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राजनीति: बंगाल में हो क्या रहा है, कब चलेगा उनपर बुलडोजर जो महिला अस्मिता को तार-तार कर रहे?

Tue, 02 Jul 2024 06:36 AM IST
Bimal Rai बिमल राय
Updated Tue, 02 Jul 2024 06:36 AM IST
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सार
ममता सरकार फुटपाथों से 'बाहरी' हॉकरों को हटाने में लगी है, पर उन पर कब बुलडोजर चलेगा, जो महिला अस्मिता को तार-तार कर रहे हैं?
 
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Politics: When will action be taken in Bengal against those who are destroying women identity?
पश्चिम बंगाल में हिंसा - फोटो : एएनआई

विस्तार

भारत के कई क्षेत्रीय दल समय-समय पर राजनीतिक कारणों से क्षेत्रीय अस्मिता का खेल खेलते रहे हैं। महाराष्ट्र से शुरू हुआ कट्टर अस्मिता का जयगान कई राज्यों में होता रहा है। इसे राजनीतिक रोग व रणनीति, दोनों कह सकते हैं। रणनीति इसलिए, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता जहरीला तत्व स्वत: नहीं पैदा करती। किसी राज्य के लोग अगर अपनी संस्कृति और परंपरा से जुड़े रहना चाहते हैं, तो यह अच्छी बात है। लेकिन भारत में किसी राज्य की सरकार यदि दूसरे राज्य के लोगों को बाहरी बताए, तो यह राष्ट्रीय अखंडता पर चोट ही है।



फिलहाल, एक बार फिर बंगाली अस्मिता चर्चा में है। हाल के लोकसभा चुनाव परिणाम के विश्लेषण से पता चला कि तृणमूल कांग्रेस का शहरी वोटबैंक खिसक रहा है, जिससे दीदी चिंतित हैं। कोलकाता नगर निगम के कुल 144 वार्डों में 47 पर भाजपा को बढ़त मिली है। पिछले नगर निगम चुनाव में 10 वार्डों में ही जीत मिली थी। कोलकाता और आसपास के इलाकों में विधानसभा की 28 सीटें हैं। राज्य के 60 प्रतिशत नगर निगमों व पालिकाओं में भाजपा की साफ बढ़त दिखी है। बंगाल में ऐसे कुल 125 निकाय हैं। 2021 में भाजपा 69 निकायों में आगे थी।


उनका मानना है कि शहरों में बाहरी लोग बढ़ गए हैं, इसलिए उन्होंने ‘हॉकर हटाओ’ अभियान शुरू किया है। जबकि नवंबर, 1996 में वाममोर्चा सरकार के 'ऑपरेशन सनशाइन' का हश्र वह देख चुकी हैं। उस समय उन्होंने खुद हॉकरों के पक्ष में फुटपाथ पर बैठकर आंदोलन किया था। असल में भ्रष्टाचार की वजह से शहरी वोटर ममता सरकार से नाराज हैं। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में राज्य, खासकर कोलकाता व उपनगरों का जनसांख्यिकी संतुलन बिगड़ने पर चिंता जताई। उन्हें लगता है कि कुछ समय बाद शहरी क्षेत्रों में बांग्ला बोलने वाले अल्पमत में आ जाएंगे। उनके मुताबिक, पैसे लेकर हॉकरों को फुटपाथों पर जगह दी जा रही है। उन्होंने कई विधायकों, मेयरों, नगरपालिका अध्यक्षों और पार्षदों के अलावा पुलिस प्रशासन के एक बड़े हिस्से को हफ्तावसूली जैसे भ्रष्टाचार में लिप्त माना।

बताया जा रहा है कि पुलिस जैसे ही अपनी कार्रवाई के लिए कुछ संवेदनशील इलाकों की तरफ बढ़ी, तो दीदी ने ऑपरेशन रोक कर हॉकरों को एक महीने का समय दे दिया। सवाल उठता है कि 4-5 दिनों के अभियान में उजाड़े गए हॉकरों को एक महीने का समय क्यों नहीं दिया गया, जो इस मौसम में पुलों के नीचे या खुले में बाल-बच्चों को लेकर रह रहे हैं?

इस पर राजनीति भी हो रही है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी का आरोप है कि सिर्फ हिंदू हॉकरों को ही हटाया जा रहा है। माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि शत्रुघ्न सिन्हा, यूसुफ पठान व कीर्ति आजाद जैसे 'बाहरी' लोगों को अपनी पार्टी के टिकट पर संसद भेजने वाली ममता का बाहरी राग मौजूं नहीं है।

ममता को पता है कि कोलकाता ही नहीं, पूरे बंगाल का जनसांख्यिकी संतुलन किन समुदायों की घुसपैठ से बिगड़ रहा है। अगर उनका इशारा हिंदी भाषियों की ओर है, तो वह दौर अब सिर्फ लोकगीतों में ही दिखता है। अब तो नायिकाएं शायद यह गीत गाएंगी कि 'पूरब न जइयो सैंया चाकरी नहीं है।' भ्रष्टाचार, बंद होते  कारखानों व नया निवेश नहीं होने से पढ़े-लिखे बंगाली नौजवान रोजगार के लिए दूसरे राज्यों का रुख कर रहे हैं। कूचबिहार जिले के माथाभांगा में 25 जून को एम महिला को नंगा कर इसलिए घुमाया गया कि वह भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे का सदस्य थी। इसी तरह, उत्तर दिनाजपुर के चोपड़ा में 'शरिया अदालत' ने एक युवक-युवती को सरेआम पीटने का फरमान सुनाया। विधायक हमीदुर्रहमान के करीबी ताजेमुल नाम के तृणमूल कार्यकर्ता ने दोनों को चौराहे पर पीटा। हमीदुर्रहमान तो पीडि़ता को ही ‘दुष्ट जानवर’ कह रहे हैं। सवाल यह है कि ममता पुलिस, प्रशासन और अपने कैडरों की मिलीभगत पर कब अंकुश लगाएंगी?

शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार उजागर होने पर लगा कि ममता इस विभाग को पटरी पर लाएंगी, पर हाल ही में माध्यमिक शिक्षा परिषद के मुखिया ने बताया कि इस साल 41 हजार परीक्षार्थियों ने उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन का आवेदन किया, जिसमें से 12,468 छात्रों के खातों में अंक जोड़ने की गलतियां पाई गईं। मूल्यांकन के बाद चार छात्रों के रैंक बदल गए। कहीं यह कारनामा नौकरी खरीदने वाले 'मास्टर मोशाय' ने तो नहीं किया है? इन पर कब बुलडोजर चलेगा?

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