राजनीति से मुक्त बजट
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वित्त मंत्री अरुण जेटली ने विमुद्रीकरण की पृष्ठभूमि में बजट पेश किया, जिससे स्वाभाविक रूप से यह देखने की उत्सुकता थी कि इससे उपजी परिस्थितियों और इससे हासिल उपलब्धियां इसमें किस तरह प्रतिबिंबित होती हैं। लोगों को यह उम्मीद थी कि नोटबंदी के कारण जो तकलीफ उन्हें उठानी पड़ी, तीसरी तिमाही में मांग में जो कमी आई, रोजगार खत्म हुए और आर्थिक मंदी आई, उससे उबरने की कैसी कोशिश होती है और विमुद्रीकरण से होने वाले संभावित लाभ किस तरह अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में सहायक होते हैं। जाहिर है, वित्त मंत्री के समक्ष चुनौतियां कम नहीं थीं। इस लिहाज से देखें, तो यह एक संतुलित बजट है।
जैसा कि आर्थिक समीक्षा में भी कहा गया और वित्त मंत्री ने भी अपने बजट भाषण में कहा है कि विमुद्रीकरण के कारण जो झटके लगे, वे अस्थायी हैं, बल्कि जल्द ही इसके लाभ दिखने लगेंगे। विकास दर में जो गिरावट देखी गई है, वह अगले वर्ष सुधर जाएगी। विमुद्रीकरण से कर का दायरा बढ़ा है। पर उन्होंने बहुत विस्तार से यह जानकारी नहीं दी है कि विमुद्रीकरण के बाद किन स्रोतों से कर राजस्व में बढ़ोतरी होगी। विमुद्रीकरण से हुई तकलीफ को दूर करने के लिए दो तरह के प्रयास दिखते हैं। पहला, निम्न और मध्यम वर्ग के लिए कर में छूट का प्रस्ताव किया गया है। दूसरा, ग्रामीण भारत को राहत पहुंचाने के लिए कर्ज में बढ़ोतरी के साथ ही मनरेगा का खर्च बढ़ाया गया है। हालांकि ग्रामीण और कृषि क्षेत्र की तकलीफें कहीं अधिक हैं, और उसके लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए गए हैं।
वित्त मंत्री ने कृषि क्षेत्र का खर्च 20 फीसदी बढ़ाने, बैंकों से मिलने वाले कर्ज को सस्ता करने और ग्रामीण इंफ्रास्ट्राक्चर पर खर्च बढ़ाने के प्रस्ताव तो किए हैं, लेकिन जैसी उम्मीद की जा रही थी कि नोटबंदी के कारण जिस तरह से शहरों से लोगों का पलायन हुआ, किसानों को तकलीफ हुई, उसे देखते हुए उन्होंने कर्ज माफी जैसी कोई प्रत्यक्ष राहत नहीं दी है। इसके अलावा ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री का ध्यान रोजगार बढ़ाने पर भी है, जैसे कि पचास करोड़ रुपये टर्न ओवर तक के एमएसएमई (माइक्रो स्माल ऐंड मिडियम इंटरप्राजेज) के लिए कॉरपोरेट टैक्स में पच्चीस फीसदी की कमी की गई है, 'मुद्रा' के तहत आवंटन बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है और स्टार्ट अप के लिए कई तरह की रियायतें दी गई हैं। वित्त मंत्री ने नकद लेन-देन की सीमा तीन लाख रुपये कर दी है। इससे कालेधन को रोकने में काफी मदद मिलेगी। इसी क्रम में राजनीतिक चंदे को 20 हजार रुपये से घटाकर दो हजार रुपये करने का प्रस्ताव भी है। राजनीतिक चंदे के लिए बैंक बांड का जो प्रस्ताव किया गया है, वह अनूठा है।
पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावों के समय आए इस बजट ने संभव है कि वित्त मंत्री के हाथ बांध रखे हों, मगर उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग और नई योजनाओं के नाम पर जो तीन हजार करोड़ रुपये रखे हैं, वह मेरे लिए जरा रहस्य जैसा है। अमूमन बजट में इस तरह की राशि नहीं रखी जाती। यह आने वाले समय में दिखेगा कि क्या यह सार्वभौमिक बुनियादी आय (यूबीआई) से संबंधित पायलट प्रोजेक्ट या फिर कर्जमाफी जैसी किसी योजना के लिए तो नहीं रखे गए हैं। इसके बावजूद यह एक संतुलित और गैरराजनीतिक बजट है।