{"_id":"5e029584-2649-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"poetry-of-jaikrishn-rai-tushar","type":"story","status":"publish","title_hn":"इस सूरज से कुछ मत मांगो ","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
इस सूरज से कुछ मत मांगो
जयकृष्ण राय तुषार
Updated Sun, 04 Nov 2012 12:02 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्रांति करो
अब चुप मत बैठो
राजा नहीं बदलने वाला।
आग हुई
चूल्हे की ठंडी
अदहन नहीं उबलने वाला।
महंगाई के
रक्तबीज अब
दिखा रहे हैं दिन में तारे,
चुप बैठे हैं
सुविधा भोगी
जन के जनप्रतिनिधि बेचारे,
कैलेन्डर की
तिथियों से अब
मौसम नहीं बदलने वाला।
कुछ ही दिन में
कंकड़-पत्थर
मुंह के लिए निवाले होंगे,
जो बोलेगा
उसके मुंह पर
कम्पनियों के ताले होंगे,
भ्रष्टाचारी
केंचुल पहने
अजगर हमें निगलने वाला।
हर दिन
उल्का पिंड गिराते
आसमान से हम क्या पाते?
आंधी वाली
सुबहें आतीं
चक्रवात खपरैल उड़ाते,
इस सूरज से
कुछ मत मांगो
शाम हुई यह ढलने वाला।
विज्ञापन
अब चुप मत बैठो
राजा नहीं बदलने वाला।
आग हुई
चूल्हे की ठंडी
अदहन नहीं उबलने वाला।
महंगाई के
रक्तबीज अब
दिखा रहे हैं दिन में तारे,
चुप बैठे हैं
सुविधा भोगी
जन के जनप्रतिनिधि बेचारे,
कैलेन्डर की
तिथियों से अब
मौसम नहीं बदलने वाला।
कुछ ही दिन में
कंकड़-पत्थर
मुंह के लिए निवाले होंगे,
जो बोलेगा
उसके मुंह पर
कम्पनियों के ताले होंगे,
भ्रष्टाचारी
केंचुल पहने
अजगर हमें निगलने वाला।
हर दिन
उल्का पिंड गिराते
आसमान से हम क्या पाते?
आंधी वाली
सुबहें आतीं
चक्रवात खपरैल उड़ाते,
इस सूरज से
कुछ मत मांगो
शाम हुई यह ढलने वाला।