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राजनीति का अनुदान
अफलातून
Updated Sun, 22 Sep 2013 06:43 PM IST
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हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाए रखने में उस जमाने की शिक्षा व्यवस्था का अहम योगदान रहता है। इसमें उच्च शिक्षा की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। इसकी अपनी एक दुनिया है। यह व्यापक समाज की उपव्यवस्था भी है। नीचे से ऊपर तक हर स्तर पर छंटनी करते हुए उच्च शिक्षा ऐसे छंटे हुए मुट्ठी भर लोगों को व्यवस्था के संचालन और यथास्थिति को बरकरार रखने के लिए हासिल कर लेती है।
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विश्वविद्यालयों और उन्हें दिए जाने वाले अनुदानों को संचालित करने वाले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता और उनके आंतरिक लोकतंत्र की सेहत पर चर्चा का एक मौका मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सदस्य योगेंद्र यादव की बर्खास्तगी से मिला है।
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आजादी से पहले विश्वविद्यालयों और समाज के बीच सेतु का काम 'विश्वविद्यालय कोर्ट' किया करती थी। विश्वविद्यालयों की यह सर्वोच्च समिति कुलपति और कार्यकारिणी के सदस्यों का चुनाव भी करती थी। विश्वविद्यालय के पूर्व स्नातकों के अलावा समाज के विभिन्न तबकों की नुमाइंदगी कोर्ट में हुआ करती थी। काशी विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदनमोहन मालवीय के पुत्र गोविंद मालवीय द्वारा विश्वविद्यालय कोर्ट में बतौर कुलपति पेश एक प्रस्ताव के गिरने के बाद उन्हें पदत्याग करना पड़ा था। अगले कुलपति के रूप में आचार्य नरेंद्र देव आए थे।
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आचार्य जी के कुलपति बनने का जिक्र योगेंद्र यादव और उनके समर्थन में ज्ञापन भेजने वाले प्रोफेसर आनंद कुमार ने किया है, परंतु उनके चयन की प्रक्रिया आज की तुलना में ज्यादा लोकतांत्रिक थी, यह नहीं बताया। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी मसले की गंभीरता को बिना समझे कह दिया, आचार्य जी के गुजरने के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना हुई। क्या इस जवाब से यह निहितार्थ नहीं निकलता कि अनुदान आयोग यदि होता, तो आचार्य जी कुलपति बनने लायक नहीं माने जाते?
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि उच्च शिक्षा को संचालित करने की इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों में इन संस्थाओं की स्वायत्तता उत्तरोत्तर कम होती गई है और राजनीतिक रेवड़ियां बांटने जैसी बात बढ़ गई है। लाजिमी तौर पर नियुक्तियां यदि राजनीतिक हो रही हैं, तब राजनीतिक बर्खास्तगी भी बहस का मुद्दा नहीं है।
बहरहाल, आजादी मिलने के बाद केंद्रीय विश्वविद्यालयों को संचालित करने वाले कानूनों में जो प्रमुख तब्दीली लाई गई, उसके तहत 'विश्वविद्यालय कोर्ट' को मात्र सलाहकार-निकाय बना दिया गया। विश्वविद्यालय में सलाहकार की हैसियत वाले चांसलर के चयन के अलावा उसके समस्त अधिकार समाप्त कर दिए गए। इस संशोधन के वक्त सरकार ने कहा कि अब समाज और विश्वविद्यालय के बीच पुल का काम संसद करेगी।
जाहिर है, विश्वविद्यालयों की दैनंदिन गतिविधियों पर चर्चा का मौका निकालना संसद के लिए सरल नहीं। विश्वविद्यालयों की सर्वांगीण जांच कराने के विजिटर के अधिकार का उपयोग देश में सिर्फ दो बार हुआ है- मुदलियार आयोग तथा गजेंद्र गड़कर आयोग। दोनों ही बार कानून में संशोधन और संशोधित कानून को नए कुलपति के साथ लागू किए जाने की संस्तुति की गई।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग में सदस्य और अध्यक्ष का मनोनयन पूरी तरह से सरकार करती है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति जैसे विजिटर (राष्ट्रपति) के द्वारा होती है, उतना भी आयोग में नहीं होता। जाहिर है, योगेंद्र यादव की नियुक्ति भी इसी प्रक्रिया से हुई थी।
राजग सरकार के जमाने में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने काशी विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर को छात्र संघ चुनाव के दौरान हुई हत्या का दोषी पाया। उत्तर प्रदेश की सीबीसीआईडी ने उनके खिलाफ हत्या का अभियोग-पत्र दाखिल किया। इसके बाद भी तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री ने कुलपति को आश्वस्त कर दिया कि उनकी पुनर्नियुक्ति होगी। तत्कालीन विजिटर ने मानवाधिकार आयोग की रपट को तरजीह देते हुए जब नए कुलपति की नियुक्ति कर दी, तब मानव संसाधन मंत्री ने उसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।
किसी देश के लोकतंत्र की सेहत उस देश में मौजूद संस्थाओं में लोकतंत्र के सेहत से आंकी जा सकती है। विश्वविद्यालयों और अनुदान आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता में उत्तरोत्तर कमी आई है। समाज और विश्वविद्यालय के बीच सेतु का काम करने वाली कोर्ट को अधिकारविहीन बना दिए जाने के बाद विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का छीजन हुआ है। कुछ विश्वविद्यालयों में कार्यकारिणी तथा विद्वत परिषद के लिए अध्यापक प्रतिनिधि आम अध्यापकों द्वारा चुनकर भेजे जाते हैं, जो इन निकायों को एक लोकतांत्रिक आधार प्रदान करते हैं। यह प्रावधान सभी विश्वविद्यालयों के लिए अनुकरणीय है। आईआईटी जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में विभागाध्यक्षों की नियुक्ति विभाग के अध्यापकों के वोट से होती है, यह भी एक स्वस्थ अनुकरणीय लक्षण है।
दिल्ली से दूर स्थित केंद्रीय विश्वविद्यालयों की बाबत शिक्षा विभाग के नौकरशाहों की अलग दृष्टि होती है। मुदलियार तथा गजेंद्र गड़कर आयोग की रपट में वह व्यक्त हुई है। इन्होंने माना है कि ‘पूर्वांचल का कचरा’ इस विश्वविद्यालय में इकट्ठा हो रहा है। इस दृष्टि को काशी विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र लोहिया ने लोकसभा में चुनौती दी थी। अंग्रेजों के पिट्ठू रहे राजाओं के दीवानों तथा चापलूसों को आजादी मिलने के बाद कुलपति बनाने पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की थी।
क्या किसी भी राजनीतिक दल द्वारा इस विषय को अपने एजेंडे में लिया गया है?