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समाजवादी पार्टी का सत्ता-संघर्ष

Sun, 21 Aug 2016 05:19 PM IST
अभय कुमार दुबे
अभय कुमार दुबे Updated Sun, 21 Aug 2016 05:19 PM IST
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Power strugle of Samajwadi Party
अभय कुमार दुबे

पिछले हफ्ते शुक्रवार का दिन लखनऊ के समाजवादी यादव राज-परिवार के लिए कुछ राहत का था। सुबह के वक्त सत्तारूढ़ कुनबे के दो सबसे ऊंचे कारकुनों-मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सरकार में नंबर दो एवं उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच मुख्ययमंत्री आवास पर तकरीबन पौन घंटे तक आमने-सामने बातचीत हुई, जिसमें किसी तीसरे व्यक्ति को भाग लेने की इजाजत नहीं थी। राज-परिवार के भीतर चल रही कलह की रोशनी में यह बैठक महत्वपूर्ण थी, क्योंकि एक दिन पहले जब इस कलह को निपटाने के लिए घर के सभी सदस्यों को एक जगह बैठाया गया था, तो उसमें शिवपाल ने भाग नहीं लिया था। चूकि वह इस भीतरी सत्ता-संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुवों में से एक थे, इसलिए बिना उनकी भागीदारी के यह घोषित नहीं किया जा सकता था कि अंदरूनी विवाद की खबरें मीडिया द्वारा गढ़ी गई हैं। बैठक से बाहर आकर शिवपाल ने इसी आशय का बयान दिया, पर उनका एक दूसरा मतलब भी था। उन्होंने उन मुद्दों को फिर दोहराया, जो कलह के व्यावहारिक कारण थे। मसलन, जिन अफसरों पर वह कार्रवाई चाहते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई न होना, या मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल का सपा में विलय न हो पाना, या सपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर जमीन-जायदाद हड़पने का आरोप लगना। क्या वास्तव में पारिवारिक कलह के यही कारण हैं?

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जो बात न शिवपाल कहते हैं, न अखिलेश-वह यह है कि कलह का मूल इन मुद्दों में निहित न होकर पार्टी के पितामह मुलायम सिंह यादव के उस निर्णय में निहित है, जो उन्होंने साढ़े चार साल पहले लिया था। अगर पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह ने अपनी जगह बेटे अखिलेश के बजाय छोटे भाई शिवपाल को मुख्यमंत्री बनाया होता, तो या तो यह विवाद होता ही नहीं, या फिर इसकी शक्ल कुछ और होती। यह सत्ता-संघर्ष उसी समय से जारी है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है, हालात संगीन होते जा रहे हैं। इसीलिए सपा के भीतर सलाह-सुमति कायम करने की इन कोशिशों की बागडोर मुलामय सिंह ने अपने हाथों में ले रखी है। उन्हें लग रहा है कि अगर शिवपाल का दिली सहयोग-समर्थन न मिला, तो विधानसभा चुनाव में जबर्दस्त एंटी-इनकम्बेंसी का मुकाबला करना मुश्किल हो जाएगा और सत्ताच्युत होने के बाद पार्टी के भीतर असंतोष को दबाकर रखना नामुमकिन होगा। तब नेताजी के राजनीतिक रूप से सक्रिय रहते हुए भी पार्टी में विभाजन हो सकता है। हो सकता है कि पार्टी ऊपर से एकजुट दिखती रहे, पर उसके भीतर की गुटबाजी उसे खोखला बनाती रहे।
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इन्हीं सब कारणों से उन्होंने पार्टी का चुनाव इंचार्ज शिवपाल को बनाया था। लेकिन मुख्तार अंसारी वाले मसले पर हस्तक्षेप कर अखिलेश ने शिवपाल की चुनाव-इंचार्जी को नाममात्र का बना दिया। पार्टी की चुनावी रणनीति भी इस कलह की शिकार होकर दो भागों में बंट गई है। यादव मतों को मुसलमान मतों से कैसे जोड़ा जाए-इस प्रश्न पर अखिलेश और उनके पिता-चाचा दो अलग-अलग दिशाओं में देख रहे हैं। अखिलेश की दृष्टि व्यापक और यादव-मुसलमान गठजोड़ के परे देखने वाली लगती है, पर पिता-चाचा की रणनीति सैद्धांतिक रूप से पहली नजर में भले ही संकीर्ण लगे, लेकिन ठोस, परखी हुई और परिणामोन्मुख है।
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दूसरा अहम कारण यह भी है कि मुलायम सिंह ने शिवपाल की जगह अखिलेश को अपना उत्तराधिकारी अवश्य बनाया है, पर इसका मतलब यह नहीं कि अपने भाई के प्रति उनके स्नेह में कोई कमी है या वह शिवपाल की अनुभवी राजनीतिक-बुद्धि या सांगठनिक क्षमताओं को नजर अंदाज करने लगे हैं। उनके दिमाग में यह बात साफ है कि पार्टी के सभी प्रमुख ध्रुवों को साथ रखने से ही उनके बेटे के सुरक्षित राजनीतिक भविष्य और पार्टी की एकता की गारंटी हो सकती है। इनमें राज्यसभा सदस्य और अखिलेश के एक और चाचा रामगोपाल यादव भी हैं, जो शुरू से ही अखिलेश के साथ हैं।

