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बजट की कविताएं
विवेक शुक्ला
Updated Wed, 31 Jan 2018 07:18 PM IST
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विवेक शुक्ला
वित्त मंत्री का भाषण सबसे सुरक्षित दस्तावेजों में से एक है। यह बजट की घोषणा होने से दो दिन पहले आधी रात को प्रिंटर्स को सौंपा जाता है। बजट भाषण वित्त मंत्री खुद या मुख्य आर्थिक सलाहकार की मदद से लिखते हैं। इसमें वित्त सचिव और एक-दो आला अधिकारियों के भी विचार ले लिए जाते हैं। बजट भाषण को समृद्ध करने के लिए अनेक वित्त मंत्री किसी नामवर कवि की कोई रचना उद्धृत करते रहे हैं। प्रणब मुखर्जी ने अपने बजट भाषणों में कौटिल्य के अर्थशास्त्र की कई बार चर्चा की थी।
क्या यह माना जाए कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली आज अपने बजट भाषण में किसी महान लेखक की रचना या किसी महापुरुष की किसी सूक्ति का उल्लेख करेंगे? उनसे इस तरह की अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि विभिन्न विषयों की पुस्तकों की खुशबू उन्हें खींचती है।
1991 के बजट को कौन भूल सकता है? राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई, 1991 को अपने बजट भाषण में फ्रेंच लेखक विक्टर ह्यूगो की एक पंक्ति, नो पावर ऑन अर्थ कैन स्टॉप एन आइडिया हूज टाइम हैज कम दोहराकर नई शुरुआत की थी। यानी कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसके आने का वक्त हो चुका है।
कुछ जानकारों का मानना है कि ह्यूगो का भाव वह नहीं था, जो मनमोहन सिंह ने व्यक्त किया था। ह्यूगो की कविता का अर्थ है कि हम सैन्य हमले का विरोध कर सकते हैं, पर विचारों के हमलों को रोकना नामुमकिन है। पी चिदंबरम ने 1996-97 के बजट भाषण में तमिल ऋषि-कवि तिरुवल्लुवर की पंक्तियां इयात्तरालुम, एत्तालुम, कत्तालुम, कट्टा; वकुथालम वल्लाथ अरासु दोहराई थीं, जिसका अर्थ है-धन बढ़ाने लायक बनो, इसे संभालो और इसकी रक्षा करो; और बेहतर है इसे बांटो और अपनी अपनी बेहतर पहचान बनाओ। उस भाषण में उन्होंने गालिब का एक शेर भी पढ़ा था, रेख्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था। उन्हें अंग्रेजी भाषा का भी जानकार माना जाता है, पर कभी उन्होंने अंग्रेजी के किसी कवि का उद्धरण नहीं दिया।
यशवंत सिन्हा ने 1998-99 में एनडीए सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर अपने पहले बजट भाषण में रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां उद्धृत की थीं, अंधेरी रात के सितारों का रंग फीका पड़ रहा है, अब पूरा आसमान तुम्हारा है। जसवंत सिंह की निजी लाइब्रेरी उनकी बौद्धिकता का प्रमाण देती रही हैं, पर उनके बजट भाषण में कभी किसी कविता या किसी महापुरुष का उद्धरण नहीं मिला। मोरारजी देसाईे कड़क मिजाज के थे, इसलिए उनके बजट भाषणों का रूखापन समझ में आता था, पर कोमल मन के और कवि-चित्रकार होने के बावजूद वीपी सिंह के बजट भाषण भी विशुद्ध आंकड़ेबाजी से लबरेज होते थे, उनमें कविता नहीं होती थी।
