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याद आई पृथ्वी
दिविक रमेश
Updated Sat, 20 Jul 2013 09:23 PM IST
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दिविक रमेश
इनकी कविताएं उन सारी चीजों को हमारे अनुभव के दायरे में लाती हैं, जो हमारा अधिकार है। नोएडा में रहते हैं।
मैं उठा और उठता चला गया
जैसे कि तूफान!
जा लगा उस सीने से
बेहद करीबी अपने सीने से
जो था ही नहीं, कहीं
मेरे वजूद सा।
मैं शान्त हुआ और खो गया
हालांकि था ही क्या खोने को पर खो गया
ठीक बहला दिए गए किसी बच्चे की जिद सा।
मैंने देखा आकाश मुझमें डूब गया था
पूरा का पूरा।
मैं मारता रहा हाथ-पांव
लेता रहा आकाश हिलोरे।
मैं उठा और चढ़ बैठा आकाश के कंधों पर।
मुझे सांस मिली
जैसे आकाश मेरा पिता हो।
मैंने याद किया
बहुत याद किया पृथ्वी को
जो गायब थी मेरे पैरों से।
यूं मिली ही कब थी वह।
मैंने याद किया
महज याद करने के लिए
और लूटता रहा सुख औपचारिकता का
और सताता रहा याद को, रुलाता रहा।
कितना शैतान था न मैं!
बहुत प्यार से देखा मुझे याद ने
लाड़ उमड़ आया था उसका
उसने मुझे छुआ।
सामने वाले वृक्ष पर बैठी
मेरी दिवंगत मां
जाने कब से निहार रही थी
यह किस्सा।
नहीं जानता
मैं कब चटका और अपने से दूर हो गया
और बहुत करीब
अपने पास आ गया।
जाने क्या गुनगुनाता रहा देर तक
बैठा अपनी टाट बिछी पृथ्वी की गोद में।
तुम कहां हो पृथ्वी
कहां किस टहनी पर अटकी हो
वृक्ष की!
आओ और मेरे पांवों को
जमीन दो ओ मां।
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इनकी कविताएं उन सारी चीजों को हमारे अनुभव के दायरे में लाती हैं, जो हमारा अधिकार है। नोएडा में रहते हैं।
मैं उठा और उठता चला गया
जैसे कि तूफान!
जा लगा उस सीने से
बेहद करीबी अपने सीने से
जो था ही नहीं, कहीं
मेरे वजूद सा।
मैं शान्त हुआ और खो गया
हालांकि था ही क्या खोने को पर खो गया
ठीक बहला दिए गए किसी बच्चे की जिद सा।
मैंने देखा आकाश मुझमें डूब गया था
पूरा का पूरा।
मैं मारता रहा हाथ-पांव
लेता रहा आकाश हिलोरे।
मैं उठा और चढ़ बैठा आकाश के कंधों पर।
मुझे सांस मिली
जैसे आकाश मेरा पिता हो।
मैंने याद किया
बहुत याद किया पृथ्वी को
जो गायब थी मेरे पैरों से।
यूं मिली ही कब थी वह।
मैंने याद किया
महज याद करने के लिए
और लूटता रहा सुख औपचारिकता का
और सताता रहा याद को, रुलाता रहा।
कितना शैतान था न मैं!
बहुत प्यार से देखा मुझे याद ने
लाड़ उमड़ आया था उसका
उसने मुझे छुआ।
सामने वाले वृक्ष पर बैठी
मेरी दिवंगत मां
जाने कब से निहार रही थी
यह किस्सा।
नहीं जानता
मैं कब चटका और अपने से दूर हो गया
और बहुत करीब
अपने पास आ गया।
जाने क्या गुनगुनाता रहा देर तक
बैठा अपनी टाट बिछी पृथ्वी की गोद में।
तुम कहां हो पृथ्वी
कहां किस टहनी पर अटकी हो
वृक्ष की!
आओ और मेरे पांवों को
जमीन दो ओ मां।