बेहतर यही होता कि अपने साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में अखिलेश सरकार और पार्टी पर अपना वर्चस्व कायम कर लेते,और उनका नेतृत्व स्वाभाविक रूप से सभी पक्षों द्वारा स्वीकार कर लिया जाता। और जो उनका नेतृत्व स्वीकार करने से इन्कार कर देता, उससे पार्टी धीरे से किनारा कर लेती। ऐसा तभी हो सकता था, जब अखिलेश अपना वह प्रशासनिक कौशल पहले साल से ही दिखाना शुरू कर देते, जो अब दिखा रहे हैं। इससे उनके चाचाओं और पिता को एक सुखद संदेश मिलता कि उन्हें राजकाज और पार्टी में हस्तक्षेप तभी करना चाहिए, जब मुख्यमंत्री को इसकी आवश्यकता महसूस हो। पर ऐसा कभी नहीं हो पाया। उत्तर प्रदेश सरकार का एक विज्ञापन जब कहता है कि उत्तर प्रदेश के बदलने की शुरुआत हो चुकी है, तो इसमें निहित रूपक ही स्पष्ट कर देता है कि अखिलेश ने कितनी देर कर दी है। जब वोट पड़ने में महज चार महीने रह गए हैं, तो बदलाव की शुरुआत समस्याएं कम करने के बजाय बढ़ाती ही है। इस लिहाज से देखें, तो खुद मुलायम सिंह ने भी एकता की यह कोशिश देर से शुरू की है।


लेकिन एक बात माननी होगी कि सपा का यह सत्ता संघर्ष अपनी प्रकृति में बेहद नरम किस्म का है। इसका पहला कारण है पार्टी के भीतर मुलायम सिंह यादव की निर्विवाद सर्वोच्चता। यह स्थिति एनटी रामराव के नेतृत्व के खिलाफ तेलगु देशम में हुए पारिवारिक विद्रोह से अलग तरह की है। इसका दूसरा कारण है विभिन्न ध्रुवों के मुखियाओं के बीच पारिवारिक स्नेह-संबंधों का इस हालत में भी कायम रहना। मुलायम सिंह इसको लेकर बहुत सतर्क दिखते हैं कि किसी भी कीमत पर परिवार का कोई भी सदस्य छिटक कर बाहर न जा पाए। क्या मुलामय अपने इस इरादे में सफल होंगे? मुश्किल यह है कि सपा का राजनीतिक-सांगठनिक भविष्य केवल उसके संस्थापक के हाथों में नहीं है। वोटरों का फैसला ही अंतत: तय करेगा कि मुलायम सिंह की इस राजनीतिक विरासत का क्या होगा।

-सीएसडीएस में एसोसिएट प्रोफेसर और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक

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