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भाषा-संस्कृति के जरिये सियासी पैठ : काशी तमिल संगमम तमिलनाडु की राजनीति में प्रवेश, इस साहसिक कदम के मायने
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काशी-तमिल संगमम
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अमर उजाला।
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का काशी तमिल संगमम तमिलनाडु की राजनीति में प्रवेश का साहसिक कदम है। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बहुत आक्रामक भाषणों से तमिलनाडु में विवाद पैदा हो गया, जिसमें कहा गया कि भगवान शिव के मुख से जो दो भाषाएं निकलीं, वे संस्कृत और तमिल थीं। काशी की घटना ने द्रमुक को झकझोर कर रख दिया है। भाजपा बहुत आक्रामक तरीके से तमिल सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है, जिसने द्रमुक सहयोगियों को मुश्किल में डाल दिया है।
बनारस में नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए काशी तमिल संगमम का हजारों किलोमीटर दूर तमिलनाडु की राजनीति पर खासा प्रभाव पड़ा है। उस समारोह में मोदी के भाषण ने हिंदुत्व की भावनाओं को जगाया, क्योंकि उन्होंने तमिल महाकाव्यों का उल्लेख किया। यह संगमम आजादी के अमृत महोत्सव के तहत हुआ। तमिलनाडु के विभिन्न पीठों के 15 महंत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ बैठे थे। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी ने इन महंतों के आगे माथा टेका। ये वीडियो और तस्वीरें तमिलनाडु में वायरल हो गईं।
इसके अलावा, तमिलनाडु के सभी जिलों से 2,500 स्कूल/कॉलेज के छात्र आईआईटी, मद्रास और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहयोग से तीन विशेष ट्रेनों में बनारस पहुंचे। बॉलीवुड संगीतकार इलैयाराजा ने रुद्रम से छंद लेकर आर्केस्ट्रा का प्रदर्शन किया। बनारस के इस समारोह और प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को सभी तमिल न्यूज चैनलों ने लाइव प्रसारित किया। अलग-अलग राज्यों के लिए भाजपा अलग-अलग रणनीति अपनाती है।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से निपटने के लिए उसने बुलडोजर चलवा दिया, तो महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का इस्तेमाल किया। झारखंड के लिए इसने अलग तरीका अपनाया। तेलंगाना में भाजपा तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के चंद्रशेखर राव पर हमलावर हो गई। लेकिन तमिलनाडु में पैठ बनाने के लिए भाजपा और उसके नेताओं ने तमिल भाषा और संस्कृति को अपनाया। और इसका लाभ भी भाजपा को मिल रहा है।
भाजपा की 'दक्षिण की ओर देखो' नीति आक्रामक होने वाली है, क्योंकि हैदराबाद राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लिए गए फैसले भी लाभ दे रहे हैं। दूसरी ओर, भाजपा विरोधियों की स्थिति तमिलनाडु में बहुत ही निराशाजनक दिखाई देती है। जैसे कि द्रमुक आंतरिक कलह में फंसी है और उसके हर नेता अलग-अलग विचार प्रकट कर रहे हैं, जिनसे तमिल राजनीति भ्रमित हो रही है। छह महीनों में मोदी ने चार बार तमिलनाडु का दौरा किया है। अमित शाह दक्षिणी राज्यों के किसी भी दौरे में तमिलनाडु के किसी एक जिले में जरूर जाते हैं।
