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राजनेता कभी देवता नहीं होते
तवलीन सिंह
Updated Sun, 11 Dec 2016 07:37 PM IST
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तवलीन सिंह
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हर सप्ताह हम पत्रकार राजनेताओं की आलोचना करते हैं, लेकिन हम पत्रकार भी निर्दोष नहीं हैं। जयललिता की अंतिम यात्रा के समय सड़कों पर जनसैलाब देखते हुए मैंने मन ही मन यह सोचा। लोगों ने देखा कि सैकड़ों औरतें कैसे छाती पीट-पीटकर रो रही थीं, जैसे जयललिता के साथ उनका खून का रिश्ता था। टीवी के जाने-माने एंकर को भी उस दिन मैंने कहते सुना कि देश ने एक महान राजनेता खो दिया है।
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जयललिता काबिल थीं, लेकिन क्या उन्हें महान कहा जा सकता है! छोटी उम्र में वह तमिल सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री बन गई थीं। इसी दौरान उन्हें एमजीआर या एमजी रामचंद्रन के साथ काम करने का मौका मिला, जो उस समय तमिल के सबसे लोकप्रिय अभिनेता थे। एमजीआर ने जब फिल्म दुनिया छोड़कर राजनीति में कदम रखा, तब अपनी दोस्त जयललिता को भी साथ ले आए। जयललिता अंग्रेजी अच्छी बोलती थीं, इसलिए एमजीआर ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। एमजीआर के देहांत के बाद उनकी पत्नी जानकी ने जयललिता को अन्नाद्रमुक से बाहर करने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह डटी रहीं और धीरे-धीरे पार्टी की सबसे बड़ी नेता बन गईं। इसके बाद उनके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। उन्होंने चुनाव जीते, तो हारे भी। उन्हें शोहरत भी मिली और बदनामी भी। मुझे याद है कि एक बार हम पत्रकारों के सामने उन्होंने स्पष्ट किया था कि वाजपेयी की सरकार गिराने के पीछे उनका मुख्य मकसद खुद प्रधानमंत्री बनना था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, क्योंकि अगले लोकसभा चुनाव में वह बुरी तरह हारी थीं।
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जयललिता ने अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए वही रास्ता चुना, जो कभी इंदिरा गांधी ने चुना था। सरकार के पैसों से जयललिता ने गरीबों में खैरात बांटने का काम किया। हर योजना पर उन्होंने अपना नाम चिपकाया, सो तमिलनाडु में उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। लेकिन इससे उनकी महानता साबित होती है या चतुराई? उनकी अंतिम यात्रा में जो लोग शामिल हुए, उनका कहना था कि अम्मा उनके लिए भगवान थीं। राजनेता कभी भगवान नहीं होते, लेकिन अर्धशिक्षित भारतीय यह बात नहीं समझते। हमारे राजनेता जनता की इसी भावना का लाभ उठाते हैं। जिस दिन हमारे देशवासी इस भोलेपन से ऊपर उठेंगे, उस दिन राजनेताओं को सावधान हो जाना पड़ेगा।
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राजनेताओं ने अगर अपने चुनावी वायदे पूरे किए होते, तो इस देश से गरीबी बहुत पहले ही खत्म हो गई होती। इस देश को प्रकृति ने बेहिसाब दौलत दी है। इस दौलत के होते हुए भी गरीबी दूर नहीं हुई, तो इसमें राजनेताओं का ही कसूर है। मसलन, अगर उन्होंने पर्यटन के क्षेत्र पर ही ध्यान दिया होता, तो गरीब राज्यों में भी समृद्धि आती। पर्यटन सेवाओं में निवेश करने का आम आदमी को सीधा लाभ तुरंत मिलता है, क्योंकि पर्यटन के लिए जो चीजें जरूरी हैं, जैसे-सड़कें, बिजली, पानी, स्वच्छ वातावरण आदि, उनकी जरूरत आम आदमी को भी होती है। इस क्षेत्र में चीन ने बहुत काम किया है, सो हर वर्ष चीन में जहां तीन करोड़ विदेशी पर्यटक जाते हैं, वहीं अपने यहां सालाना सात लाख बाहरी सैलानी ही आते हैं। भारत आज अगर संपन्नता के उस शिखर पर नहीं पहुंचा है, तो इसकी बड़ी वजह यही है कि देश के लोग राजनेताओं को देवता मानकर उनकी पूजा करने लगते हैं।
जयललिता बेशक एक काबिल राजनेता थीं, लेकिन वह देवी नहीं थीं। गरीबों को खैरात बांटने के बजाय अगर वह वास्तविक विकास की कोशिश करतीं, तो तमिलनाडु का ज्यादा भला होता।