स्वास्थ्य सेवा की बदहाल तस्वीर, विधानसभा चुनाव में यह राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं?
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विस्तार
महाराष्ट्र के परभणी जिले के उस बढ़ई की पीड़ा भला किसे याद है, जिसे हाल ही में नांदेड़ के शंकरराव चव्हाण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में अपने तीन दिन के नवजात बच्चे को खोना पड़ा था। परभणी के डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि सिजेरियन सेक्शन ऑपरेशन के दौरान, जिसे आमतौर पर सी-सेक्शन कहा जाता है, बच्चे के शरीर में दूषित पानी चला गया है, इसलिए उसे वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत है। बेहतर इलाज की उम्मीद में तीन दिन के नवजात शिशु के पिता ने परभणी से नांदेड़ सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए 80 किलोमीटर का लंबा सफर तय किया। हालांकि नांदेड़ का शंकरराव चव्हाण सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भी चिकित्सा आपूर्ति की भारी कमी से जूझ रहा था, जिसके चलते अंततः नवजात बच्चे की जान चली गई। वह पिता पूरी तरह टूटकर तबाह हो गया। एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के संवाददाता से उन्होंने कहा, ‘मुझे यह समझ में नहीं आता कि मैं अपनी पत्नी को जाकर क्या बताऊं। वह तो यह हृदय विदारक खबर सुनकर जीते-जी मर जाएगी।’
उसी अस्पताल की बदइंतजामी के कारण एक अन्य व्यक्ति योगेश सोलंकी भी अपने परिजन की मृत्यु से शोकाकुल थे। उनके भाई के एक दिन के नवजात बच्चे की मौत भी उसी अस्पताल में हो गई थी। सोलंकी ने मीडिया को बताया कि उस सप्ताहांत अस्पताल के नवजात शिशु वार्ड में बहुत भीड़ थी, जहां नवजात शिशुओं का इलाज किया जा रहा था। हालत इतनी बुरी थी कि जहां एक इनक्यूबेटर में केवल एक शिशु को रखने की व्यवस्था होती है, वहां चार से पांच शिशुओं को रखा गया था। युद्ध, बम धमाके, प्राकृतिक आपदाओं की लगातार आती खबरों के बीच हम ऐसे लोगों की पीड़ाओं को भला कितनी जगह दे पाते हैं!
नांदेड़ मेडिकल कॉलेज 600 बिस्तरों का अस्पताल होने का दावा करता है, जहां महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ के साथ-साथ तेलंगाना के सीमावर्ती जिलों के मरीजों का इलाज होता है। स्थानीय मीडिया लगातार इस मेडिकल कॉलेज की बदतर स्वास्थ्य सुविधाओं की खबरें प्रकाशित करता रहा है। हालांकि 30 सितंबर और एक अक्तूबर को स्थिति और भी बदतर थी, जब चिकित्सा सामग्रियों की आपूर्ति और चिकित्साकर्मियों, दोनों की भारी कमी थी।
नतीजतन मात्र 48 घंटों के भीतर नांदेड़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में मरने वालों की संख्या 35 हो गई थी, जिनमें से 16 शिशु थे। यही नहीं, देश के सबसे संपन्न राज्यों में गिने जाने वाले महाराष्ट्र के ही छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 14 अन्य लोगों की जान चली गई, जो राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की बदहाली का प्रतीक है। एक के बाद एक हुई मौत देश भर के मीडिया में सुर्खी बनी, लेकिन फिर नई-नई खबरें आने के बाद सब कुछ सामान्य हो गया। यह सिर्फ मात्र एक राज्य के किसी खास सरकारी अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि देश भर के अधिकांश सरकारी अस्पताल इसी तरह की बुनियादी सुविधाओं, चिकित्सा सामग्रियों और चिकित्साकर्मियों की कमी से जूझ रहे हैं। हम पहले भी इस तरह की स्थितियों से गुजर चुके हैं। जैसा कि अक्सर होता है, इस बार हुई मौतों की भी जांच चल रही है। उम्मीद करनी चाहिए कि इन जांच निष्कर्षों से हम गंभीरतापूर्वक यह समझ पाएंगे कि आखिर गलती कहां हुई? हालांकि हम पहले से ही कुछ कड़वा सच जानते हैं।
महाराष्ट्र सरकार ने इस साल मार्च में चिकित्सा वस्तु खरीद प्राधिकरण अधिनियम, 2023 पारित किया है। इस तरह का कानून पारित करने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों के लिए दवाओं, चिकित्सा वस्तुओं, चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों, यंत्रों, उपकरणों आदि की एकल बिंदु खरीद और आपूर्ति के लिए एक समर्पित प्राधिकरण की स्थापना करना है। इससे सार्वजनिक अस्पतालों में दवाओं की कमी को कम करने में मदद मिलती, लेकिन इस कानून को लागू करने में देरी हुई।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, समिति के गठन, प्रोटोकॉल की स्थापना, आदि से संबंधित मुद्दों के कारण इस कानून को लागू किए जाने में देरी हुई। निविदाएं अगस्त के मध्य में ही शुरू हुईं और चूंकि दवाओं की खरीद एवं वितरण में आम तौर पर एक से दो महीने का समय लग जाता है, इसलिए दवाओं की कमी हुई। यह इस संकट के कई कारणों में से केवल एक कारण है। दवा खरीद की दोषपूर्ण प्रणाली (जिसके चलते दवाओं की भारी कमी पैदा हुई) के अलावा चिकित्सा कर्मियों की भी भारी कमी थी।
बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय के नेतृत्व में हाईकोर्ट की एक पीठ ने महाराष्ट्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की बदहाली पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है और निजी अस्पतालों पर इसका बोझ नहीं डाल सकता है। पीठ ने कहा कि स्वास्थ्य प्रणाली को सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त डॉक्टर, पैरामेडिकल स्टाफ और उपकरण उपलब्ध कराना होगा।
आश्चर्य की बात नहीं कि महाराष्ट्र में विपक्ष ने इस संकट को राज्य सरकार की आलोचना करने के एक अवसर के रूप में भुनाया। राज्य सरकार ने अस्पताल में हुई मौतों की जांच कर रिपोर्ट सौंपने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया और कहा कि सरकार नहीं चाहती है कि इन मौतों का ‘राजनीतिकरण’ किया जाए। लेकिन यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि महाराष्ट्र सरकार ने कथित तौर पर 2022-23 से 2023-24 तक सार्वजनिक स्वास्थ्य के बजटीय आवंटन में सात फीसदी की कमी क्यों कर दी। बेशक नांदेड़ के अस्पताल में हुई मौतों को लेकर महाराष्ट्र कठघरे में है, लेकिन यह कहना गलत होगा कि इस तरह की समस्या केवल महाराष्ट्र तक सीमित है। भारत इलाज का खर्च वहन करने में सक्षम लोगों को विकसित देशों की तरह चिकित्सा सेवा प्रदान करने की पेशकश करता है। लेकिन उन लोगों का क्या, जो न तो इलाज का भारी खर्च वहन कर सकते हैं और न जिनके बड़े लोगों के साथ संपर्क हैं? ऐसे लोग भीड़ भरे, कम संसाधनों और कम सुविधाओं वाले अस्पतालों में लगातार कष्ट झेलते रहते हैं।
सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं, पूरे देश में गरीबों के बच्चे बेवजह मरते हैं। देश के लगभग सभी राज्यों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली कर्मचारियों और उपकरणों की कमी से जूझ रही है। लेकिन विधानसभा चुनावों के दौर में यह राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं है?