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दिल्ली की सियासी हवा

Tue, 03 Feb 2015 08:14 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Tue, 03 Feb 2015 08:14 PM IST
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Political environment of Delhi

भारतीय जनता पार्टी ने जब दिल्ली जैसे एक छोटे राज्य में, जिसे पूर्ण राज्य का भी दर्जा हासिल नहीं है, चुनाव प्रचार के लिए अपने 120 सांसदों, 22 मंत्रियों को झोंकने का फैसला किया, तो हैरानी हुई कि आखिर भाजपा क्यों इतनी ज्यादा कवायद कर रही है? बजट से तीन हफ्ते पहले जब आम तौर पर वित्त मंत्री बजट को अंतिम रूप देने में लगे होते हैं, अरुण जेटली को हर दिन कुछ घंटे प्रचार अभियान को देखने के लिए कहा गया। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने बड़े पैमाने पर मुहिम शुरू की और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को बूथ स्तर पर लगाया और सभी नेताओं को निर्वाचन सूची का एक-एक पन्ना देकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की जिम्मेदारी सौंपी। यही नहीं, स्वयं प्रधानमंत्री ने सात फरवरी को होने वाले मतदान से ठीक पहले आखिरी हफ्ते में विरोधी दलों पर बम बरसाने की शुरुआत की है।

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मात्र नौ महीने पहले भाजपा ने लोकसभा की 282 सीटें जीती थीं और दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर कब्जा किया था। अब वह स्वयं मान रही है कि इस बार उसकी लड़ाई कांग्रेस से नहीं, बल्कि नई-नवेली पार्टी आप से है। फिलहाल दिल्ली का चुनाव भाजपा के लिए कल्पना से भी ज्यादा कठिन साबित हो रहा है और आप लोगों की उम्मीदों से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन करती दिख रही है। तो क्या माना जाए कि भाजपा नेतृत्व का किरण बेदी, जो इंडिया एगेंस्ट करप्शन के आंदोलन के दौरान अरविंद केजरीवाल की सहयोगी रही हैं, को उनकी काट के लिए लाने का फैसला भी नुकसानदेह साबित हुआ?
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पिछले मई से लगातार जीतने वाली भाजपा को पूरा विश्वास था कि दिल्ली जीतने में उसे परेशानी नहीं होगी। 2013 के चुनाव में भी वह 31 सीटें जीतकर दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन भाजपा की रणनीति में मोड़ तब आया, जब बीते दस जनवरी को रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री की रैली के साथ भाजपा ने चुनावी अभियान की शुरुआत की। उस रैली में पार्टी नेतृत्व की उम्मीद के मुताबिक न तो भीड़ थी और न ही उत्साह।
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इसके बाद रणनीतिक बदलाव करते हुए और अपनी दिल्ली पार्टी ईकाई को हैरान करते हुए अमित शाह ने किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित किया। लेकिन शुरुआती हफ्ते में ही दिख गया कि पार्टी का यह दांव कारगर साबित नहीं हो रहा है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि उसके चुनाव हारने का प्रभाव सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि देश भर में उसकी राजनीति पर पड़ेगा। इससे संभवतः विपक्षी ताकतों को नया बल मिलेगा, जो हार के कारण हताश हैं। लेकिन यदि भाजपा हार जाती है, तो विपक्षी दलों को एकता के लिए नई ऊर्जा मिलेगी, खासकर उन राज्यों में जहां अगले 12 से 14 महीनों में चुनाव होने वाले हैं।

पिछले तीन महीनों में आप नेताओं ने अपना जनाधार वापस पाने के लिए कड़ी मेहनत की। भाजपा ने जब बेदी कार्ड खेला, तो शुरू में आप नेता हताश हुए, लेकिन जल्द ही उन्होंने पहल ले ली। उन्होंने केजरीवाल के साथ खुली बहस से बेदी के इन्कार करने, घोषणापत्र लाने में भाजपा के अक्षम रहने और अभी हाल में गोत्र विवाद जैसे मसले को जोर-शोर से उठाया। वैसे भी बेदी को ऊपर से थोपने से भाजपा नेताओं में बड़े पैमाने पर असंतोष पैदा हुआ।

निर्भया मामले के बाद महिला सुरक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरी है, इसलिए किरण बेदी ने सुरक्षा के मुद्दे को उठाकर दिल्ली की महिलाओं से अपील की। उन्हें उम्मीद थी कि जिन लोगों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया, उन्हें वह रोक पाएंगी। लेकिन वे लोग एक बार फिर केजरीवाल को मौका देना चाहते हैं और तर्क देते हैं कि 'इन्होंने गलती तो मान ली, माफी भी मांग ली, एक और मौका दिया जाए।'

निस्संदेह एक बड़ा वर्ग है, जो मोदी या भाजपा के पक्ष में खड़ा है और तर्क दे रहा है कि अगर राज्य में भी उसी पार्टी की सरकार होगी, जिसकी केंद्र में है, तो दिल्ली का भला होगा। बेदी की छवि एक सख्त पुलिस अफसर के साथ-साथ काम करने वाले के रूप में रही है। सवाल उठता है कि बेदी क्या भाजपा के उस वोट बैंक में अलग से कुछ जोड़ पाएंगी, जो मोदी की कारण भाजपा को मिला है?

बेशक मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा केजरीवाल से छिटक़कर भाजपा की तरफ चला गया है, लेकिन गरीब लोगों के बीच वह अपनी पकड़ बनाए हुए हैं, जो उन्हें अपना उद्धारक समझते हैं। मसलन, दिल्ली के ऑटो ड्राइवर न केवल उनके समर्थक हैं, बल्कि उनके प्रचारक भी हैं, क्योंकि वे पूरी दिल्ली में घूमते हैं। केजरीवाल की लोकप्रियता अल्पसंख्यकों में भी बढ़ी है, क्योंकि वे कांग्रेस को नहीं, बल्कि आप को भाजपा का विकल्प मानते हैं, इसलिए हो सकता है कि पिछली बार की तुलना में इस बार आप को अल्पसंख्यकों का ज्यादा वोट मिले। इसके अलावा बाहरी दिल्ली क्षेत्र के देहाती इलाकों के जाट/किसान भी आप को नए नजरिये से देख रहे हैं। केजरीवाल की कमजोर छवि भी उनके प्रति लोगों की सहानुभूति जगा सकती है और उनके पक्ष में काम कर सकती है।


नित नए आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। हाल में आए ज्यादातर सर्वे बता रहे हैं कि आप का पलड़ा भारी है, लेकिन निश्चित रूप से कोई नहीं कह सकता कि किसे बहुमत मिलेगा। लेकिन इतना तो साफ है कि भाजपा भी समझ गई है कि दिल्ली का चुनाव आसान नहीं है। अगर भाजपा यह चुनाव हारती है, तो यह मोदी और भाजपा के लिए गहरा धक्का होगा। यह देखने वाली बात होगी कि अगर भाजपा दिल्ली का चुनाव नहीं जीत पाती है, तो क्या वह लोकलुभावन बजट पेश करने पर मजबूर होगी!

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