राजनीतिक दखल से मुक्ति जरूरी
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भारतीय पुलिस सेवा में मैं 1961 में आया था। मुझे मैसूर कैडर मिला था। बाद में इसका नाम बदलकर कर्नाटक कैडर हो गया। उस वक्त बहुत प्रभावशाली और प्रतिष्ठित नेताओं का शासन था, जो विश्वास के साथ सरकार चलाते थे। आज की तरह वे शासन-व्यवस्था को फुटबाल का मैदान नहीं मानते थे कि जो अधिकारी उनकी धुन पर नाचने से इनकार कर दे, उसे वे इधर-उधर ठोकर मारते रहें। उस समय भी सत्ता के लिहाज से प्रतिकूल कार्रवाइयों पर अधिकारियों का स्थानांतरण किया जाता था। पर नौकरशाही में ऐसा माहौल नहीं था कि जनप्रतिनिधि या मंत्री ही हमारे भगवान हैं।
इस लिहाज से सर्वोच्च न्यायालय का विगत 30 अक्तूबर को आया वह फैसला बेहद अहम है, जिसमें नौकरशाहों के लिए न्यूनतम कार्यकाल तय करने और राजनेताओं के इशारे पर मनमाने स्थानांतरण और पदस्थापन (पोस्टिंग) को प्रतिबंधित करने की बात है। मनमाने ढंग से किए जाने वाले तबादले नौकरशाही के लिए एक बड़ी डरावनी स्थिति है। असुविधानजक अधिकारियों से छुटकारा पाने के लिए राजनेता इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय का ताजा निर्देश काफी कुछ 22 सितंबर, 2006 के उसके निर्देश जैसा ही है, जिसे लागू नहीं किया गया। इसकी शुरुआत सर्वोच्च न्यायालय के दिसंबर, 1997 के उस फैसले से हुई थी, जिसमें सीबीआई निदेशक के कार्यकाल की न्यूनतम अवधि निर्धारित करने की बात कही गई थी। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री बनते ही 2004 में दूसरे नौकरशाहों की भी अवधि तय कर दी। नतीजतन गृह सचिव, कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, खुफिया ब्यूरो और रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग के निदेशक सहित कई शीर्ष नौकरशाह इसके दायरे में आ गए।
लेकिन देश भर में फैले नौकरशाहों के साथ यह स्थिति नहीं है। ऐसे में होता यह है कि जो आदमी सत्ता को रास नहीं आता, उसे दूर-दराज में भेज दिया जाता है। कई बार थोक में तबादले कर दिए जाते हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें, तो अप्रैल, 2012 में यहां पांच मंडलायुक्तों और 32 जिलाधिकारियों सहित 70 आईएएस अधिकारियों के तबादले कर दिए गए। मार्च, 2012 में सत्ता में आने के बाद से सत्ताधारी पार्टी सपा ने अब तक कुल 221 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए हैं, जबकि यूपी कैडर में कुल 537 अधिकारी हैं। इसी तरह इस राज्य में 2011 और 2012 में कुल 1,828 प्रांतीय पुलिस अधिकारियों के तबादले किए। इनमें अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर के 478 और उप पुलिस अधीक्षक स्तर के 1,350 अधिकारी शामिल थे। चार महीने और चौदह दिन के अपने पहले मुख्यमंत्री काल में मायावती ने 550 और छह महीने के दूसरे कार्यकाल में उन्होंने 777 आईएएस अधिकारियों को स्थानांतरित किया। बसपा के तीसरे कार्यकाल में 970 और चौथे कार्यकाल में 1,200 आईएएस अधिकारियों का स्थानांतरण हुआ।
ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश में ही ऐसे हालात हैं। महाराष्ट्र सरकार वर्ष 2011 में एक अवैध सर्कुलर वापस लेने के लिए बाध्य हुई थी, जिसमें कहा गया था कि राजनेताओं की कॉल्स को पुलिसवाले स्टेशन डायरी में दर्ज नहीं करेंगे।
दरअसल, उच्च न्यायालय में एक मामला दर्ज कराया गया था, जिसमें 2006 में पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के एक निजी सचिव ने बुल्ढाना पुलिस को कहा था कि वह एक कांग्रेस विधायक के साहूकार पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज न करे। जबकि विदर्भ के किसान साहूकारों के एक तंत्र के बारे में शिकायत दर्ज कराना चाहते थे। वह कॉल जांच अधिकारी ने पुलिस डायरी में दर्ज कर ली थी। दिवंगत देशमुख पर भी आरोप लगा था कि उन्होंने जिलाधीश से तब तक कार्रवाई न करने को कहा था, जब तक वह खुद मामले को न देख लें। उच्च न्यायालय ने संबंधित सर्कुलर को निरस्त करने का आदेश दिया। राज्य सरकार इस मामले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गई। शीर्ष अदालत ने न केवल उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहराया, बल्कि उसने राज्य सरकार पर लगाए गए 10 हजार रुपये के जुर्माने को बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया।
वैसे इन बातों से यह भी साबित नहीं हो जाता कि नौकरशाही में सभी संत हैं और सभी राजनेता एक जैसे हैं। नौकरशाही और राजनीति, दोनों में अच्छे और बुरे लोग हैं। मगर सबसे ज्यादा दोषारोपण नौकरशाही पर ही होती है। विदेशी ही नहीं, भारतीय भी नौकरशाही को अक्षम मानते हैं। हांगकांग की पॉलिटिकल ऐंड इकनॉमिक रिस्क कंसलटेंसी के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, एशिया में सबसे निकम्मी नौकरशाही भारत में है। सर्वेक्षण में कहा गया कि विदेशी निवेशक ही नहीं, किसी भारतीय के लिए भी वहां की नौकरशाही से काम करवाना निराशाजनक अनुभव जैसा है।
इस देश में तकरीबन 1,030 केंद्रीय और 6,727 राज्य स्तर के कानून हैं, जो नौकरशाहों द्वारा काम अटकाने के लिए पर्याप्त कारण बन जाते हैं। कारोबार शुरू करने या नई उद्योग लगाने के लिए अनेक तरह की अनुमति लेने की जरूरत होती है। केवल पैसा ही वह तरीका है, जिसके जरिये आप तेजी से काम करवा सकते हैं। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट पर नजर डालें, तो पाएंगे कि भ्रष्टाचार के मामले में 183 देशों की सूची में भारत का स्थान 94वां है। मौजूदा परिस्थितियों में नौकरशाही को चाहिए कि वह आम लोगों के जीवन को आसान बनाए। वहीं राजनेताओं का भी दायित्व है कि वे जाति, धर्म और वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर सबके साथ निष्पक्ष रहें।