फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Politics on Uniform Civil Code UCC Simple and easy solutions to social problems

राजनीति: समान नागरिक कानून पर सियासत, इसके खिलाफ एकजुट होने की दरकार

Mukhtar Abbas Naqvi मुख्तार अब्बास नकवी
Updated Sat, 24 Jun 2023 08:19 AM IST
विज्ञापन
सार
अगर सिविल कोड लागू होता है, तो नागरिक समस्याओं का सरल-सुलभ समाधान समानता के सिद्धांत के साथ हो सकेगा।
loader
Politics on Uniform Civil Code UCC Simple and easy solutions to social problems
समान नागरिक संहिता - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संविधान सभा से लेकर संसद, सड़क, समाज, सुप्रीम कोर्ट तक आजादी के सात दशकों के दौरान पंथनिरपेक्ष, जनतांत्रिक, समाजवादी संविधान को समान नागरिक संहिता से सुसज्जित करने की समावेशी बेचैनी सांप्रदायिक बवाल का साक्षी रही है। समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर फिर से राष्ट्रीय बहस की प्रभावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही 'तर्कों की ताकत-कुतर्कों की आफत' से देश जूझ रहा है। समान नागरिक संहिता देश के समावेशी संकल्प, सोच, संस्कृति को सशक्त करने का सुरक्षा कवच है।



नवंबर, 1948 में संविधान सभा में समान नागरिक संहिता के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा हुई। डॉ. आंबेडकर, पंडित नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, के एम मुंशी, बेगम ऐजाज रसूल सहित तमाम सदस्यों का मत था कि स्वतंत्र, पंथ निरपेक्ष व्यवस्था के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है। स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों और संविधान सभा के अन्य सदस्यों ने भी इसका समर्थन किया था। इसके बावजूद समान नागरिक संहिता संविधान का अनुच्छेद बनने के बजाय दिशा-निर्देश का हिस्सा (आर्टिकल 44 के अंतर्गत) बनकर रह गया। इस पर जब भी चर्चा हुई, तो 'सामाजिक सुधार' पर 'सांप्रदायिक वार' हावी होता रहा। आज भी इसे इस्लाम पर हमला बताने की सियासी साजिश जारी है।


इसकी मुखालफत करने वाले भी जानते हैं कि दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में समान कानून या समान नागरिक कानून लागू हैं, जहां सभी पंथों, संप्रदायों, आस्थाओं को मानने वाले धार्मिक आस्था और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के साथ रहते हैं। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जहां दस फीसदी से भी कम मुस्लिम आबादी है, लेकिन वहां समान नागरिक कानून होने के बावजूद ईमान और इंसाफ, दोनों मजबूत और महफूज हैं, तो भारत में, जहां 19 करोड़ या 14-15 फीसदी मुस्लिम आबादी है, समान नागरिक कानून से इस्लाम पर कैसे आक्रमण हो जाएगा?

भारत में समय-समय पर इसकी मांग उठती रही है। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार कह चुका है कि समान नागरिक संहिता राष्ट्रीय एकता को मजबूती देगी। 1985 के शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और उस समय की कांग्रेस सरकार का उस फैसले को निष्प्रभावी बनाने का घुटना टेकू निर्णय समान नागरिक संहिता के सफर का सबसे काला अध्याय रहा। कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत की ताकत से सामाजिक सुधार के स्वर्णिम अवसर को सांप्रदायिक सियासत की बलि चढ़ा दी। 2015 में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर समान नागरिक संहिता की जरूरत पर जोर दिया।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में सामाजिक न्याय और समानता के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड मुल्क और मानवता की जरूरत है। यूनिफॉर्म सिविल कोड महिलाओं की सामाजिक समानता, न्याय और उनके आर्थिक-सामाजिक सशक्तीकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यह राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने में मददगार होगा। भारत जैसे पंथनिरपेक्ष देश के लिए यह जरूरी है कि यहां के हर नागरिक के लिए एक समान कानून हो, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। अगर सिविल कोड लागू होता है, तो नागरिक समस्याओं का सरल-सुलभ समाधान समानता के सिद्धांत के साथ हो सकेगा।

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र न्याय और समानता के लोकतांत्रिक-पंथनिरपेक्ष सिद्धांतों, संकल्पों को सार्थक करने के लिए आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान भी इंसाफ के इंतजार में है। उम्मीद करनी चाहिए कि अमृत काल में समान नागरिक संहिता पर हो रहे मंथन से अमृत जरूर निकलेगा। यह देश के लिए अमृत काल का बेशकीमती उपहार साबित हो सकता है।

मगर अफसोस कि समान नागरिक संहिता पर सांप्रदायिक सियासत का सिलसिला अब भी नहीं रुका है। आज भी तर्क दिए जा रहे हैं कि समान नागरिक संहिता धार्मिक आस्थाओं और आदर्शों पर हमला है। इस 'कुतर्क के कारीगरों' की 'कम्युनल करतूत' के पीछे वोटों की सांप्रदायिक तिजारत है। समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर ऐसी ताकतों को शिकस्त देने का यही सही समय है।
-लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed