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भूख पर इतनी सियासत
सीताराम येचुरी
Updated Wed, 12 Jun 2013 09:44 PM IST
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संप्रग सरकार की मंशा खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने की है। याद रहे कि जब यूपीए-द्वितीय की सरकार ने शासन संभाला था, उसी समय राष्ट्रपति ने संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में अपने संबोधन में, उन कदमों का उल्लेख किया था, जो उनकी सरकार अपने पहले सौ दिन में ही उठाने जा रही थी।
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अन्य कदमों के अलावा इस सूची में प्रमुखता से खाद्य सुरक्षा विधेयक के पारित कराए जाने को भी शामिल किया गया था। उसके बाद से चार बरस से ज्यादा गुजर चुके हैं, लेकिन सरकार अब तक संसद में विचार तथा स्वीकृति के लिए यह विधेयक ला नहीं पाई है।
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संविधान में संसद के किसी विशेष सत्र का कोई प्रावधान ही नहीं है। संविधान की धारा-85 (1) में सिर्फ इतना कहा गया है, ‘राष्ट्रपति समय-समय पर संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाएंगे, जिसके समय तथा स्थान का चयन वह खुद करेंगे। मगर एक सत्र की आखिरी बैठक और अगले सत्र की निर्धारित पहली बैठक के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतराल नहीं होना चाहिए।’
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इसलिए, केंद्रीय मंत्रिमंडल के परामर्श से राष्ट्रपति, परंपरा से स्थापित तीन सत्रों- बजट, मानसून तथा शीतकालीन- के अतिरिक्त भी संसद की बैठक बुला सकते हैं। लेकिन, चूंकि मानसून सत्र सामान्यतः जुलाई के महीने में शुरू होता है, इसलिए उससे पहले कोई अतिरिक्त सत्र बुलाने की अब शायद ही कोई तुक रह जाती है।
इतना तो साफ ही है कि अंदर खासी खींचतान के बाद ही सरकार ने आखिरकार यह प्रस्ताव पेश किया है कि एक परिवार को 25 किलोग्राम चावल या गेहूं या मोटा अनाज, प्रति किलोग्राम क्रमशः तीन, दो या एक रुपये की दर से उपलब्ध कराया जाए। देश भर में कुल 67 फीसद परिवारों को ही इस सुरक्षा के दायरे में लाया जाएगा, ग्रामीण भारत में 75 फीसद और शहरी भारत में 50 फीसद परिवारों को।
लेकिन, इतनी खाद्य सुरक्षा हमारे देश से भूख तथा कुपोषण को मिटाने के लिए अपर्याप्त है। सार्थक खाद्य सुरक्षा तो तभी सुनिश्चित की जा सकती है, जब देश भर में सभी परिवारों (कम से कम 90 फीसद परिवारों) को हर महीने 35 किलोग्राम अनाज, ज्यादा से ज्यादा दो रुपये प्रति किलोग्राम की दर से उपलब्ध कराया जाए। इससे घटकर कोई भी कदम, हमारी जनता को चौतरफा खाद्य सुरक्षा मुहैया नहीं करा सकता है।
पुनः जनता के लिए कोई सार्थक खाद्य सुरक्षा तो तभी सुनिश्चित की जा सकती है, जब सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौम बनाया जाए और देश की समूची आबादी को उसके दायरे में लाया जाए। लेकिन, ऐसा करने की जगह सरकार राशन की दुकानों से सस्ते दाम पर आवश्यक वस्तुओं के वितरण के विकल्प के तौर पर, प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की अपनी योजना को आगे बढ़ाने में लगी हुई है।
अगर इसे लागू कर दिया जाता है, तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली निरर्थक होकर रह जाएगी। इसके गंभीर दुष्परिणाम होंगे। आज स्थिति यह है कि खुद सरकार, निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदती है। खाद्यान्न के इसी भंडार में से अनाज, निर्धारित दाम पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये जनता को बांटा जाता है।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ध्वस्त होने के बाद, सरकार को किसानों से अनाज खरीदने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। इस तरह वह किसानों को उनकी पैदावार का उचित दाम दिलाने की जिम्मेदारी से भी बच जाएगी। इस तरह किसान को उस आर्थिक सुरक्षा से भी वंचित कर दिया जाएगा, जो कितनी ही कमजोर क्यों न हो, अब तक किसान को हासिल होती रही है।
इस तरह, प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण की व्यवस्था जनता को खाद्यान्न मुहैया कराने तथा इस तरह उसकी भूख व कुपोषण से रक्षा करने की जिम्मेदारी से बचने का मौका देती ही है, किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मुहैया कराने की जिम्मेदारी से भी बचने का अवसर देती है।
लिहाजा ऐसा लगता है कि सरकार जनता की आंखों में धूल झोंकने का खेल, खेल रही है। जरूरत संसद का विशेष सत्र बुलाने की नहीं, जनता को सच्ची खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने के सरकार के विशेष संकल्प की है। सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौम बनाने के लिए जरूरी आवंटन करने चाहिए, ताकि जनता को इसकी सामर्थ्य मुहैया कराई जा सके।