug":"powerful-man-has-no-senses-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"समरथ को नहिं होश गुसाईं","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
समरथ को नहिं होश गुसाईं
अशोक सण्ड
Updated Tue, 11 Nov 2014 11:17 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संपत्ति कौशल, योग्यता, विरासत या फिर हेराफेरी से ही प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कौशल से ही चार के चवालीस करोड़ बनाए। उनके इस ‘कौशल’ को हिसाब-किताब देखने वाली संस्था ने जब अवैध ठहराया, तो आलोकित कर दिया अंग्रेजी के अखबार ने। अंग्रेजी के ही जेड अक्षर सरीखी सुरक्षा के अलावा खुद की अतिरिक्त सिक्योरिटी का इंतजाम भी था उनके पास। सामर्थ्यवान होने के बावजूद ‘वह डरा’ क्यों?
विज्ञापन
उन्होंने एक बार नहीं, तीन बार पूछा, आर यू सीरियस, आर यू सीरियस, आर यू सीरियस। कभी परसाई जी ने कहा था कि यदि कोई कुछ पूछे और जवाब न मिले, तो पूछने वाले के मुंह पर जूते से पड़ते हैं। परसाई जी के मुताबिक उनके मुंह पर ऑलरेडी तीन जूते पड़ चुके थे। झुंझलाहट में झटक दिया उन्होंने उस मीडिया-‘कर’ को, जो अपने प्रश्न का उत्तर चाहता था।
विज्ञापन
ऐसा नहीं कि प्रश्नकर्ता माइक-धारी सीरियस के मायने न समझता हो। दरअसल चेहरे के भाव न पढ़ पाने में असमर्थ वह निरीह सुध-बुध गंवा बैठा। इडियट का अलंकरण अलग से चस्पा। नाहक अंग्रेजी के अखबार की रिपोर्ट पर सवाल कर अपने साथ उनकी भी फजीहत करवा दी।
विज्ञापन
पत्रकार पहले भी न जाने कैसे-कैसे ऊटपटांग सवाल करते रहे हैं। संसद और विधानसभाओं में प्रश्नकाल में माननीयों की तिलमिलाहट जग जाहिर है। सवालों के चलते ही कैंटीन और कॉफी हाउस की टेबल पर घूंसे पटके जाते है। यदि ऐसे बेतुके ‘व्यक्तिगत’ प्रश्नों के भाग्य में उत्तरित होना लिखा होता, तो काफी कुछ सुधर जाता देश। काहे को इतना हाहाकार होता। काश! तथाकथित जमींदार साहब ‘नों कमेंट्स’ कर अगर आगे बढ़ जाते, फिर सासू मां के सामने भी दामाद जी को समझाने की सिचुएशन न बनती।
बहरहाल, फिकर नॉट। और दामाद भी चर्चित हो रहे हैं। पब्लिक की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। धैर्य रखें, सब दिन एक समान नहीं होते।