फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Poetry of jaikrishn rai tushar

इस सूरज से कुछ मत मांगो

Sun, 04 Nov 2012 12:02 PM IST
जयकृष्ण राय तुषार
जयकृष्ण राय तुषार Updated Sun, 04 Nov 2012 12:02 PM IST
विज्ञापन
Poetry of jaikrishn rai tushar
क्रांति करो
विज्ञापन

अब चुप मत बैठो
राजा नहीं बदलने वाला।
आग हुई
चूल्हे की ठंडी
अदहन नहीं उबलने वाला।
महंगाई के
रक्तबीज अब
दिखा रहे हैं दिन में तारे,
चुप बैठे हैं
सुविधा भोगी
जन के जनप्रतिनिधि बेचारे,
कैलेन्डर की
तिथियों से अब
मौसम नहीं बदलने वाला।
कुछ ही दिन में
कंकड़-पत्थर
मुंह के लिए निवाले होंगे,
जो बोलेगा
उसके मुंह पर
कम्पनियों के ताले होंगे,
भ्रष्टाचारी
केंचुल पहने
अजगर हमें निगलने वाला।
हर दिन
उल्का पिंड गिराते
आसमान से हम क्या पाते?
आंधी वाली
सुबहें आतीं
चक्रवात खपरैल उड़ाते,
इस सूरज से
कुछ मत मांगो
शाम हुई यह ढलने वाला।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed