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राजनय पर राजनीति
पुष्पेश पंत
Updated Tue, 19 Nov 2013 05:16 PM IST
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लंबे समय से हमारे देश में यह बहस जारी रही है कि जिस राष्ट्रमंडल का जन्म अंग्रेजी औपनिवेशिक राज की विरासत के साथ जुड़ा है, आज उसकी अहमियत कितनी बची रह गई है और क्यों हमारी सरकार इसकी सदस्यता को अनावश्यक महत्व देती है?
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इसी कारण यह विवाद जरा बेमानी लग सकता है कि क्यों हमारे प्रधानमंत्री कोलंबो शिखर सम्मेलन में भाग लेने नहीं पहुंचे? हमारा मानना है कि यह मुद्दा राष्ट्रकुल तक सीमित नहीं। यह हमारी विदेश नीति तथा केंद्र सरकार की घातक कमजोरी से जुड़ा है।
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जिस बात ने मनमोहन सिंह को घर बैठे रहने के लिए बाध्य किया, वह तमिलनाडु की द्रविड अस्मिता को ही सर्वस्व मानने का दंभ रखने वाली द्रमुक पार्टी का भयादोहन था। करुणानिधि ने साफ कर दिया था कि जाफना में निरीह तमिलों के वंशनाशक नरसंहार के आरोपी श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे की मेजबानी को यदि उन्होंने कबूल किया, तो उन्हें तमिलों की नाराजगी का सामना करना पडे़गा।
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जो दुखद बात सामने आई है, वह यह है कि पार्टी और सरकार के स्वार्थों ने राष्ट्रहित को हाशिये पर धकेल दिया। ऐसा तब भी देखने को मिला था, जब भारतीय प्रधानमंत्री बांग्लादेश की यात्रा पर निकले थे और ममता के हठ ने उनके हाथ बांध दिए थे।
ऐसा जान पड़ता है कि भारतीय विदेश नीति पूरी तरह ‘संघीय’ प्रणाली वाले घटक राज्यों द्वारा बंधक बना ली गई है। पाकिस्तान के नाम पर जम्मू-कश्मीर और पंजाब की संवेदशीलता सर्वोपरि समझी जा सकती है, नेपाल के सिलसिले में सिक्किम, पश्चिम बंगाल या बिहार की तराई वाले इलाके की दावेदारी सशक्त हो जाएगी, म्यांमार का सवाल उठते ही मणिपुर का पलड़ा सबसे भारी नजर आने लगेगा, खाड़ी देश हों, तो केरल- इस तरह यह सूची लंबी होती जाएगी। यह प्रवृत्ति नुकसानदेह है।
अगर राष्ट्रमंडल की ही बात करें और फिलहाल अपना ध्यान कोलंबो सम्मेलन पर ही केंद्रित रखें, तब भी कुछ बेचैन करने वाले सवालों से मुंह नहीं चुरा सकते। कनाडा या मॉरीशस के प्रधानमंत्रियों का इस सम्मेलन का ‘बहिष्कार’ इसलिए सहज है, क्योंकि श्रीलंका के साथ उनके रिश्ते हमारे जैसे करीबी और उलझे हुए नहीं हैं। और न ही सामरिक संवेदनशीलता या आर्थिक लाभ-हानि का दवाब उन पर है। कनाडा वैसे भी मानव अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों के विषय में अमेरिका का अंधानुसरण करता नजर आता है।
सच तो यह है कि जिस लिट्टे के विरुद्ध गृह युद्ध में श्रीलंका की सरकार को भारत ने आईपीकेएफ नामक सैनिक सहायता पहुंचाई थी, उसके उन्मूलन के बाद यह सिरदर्द पालना बेमानी है कि इस सैनिक अभियान में राजपक्षे ने कितनी निर्ममता बरती। याद रखने लायक यह है कि इस मामले में पश्चिमी देश निरंतर दोहरे मानदंड अपनाते हैं। अफगानिस्तान या पाकिस्तान में जनतंत्र के बीजारोपण के लिए अमेरिकी सैनिक जो कुछ कर रहे हैं, उसके तहत मानवाधिकारों का वीभत्स और भयंकर हनन जायज समझा जाता है। इन अपराधों के आरोपी अमेरिकी सैनिकों को किसी युद्ध अपराध अदालत में खड़ा नहीं किए जा सकने का अभयदान पहले ही प्राप्त है। ऐसे में राजपक्षे को जवाबदेह बनाना तर्कसंगत नहीं लगता है।
जाफना प्रदेश में अभी हाल में चुनाव संपन्न हुए हैं। इनमें राजपक्षे के विरोधी तमिलों की विजय हुई है। यह आशा जगी थी कि क्रमशः शांति और सुलह का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा। इस काम में भारत की राजनयिक भूमिका महत्वपूर्ण थी। लेकिन कोलंबो न जाकर प्रधानममत्री ने इस संभावना को नष्ट कर दिया है।
भारत की लाचारी का लाभ पाकिस्तान और चीन उठाते जा रहे हैं। ऐसे में, अपने देश में व्यापक निर्माण-कार्य तथा बड़े पैमाने पर लाभप्रद सहकार के लिए वह भारत की जगह चीन को चुने, तो इसमें आश्चर्य किस बात का? जहां तक ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे गोरे देशों का सवाल है, तो सिर्फ अंग्रेजी भाषा और क्रिकेट तक हमारा नाम मात्र का रिश्ता उनसे बचा है। अपना माल हमारे बाजार में उतारने तक उनकी उतावली दिखलाई देती है- पूंजी निवेश में या तकनीकी सहयोग में नहीं।
संक्षेप में, आज राष्ट्रमंडल का स्वरूप वह नही बचा है, जो कुछ बरस पहले था। कभी इसके अश्वेत सदस्यों का मुखिया भारत था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। यहां इसके कारणों का विस्तार से विश्लेषण नहीं किया जा सकता, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि आज केवल महात्मा गांधी के सत्याग्रह की यादें दक्षिण अफ्रीका के साथ भारत के नाते को निरापद नहीं रख सकतीं। आज तंजानिया, केन्या, उगांडा, जिंबाब्वे आदि पूर्वी अफ्रीकी देश राष्ट्रहित की निजी परिभाषा के अनुसार ही अपने मित्र-शत्रु पहचानते हैं एवं इसी आधार पर राष्ट्रमंडल का मूल्यांकन करते हैं।
इस सब का नतीजा यह न निकाला जाए कि हम राजपक्षे के बचाव के लिए कसमसा रहे हैं या राष्ट्रमंडल के राजनय को अनावश्यक तूल दे रहे हैं। हमारा मकसद सिर्फ यह रेखांकित करना है कि यदि भारतीय प्रधानमंत्री ने किसी भी कारण यह तय कर लिया था कि कोलंबो जाना किसी काम का नहीं, तो इस मुद्दे के विवादास्पद बनने के पहले ही उन्हें इस फैसले की घोषणा कर देनी चाहिए थी।
विडंबना है कि इन दिनों राष्ट्रमंडल के महासचिव एक भारतीय राजनयिक ही हैं! उनके चुनाव के वक्त यह शोर मचाया जा रहा था कि बदले वक्त में भी यह (राष्ट्रमंडल संगठन) मरा हाथी सवा लाख का है, पर इस वक्त तो प्रधानमंत्री की खुली मुट्ठी में सिर्फ राजनयिक खाक ही दिखलाई दे रही है!