अब रेल बजट को मुख्य बजट में समाहित कर दिया है, पर कभी रेल बजट पेश करते हुए ममता बनर्जी शेर पढ़ती थीं। 2002 के रेल बजट भाषण में दीदी ने शहीदों के सम्मान में की जाने वाली बजट घोषणाओं से पूर्व लता मंगेशकर की एक प्रसिद्ध गीत की पंक्तियां पढ़ी थीं, कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गोरखा कोई मद्रासी, सरहद पर मरने वाला हर वीर था भारतवासी। जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी। दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट भाषण में शेर पढ़ा था, हाथ की लकीरों से बनती जिंदगी नहीं, अगर हममें चेष्टा न हो इसे बनाने की।
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क्या यह माना जाए कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली आज अपने बजट भाषण में किसी महान लेखक की रचना या किसी महापुरुष की किसी सूक्ति का उल्लेख करेंगे? उनसे इस तरह की अपेक्षा इसलिए है, क्योंकि विभिन्न विषयों की पुस्तकों की खुशबू उन्हें खींचती है।
1991 के बजट को कौन भूल सकता है? राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 24 जुलाई, 1991 को अपने बजट भाषण में फ्रेंच लेखक विक्टर ह्यूगो की एक पंक्ति, नो पावर ऑन अर्थ कैन स्टॉप एन आइडिया हूज टाइम हैज कम दोहराकर नई शुरुआत की थी। यानी कोई भी ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती, जिसके आने का वक्त हो चुका है।
कुछ जानकारों का मानना है कि ह्यूगो का भाव वह नहीं था, जो मनमोहन सिंह ने व्यक्त किया था। ह्यूगो की कविता का अर्थ है कि हम सैन्य हमले का विरोध कर सकते हैं, पर विचारों के हमलों को रोकना नामुमकिन है। पी चिदंबरम ने 1996-97 के बजट भाषण में तमिल ऋषि-कवि तिरुवल्लुवर की पंक्तियां इयात्तरालुम, एत्तालुम, कत्तालुम, कट्टा; वकुथालम वल्लाथ अरासु दोहराई थीं, जिसका अर्थ है-धन बढ़ाने लायक बनो, इसे संभालो और इसकी रक्षा करो; और बेहतर है इसे बांटो और अपनी अपनी बेहतर पहचान बनाओ। उस भाषण में उन्होंने गालिब का एक शेर भी पढ़ा था, रेख्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था। उन्हें अंग्रेजी भाषा का भी जानकार माना जाता है, पर कभी उन्होंने अंग्रेजी के किसी कवि का उद्धरण नहीं दिया।
यशवंत सिन्हा ने 1998-99 में एनडीए सरकार के वित्त मंत्री के तौर पर अपने पहले बजट भाषण में रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां उद्धृत की थीं, अंधेरी रात के सितारों का रंग फीका पड़ रहा है, अब पूरा आसमान तुम्हारा है। जसवंत सिंह की निजी लाइब्रेरी उनकी बौद्धिकता का प्रमाण देती रही हैं, पर उनके बजट भाषण में कभी किसी कविता या किसी महापुरुष का उद्धरण नहीं मिला। मोरारजी देसाईे कड़क मिजाज के थे, इसलिए उनके बजट भाषणों का रूखापन समझ में आता था, पर कोमल मन के और कवि-चित्रकार होने के बावजूद वीपी सिंह के बजट भाषण भी विशुद्ध आंकड़ेबाजी से लबरेज होते थे, उनमें कविता नहीं होती थी।
अब रेल बजट को मुख्य बजट में समाहित कर दिया है, पर कभी रेल बजट पेश करते हुए ममता बनर्जी शेर पढ़ती थीं। 2002 के रेल बजट भाषण में दीदी ने शहीदों के सम्मान में की जाने वाली बजट घोषणाओं से पूर्व लता मंगेशकर की एक प्रसिद्ध गीत की पंक्तियां पढ़ी थीं, कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गोरखा कोई मद्रासी, सरहद पर मरने वाला हर वीर था भारतवासी। जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी। दिनेश त्रिवेदी ने अपने बजट भाषण में शेर पढ़ा था, हाथ की लकीरों से बनती जिंदगी नहीं, अगर हममें चेष्टा न हो इसे बनाने की।