{"_id":"694df28fe8434bd2d80b1d59","slug":"political-and-social-turmoil-in-bangladesh-and-india-s-concerns-and-challenges-2025-12-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"वापसी और विडंबना: बांग्लादेश में सियासी-सामाजिक हलचल और भारत की चिंता-चुनौतियां","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
वापसी और विडंबना: बांग्लादेश में सियासी-सामाजिक हलचल और भारत की चिंता-चुनौतियां
Fri, 26 Dec 2025 07:57 AM IST
लव गौर
अमर उजाला
अमर उजाला
Published by: लव गौर
Updated Fri, 26 Dec 2025 07:57 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान और पूर्व बांग्लादेशी पीएम खालिदा जिया
- फोटो :
बीएनपी.ऑर्गेनाइजेशन/ANI
विस्तार
घोर अशांति और अनिश्चितता के बीच बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी (बीएनपी) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान का ब्रिटेन में अपने 17 वर्षों से अधिक का स्वैच्छिक निर्वासन समाप्त करते हुए लौटना बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षण है। गौरतलब है कि रहमान, पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं, जो लंबे समय से अस्वस्थ चल रही हैं। पिछले वर्ष छात्रों की असंतुष्टि के नाम पर बांग्लादेश में जो हिंसक आंदोलन हुआ, उसमें अवामी लीग सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक परिदृश्य में बीएनपी एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरी है।रहमान की वापसी ऐसे वक्त में हुई है, जब युवा नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश की स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। जमात-ए-इस्लामी का शिकंजा अंतरिम सरकार पर कसता जा रहा है और उसी अनुपात में सड़कों पर हिंसा व अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति भी जिस तरह से बढ़ती जा रही है, उससे यही लगता है कि मोहम्मद यूनुस हालात को संभालने में पूरी तरह से विफल रहे हैं। हैरत की बात है कि अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्मों के बावजूद भारत के भीतर से या सरकारी तंत्र की तरफ से विरोध के बुलंद स्वर सुनने को नहीं मिले हैं।
उस्मान हादी के भाई ने उनकी हत्या के पीछे मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार का हाथ होने की बात कह कर मामले को और उलझा दिया है। उनका कहना है कि यूनुस नहीं चाहते कि 12 फरवरी को चुनाव हों। बांग्लादेश मुसीबतों के भंवर में फंसता दिख रहा है। चुनाव 12 फरवरी को हों या फिर न हों, दोनों ही सूरत में जमात-ए-इस्लामी का वहां के हालात पर शिकंजा बढ़ता दिख रहा है। बांग्लादेश के घटनाक्रमों पर पैनी नजर जमाए नई दिल्ली की असल चिंता भी यही होगी, क्योंकि जमात के रिश्ते पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी से माने जाते हैं। इस परिदृश्य में देखें, तो बीएनपी अपेक्षया अधिक उदार और लोकतांत्रिक विकल्प हो सकती है।
रहमान ने यूनुस की आलोचना करते हुए, जमात-ए-इस्लामी से भी दूरी बनाई है। ऐसे में, भारत यह उम्मीद कर सकता है कि रहमान की वापसी से बीएनपी की संभावनाएं मजबूत होंगी और अगर बीएनपी सत्ता में आती है, तो द्विपक्षीय संबंधों में कुछ स्थिरता भी आ सकती है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने खालिदा जिया के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए भारत की तरफ से समर्थन की पेशकश की, जिसका बीएनपी द्वारा स्वीकारा जाना भी दोनों पक्षों में बढ़ते सौहार्द को ही दर्शाता है। हालांकि यह विडंबना ही है, एक कट्टरपंथी पार्टी के शहजादे से लोकतंत्र बहाली की उम्मीद की जा रही है।