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अमीरी के बरक्स ही देखी जाएगी गरीबी
शीतला सिंह
Updated Fri, 26 Jul 2013 08:20 PM IST
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योजना आयोग के नए मूल्यांकन के अनुसार, 2011-12 में गरीबी की सीमा रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या घटकर अब 21.9 प्रतिशत रह गई है, जो पहले 37.2 प्रतिशत थी। इसका सारा श्रेय आयोग केंद्र सरकार को देता है।
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इससे इनकार नहीं है कि देश में प्रगति हुई है। जब देश आजाद हुआ था, तब लोगों के खाने भर को अनाज उपलब्ध नहीं था। भारत को अमेरिका से खाद्यान्न आयात के संबंध में समझौता करना पड़ा था। आज हम खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हैं।
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अनेक खाद्य पदार्थों का हम निर्यात भी कर रहे हैं। गरीबों का चूल्हा जलता है। स्कूलों की ही नहीं, विश्वविद्यालयों की भी संख्या बढ़ी है। निजी क्षेत्र में शिक्षा सेवा नहीं, एक लाभकारी व्यवसाय का स्थान ले चुकी है। केंद्र सरकार ने 14 वर्ष तक के बच्चों की अनिवार्य शिक्षा को, जिसे संविधान में राज्य का दायित्व बताया गया था, स्वीकार किया है। इसका विस्तार दलित, वंचित और आदिवासी क्षेत्रों में करने का प्रयत्न हो रहा है।
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लेकिन गरीबी और अमीरी को संख्या के आधार पर नहीं पहचाना जा सकता। गरीबी की परिभाषा का आखिर पैमाना क्या होगा? पहले एक हाकिम तहसील का वेतन साढ़े चार सौ रुपये मासिक हुआ करता था, जबकि देहातों में खेत मजदूर चार आने दैनिक से भी कम पर काम करता था। अब वेतन लाखों में पहुंच गया है और खंड विकास अधिकारियों को भी गाड़ी प्रदान की गई है।
पहले लखपति होना आर्थिक रूप से सम्मान का कारण था, पर अब करोड़पति भी कोई खास गिनती में नहीं रह गए हैं। इसलिए गरीबी और अमीरी का सापेक्षिक रूप से ही मूल्यांकन संभव होगा कि कौन किससे, कितना गरीब या अमीर।
यदि इस आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा, तो यह देखा जाएगा कि गांवों में 27 रुपये रोज पाने वाला आदमी उपलब्ध बाजार में कितना सक्षम हो गया है, जिससे वह पुरानी स्थिति में बदलाव कर सके। पहले उसके पहनने के लिए धोती एक रुपये में मिलती थी, अब उसका दाम सौ रुपये हो गया है। शहरों में कभी साढ़े छह आने में खाना उपलब्ध था, अब वह 60 रुपये पहुंच गया है।
पहले विधायकों का भत्ता 200 रुपये और सांसद का 500 रुपये मासिक था। रोज के आधार पर हिसाब लगाएं, तो वह क्रमशः 6.77 और 16.67 रुपये था। पर यह गणना इसलिए निरर्थक हो गई है, क्योंकि वह राशि गरीबी की सीमा रेखा से भी बहुत नीचे है।
इसलिए संविधान निर्माताओं ने राज्य के लिए जो निदेशात्मक सिद्धांत तय किए थे, वह आमदनी के आंकड़ों के बजाय इस बात पर आधारित थे कि गरीबी और अमीरी का अंतर घटाना राज्य का दायित्व होगा।
ग्यारह पंचवर्षीय योजनाओं के बाद यह क्या घटा है या बढ़ा है? योजना आयोग भी मानता है कि यह अंतर घटने के बजाय बढ़ता जा रहा है। इसकी वजह यह है कि योजनाओं का लाभ मुख्य रूप से समाज के खास वर्गों एवं समुदायों को ही मिल रहा है। जब छठे वेतन आयोग द्वारा सरकारी कर्मचारियों के वेतन एवं भत्तों का निर्धारण हो रहा था, तो एक परिवार में औसतन पांच सदस्य माना गया।
लेकिन यह मानक स्वीकार नहीं किया गया कि देश में प्रति व्यक्ति औसत आय और तनख्वाह में कोई अंतर्संबंध हो या नहीं। इस बारे में भी नहीं सोचा गया कि न्यूनतम आय के साथ अधिकतम आय का अनुपात भी निर्धारित करेंगे या नहीं।
जब संविधान के निदेशात्मक सिद्धांतों में परिवर्तन किए बगैर यह अंतर बढ़ता जाएगा, तब क्या इसे समतामूलक समाज का गुण माना जाएगा? यह अंतर सामाजिक समरसता बनाएगा या बिगाड़ेगा? तथ्य यह है कि मनरेगा के तहत साल में जो सौ दिन काम मिलता है, वह भी सभी इच्छुकों को नहीं मिलता। मनरेगा की मजदूरी शुरू में सौ रुपये दैनिक तय की गई थी, लेकिन यह नहीं किया गया था कि इसका लाभ उन मजदूरों को भी मिलेगा, जो अवयस्क, अपाहिज, वृद्ध या काम करने में असमर्थ हैं।
ऐसे में, सामाजिक सुरक्षा गारंटी आखिर कैसे तय की जाएगी? इसलिए कुल मिलाकर, योजना आयोग की यह घोषणा आंकड़ों की बाजीगरी मात्र है। जब तक गरीबी और अमीरी का अंतर नहीं घटेगा, तब तक दैनिक उपभोग के आधार पर गरीबी रेखा तय करने का कोई औचित्य ही नहीं है।