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राहत पर हावी राजनीति

Fri, 28 Jun 2013 09:23 PM IST
Updated Fri, 28 Jun 2013 09:23 PM IST
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politics on relief

उत्तराखंड की आपदा ने पूरे देश को प्रभावित किया है। देश के कोने-कोने से आए लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं। ऐसे अवसर पर जिस किस्म की संवेदना और गंभीरता चाहिए, वह हमारे राजनेताओं में नहीं दिखती। कांग्रेस और तेदेपा के राजनेता देहरादून हवाई अड्डे पर पीड़ितों को वापस ले जाने के मुद्दे पर भिड़ गए। राहुल गांधी के उत्तराखंड दौरे पर विशेष व्यवस्था करने के ब्योरे आए हैं। नरेंद्र मोदी का आना और कई मुद्दों पर उनकी टिप्पणियां विवाद का विषय बनीं।

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उन्होंने केदारनाथ मंदिर बनाने की जो बात कही, उसकी काफी आलोचना हुई। केदारनाथ चार धामों में से एक है, जिसके प्रति देश के लोगों में जबरदस्त आस्था है। कहा जाता है कि शिव ने पार्वती जी को कहा था, केदार मुझे इतना प्रिय है कि मैं न कभी इसे छोड़ूंगा और न भूलूंगा। यहां जो भी मृत्यु को प्राप्त होता है, वह शिव में विलीन हो जाता है।
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याद रहे, वर्ष 1974 में बद्रीनाथ मंदिर को बिरला परिवार तोड़कर बिरला मंदिर की तरह बनाना चाहता था। उनके साथ बद्रीनाथ के पंडे ही नहीं, जनसंघ (भाजपा) और कांग्रेस भी थी। बद्रीनाथ मंदिर के पत्थर निकालने का कार्य भी आरंभ हो गया था। उस समय चिपको आंदोलन के नेता चण्डी प्रसाद भट्ट के साथ स्थानीय लोगों ने विरोध किया था। बद्रीनाथ मंदिर को उत्तराखंड शैली में रखने के लिए इतना बड़ा आंदोलन हुआ कि वह मंदिर जैसा का तैसा बना रहा।
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इसलिए भाजपा और कांग्रेस को मंदिर बनाने के बजाय आपदा का मुकाबला करने और हिमालय के तथाकथित विकास नीति को परिवर्तित करने के बारे में सोचना चाहिए, जिसके तहत जल, जंगल और जमीन की लूट का ही काम हुआ है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तो लूट की रफ्तार और तेज ही हुई है।

आज उत्तराखंड के हर नेता को आपदा पीड़ित तक पहुंचने के लिए हेलीकॉप्टर चाहिए। इसीलिए उत्तराखंड के कृषि मंत्री हरक सिंह रावत ने हेलीकॉप्टर में राहत के लिए भेजा गया सामान उतारकर यात्रा करना उचित समझा। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा हादसे के समय प्रभावित क्षेत्र में नहीं थे। हद तो तब हो गई, जब भाजपा के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने हेलीकॉप्टर में एक टीवी चैनल वाले को ले जाकर केदारनाथ मंदिर के सामने लाशों के बीच इंटरव्यू करवाया। वर्ष 1978 में उत्तरकाशी में जब भीषण बाढ़ आई थी, तब विपरीत विचारधारा के होने के बावजूद कमला राम नौटियाल और इंद्रमणि बडोनी साथ-साथ पूरे क्षेत्र में पैदल घूमे थे। पिछले वर्ष अमेरिका में प्राकृतिक आपदा आई थी। पर चुनाव का वर्ष होने के बावजूद दोनों दलों ने मिलकर राहत-कार्य किया और आपदा में राजनीति नहीं आने दी। हमारे देश में यह संभव नहीं है।

कांग्रेस को नरेंद्र मोदी के उत्तराखंड में आने का इतना भय हुआ कि केंद्रीय गृह मंत्री ने आदेश जारी कर दिया कि कोई वीआईपी आपदा क्षेत्र में नहीं जाएगा। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने तो यहां तक कह दिया कि उत्तराखंड जाकर घड़ियाली आंसू बहाने वाले तथा सरकार को कोसने वाले नेता सिर्फ अपनी फोटो छपवाने के लिए यह कार्य कर रहे हैं। भाजपा ने जब पलटवार किया कि इस भयानक त्रासदी के समय राहुल गांधी कहां हैं, तो चौबीस घंटे के भीतर ही कांग्रेस के उपाध्यक्ष उत्तराखंड में प्रकट हो गए। गृह मंत्री के आदेश को दरकिनार करते हुए राहुल गांधी पीड़ितों के बीच पहुंचे। साफ है कि उत्तराखंड की इस त्रासदी पर कांग्रेस व भाजपा, दोनों पार्टियां जमकर राजनीति कर रही हैं।


उत्तराखंड में आपदा से मुकाबले के लिए जो राशि आती है, वह नेताओं और नौकरशाहों की जेब में चली जाती है। इस राज्य के अस्सी प्रतिशत नेता ठेकेदारी से जुड़े हैं। ऐसे में राहत राशि का बंटाधार तो होगा ही! वर्ष 2010 में अल्मोड़ा में और पिछले साल उत्तरकाशी में आई विपदा के दौरान करोड़ों रुपये आए, पर आम लोगों को राहत नहीं मिली। कोई यह पूछने वाला नहीं है कि वे रुपये कहां गए। उत्तरकाशी में अस्सी गंगा से 2012 में प्रभावित लोगों का पुनर्वास तो हुआ नहीं, उलटे इस साल वह इलाका फिर तबाह हो गया। इसलिए उत्तराखंड को आज राहत के साथ-साथ भष्टाचार मुक्त सरकार व प्रशासन की जरूरत है।

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