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राजनीति : संकट से कैसे उबरेगी कांग्रेस, चुनावी रणनीतिकार पीके के साथ बैठकों का दौर शुरू
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Prashant Kishore and Sonia gandhi
- फोटो : AmarUjala
हाल ही में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी के दस जनपथ आवास पर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ हुई लंबी बैठक के बाद कई तरह की संभावनाएं बलवती हुई हैं। जितनी सूचनाएं बाहर आईं, उनके अनुसार, प्रशांत किशोर ने 2024 के लोकसभा चुनाव की संभावनाओं के लिए एक विस्तृत खाका पेश किया है। फिर भी, प्रश्न है कि क्या वह कांग्रेस का चुनावी भविष्य संवार पाएंगे?
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ध्यान रखिए, कुछ महीने पहले तक प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होकर महत्वपूर्ण पद संभालने की बात लगभग तय मानी जा रही थी। फिर खबर आई कि प्रशांत किशोर की बात राहुल गांधी से नहीं बनी। प्रशांत ने उसके बाद कई ऐसे ट्वीट किए, जो राहुल गांधी और पूरे परिवार के लिए सम्मानजनक तो नहीं थे। उन्होंने राहुल की राजनीतिक समझ पर भी प्रश्न उठाया। दोबारा उन्हें निमंत्रित किया गया है, तो मानना होगा कि परिवार और उनके समर्थकों के समक्ष इस समय अपने उद्धार के लिए दूसरा कोई उपयुक्त विकल्प नजर नहीं आया।
प्रशांत किशोर ने कांग्रेस के संदर्भ में अपना रोडमैप बिंदुवार और तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पार्टी को लोकसभा की 542 सीटों में से 370 से 400 सीटों पर ही फोकस करना चाहिए। राज्य विधानसभा चुनाव के बारे में उनका कहना था कि कुछ राज्यों में उसे अकेले लड़ना चाहिए। इनमें उन्होंने उन राज्यों को रखा जिसमें कांग्रेस या तो शीर्ष पर है, थी या दूसरे स्थान पर रही है। उत्तर प्रदेश बिहार और ओडिशा जैसे राज्यों में उनका मानना था कि कांग्रेस खत्म हो चुकी है, इसलिए उसे नए सिरे से शुरुआत करनी चाहिए और अपनी बदौलत।
उन्होंने इस बैठक में भाजपा के संदर्भ में भी प्रेजेंटेशन दिया। उन्होंने बताया कि भाजपा कहां-कहां कमजोर है। इसके लिए उन्होंने बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु तथा केरल का उदाहरण दिया, जहां लगभग 200 सीटों में अपनी तमाम लोकप्रियता के बावजूद भाजपा 50 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई। यानी उनके अनुसार, भाजपा की ताकत अब भी 350 सीटों पर ही सिमटी हुई है। उनका कहना था कि भाजपा को चुनौती दी जा सकती है।
उन्होंने कुछ ऐसी बातें बताईं, जिनसे कांग्रेस के अंदर उम्मीद पैदा हो सकती है। लेकिन दो पहलू ऐसे हैं, जिनको लेकर समस्याएं हैं। पहला, प्रशांत किशोर के कांग्रेस से संबंधों को लेकर है। अगर वह चुनावी प्रबंधन या रणनीतिकार के तौर पर कांग्रेस को सहयोग देते हैं, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं है। कांग्रेस में अगर वह महत्वपूर्ण पद पर आते हैं और मुख्य रणनीतिकार बनते हैं, नीति निर्माण में उनकी भूमिका होती है, तो इसे पूरी पार्टी के लिए स्वीकार करना संभव नहीं है।
कांग्रेस में उनके शामिल होने का विरोध करने वाले केवल जी-23 समूह के लोग ही नहीं दूसरे भी हैं। तृणमूल कांग्रेस 2021 के चुनाव में अवश्य भारी विजय प्राप्त करने में सफल हुई, लेकिन चुनाव पूर्व पार्टी में भगदड़ मची, तो उसमें एक मुख्य कारण प्रशांत किशोर ही थे। यही समस्या जनता दल (यू) में भी पैदा हुई। नीतीश कुमार ने उनको सर्वाधिक महत्व दिया, पार्टी में उपाध्यक्ष का पद भी उन्हें मिला, मगर पार्टी के नेताओं के साथ उनका सामंजस्य नहीं बैठा और उन्हें अलग होना पड़ा।
यह समस्या कांग्रेस के सामने भी आ सकती है। कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस नहीं है, जो कि एक राज्य तक सीमित हो। प्रशांत किशोर के आगमन से पार्टी में टूट पड़ी, तो लाभ से ज्यादा हानि हो सकती है। दूसरे, क्या कांग्रेस स्वयं इस स्थिति में है कि प्रशांत किशोर की रणनीति से भाजपा और दूसरी प्रतिस्पर्धी पार्टियों को परास्त कर फिर से चुनावी सफलता प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो सके? प्रशांत किशोर को विचारधारा और नेतृत्व से बहुत लेना-देना नहीं होगा।
यही बात पार्टी के वरिष्ठ नेता उठाते हैं कि उनकी कांग्रेस के प्रति निष्ठा हमेशा संदिग्ध रहेगी। यह संभव है कि कुछ लोग उत्साहित हों कि उनके आने से शायद चुनाव जीत जाएं, लेकिन एक बड़ा वर्ग इसे आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। अगर अपेक्षित चुनावी सफलता नहीं मिली, तो जाहिर है कि असंतोष के स्वर ज्यादा बुलंद होंगे।