45 केंद्रीय मंत्री तमिलनाडु के एक से दूसरे जिले का दौरा कर रहे हैं। वर्ष 2019 में भाजपा ने पूर्वी राज्यों की तरफ ध्यान केंद्रित किया, तो वहां से उसे 25 सांसद मिले। वर्ष 2024 के लिए भाजपा दक्षिणी राज्यों को लेकर उत्सुक है। इसी वजह से भाजपा के केंद्रीय मंत्री तमिलनाडु में घूम रहे हैं। तमिलनाडु की राजनीति अब एक दिलचस्प मोड़ ले रही है और एक दूसरे के खिलाफ तीखी आलोचनाएं की जा रही हैं। कभी मोदी को काले झंडे दिखाए गए थे, लेकिन अब वह स्थिति नहीं है।
अन्नाद्रमुक गुटबाजी और कानूनी मुद्दों को लेकर गहरे संकट में फंसी है। जयललिता के बाद उनकी पार्टी तीन या चार खेमों में बंट भी गई है। अन्नाद्रमुक की तुलना शिवसेना से की जा सकती है, जिसके दोनों गुट चुनाव चिह्न के लिए लड़ रहे हैं। एमजीआर और जयललिता का प्रिय चुनाव चिह्न दो पत्तियां था। पार्टी के विभिन्न गुट इस चुनाव चिह्न पर दावा कर रहे हैं, जिससे इस चुनाव चिह्न का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। शिवसेना और अन्नाद्रमुक, दोनों चुनाव आयोग से राहत चाहती हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा द्वारा इन दोनों दलों की कलाई मरोड़ने की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि विपक्षी दलों की राजनीति निराशाजनक है, तो तमिलनाडु में सत्ताधारी दल द्रमुक की राजनीति भी बेकार है। एमके स्टालिन और दुरई मुरगन के बयान चौंकाने वाले हैं। द्रमुक महासचिव दुरई मुरुगन ने एक सार्वजनिक बैठक में स्वीकार किया कि तमिलनाडु में भाजपा की बढ़ती पैठ द्रविड़ संस्कृति के लिए अच्छी बात नहीं है। द्रमुक वंशवाद के मुद्दों से जूझ रही है।
इसके नेता स्टालिन का कहना है कि उन्हें नींद नहीं आती, क्योंकि पार्टी के नेता अलग-अलग विचार व्यक्त करते हैं और द्रमुक दिग्गजों के बीच व्यक्तित्व संघर्ष जारी है। स्टालिन ने द्रमुक कैडरों को अपने नाजुक स्वास्थ्य के बारे में भी बताया। उनके इस बयान से द्रमुक सहयोगियों में कोई अच्छा संदेश नहीं गया। द्रमुक के वरिष्ठ मंत्री उपेक्षित महसूस करते हैं। स्टालिन के बेटे का प्रभाव युवा मंत्रियों पर ज्यादा है। धीरे-धीरे स्टालिन अपने पुत्र उदयनिधि को पार्टी के साथ सरकार में भी शामिल कर रहे हैं, जिससे पुराने नेताओं में बहुत ज्यादा असंतोष है।
2024 का लोकसभा चुनाव और 2026 का विधानसभा चुनाव द्रमुक के लिए परीक्षा की घड़ी होंगे। भाजपा ने तमिल संस्कृति, तमिल भाषा और तमिल पहुंच को प्रेरित करने के लिए द्रमुक शैली की रणनीति तैयार कर तीन कोणों से द्रमुक को घेर लिया है। भाजपा ने द्रमुक से तमिल छीनकर तमिल भाषा को अपने पाले में कर लिया है। इसने स्टालिन के तीन प्रमुख सहयोगी दलों-वीसीके, सीपीएम और कांग्रेस को झकझोर दिया है। द्रमुक सहयोगी चाहते हैं कि तमिलनाडु में भाजपा की पैठ पर अंकुश लगाया जाए।
तमिलनाडु के मतदाता मुफ्त उपहार, ईंधन की कीमतों में कमी, हर महिला के लिए 1,000 रुपये और द्रमुक के कई अन्य चुनावी वादों को पूरा न करने के चलते ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। स्टालिन ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि केंद्र द्वारा जीएसटी फंड जारी न करने के कारण वह ऐसे वादों को पूरा करने में असमर्थ हैं। जयललिता और करुणानिधि जैसे दिग्गज अब तमिल राजनीति में नहीं हैं। आध्यात्मिक राजनीति से रजनीकांत ने संन्यास ले लिया है, तो कमल हासन राजनीति में उड़ान भरने में सक्षम नहीं हैं। यही वजह है कि भाजपा राज्य की राजनीति में खाली जगह को भरना चाहती है। चाहे आप जिस भी तरफ से देखें, भाजपा के लिए सब कुछ ठीक और फायदेमंद है। उसकी 'दक्षिण की ओर देखो' नीति चमक रही है।