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राज्यों पर नियंत्रण

Sun, 03 May 2020 07:59 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 03 May 2020 07:59 AM IST
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pm narendra modi state vs centre government
मुख्यमंत्रियों से बात करते पीएम मोदी (फाइल फोटो) - फोटो : ANI

परवरिश और वैचारिक गठन के संदर्भ में नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी से अधिक कोई और दो भारतीय राजनेता एक दूसरे के विपरीत नहीं हो सकते हैं। एक ने बड़े होते हुए जहां भारी कष्ट देखा, तो दूसरी का लालन-पालन सामाजिक और आर्थिक विशेषाधिकार वाले माहौल में हुआ। एक की वैश्विक दृष्टि को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में बिताए गए अनेक वर्षों से आकार मिला, तो दूसरी अपने पिता से प्रभावित थीं, जो आरएसएस को नापसंद करते थे। एक का परिवार नहीं है, तो दूसरे के बच्चे और नवासी तथा नवासे भी हैं। एक को भारतीय राजनीति की सीढ़ी में अपने लिए रास्ता बनाने के लिए कदम दर कदम आगे बढ़ना पड़ा; तो दूसरी को सीधे उच्च स्तर पर प्रवेश सिर्फ उनके जन्म के आधार पर मिल गया।


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उनकी जीवनियों में इतने फर्क के बावजूद, मुझे काफी समय से यह लगता रहा है कि उनकी राजनीतिक शैलियों में जबर्दस्त समानताएं हैं। फरवरी, 2013 में मैंने द हिंदू में लिखा था, 'न तो श्री मोदी के प्रशंसक और न ही उनके आलोचक शायद यह पसंद करें, मगर सच यह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री अतीत और वर्तमान के तमाम भारतीय राजनेताओं में से जिस शख्स से सबसे अधिक मिलते जुलते हैं, वह हैं 1971-77 के दौर की इंदिरा गांधी। जैसा कि कभी श्रीमती गांधी ने किया था, मोदी अपनी पार्टी, अपनी सरकार, अपने प्रशासन और अपने देश को अपने व्यक्तित्व का विस्तार जैसा बनाना चाहते हैं।

यह आलेख जब प्रकाशित हुआ था, तब गुजरात के मुख्यमंत्री अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा मुखर होकर व्यक्त रहे थे। पंद्रह महीने बाद, भाजपा विजयी हुई, 1984 के बाद लोकसभा में पहली बार किसी दल को पूर्ण बहुमत मिला, नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए। मोदी के शुरुआती महीनों में ही इंदिरा गांधी से उनकी तुलना की मानो पुष्टि हो गई। उन्होंने जैसा कभी किया था, ठीक उन्हीं की तरह अपनी पार्टी के नेताओं का उन्होंने कद कम कर दिया; प्रेस की नकेल कसनी चाही; सिविल सर्विसेज, कूटनीतिक कोर और जांच एजेंसियों का राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया; और खुद की व्यक्तित्व पूजा करने जैसी छवि गढ़ने कोशिश की।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीने के भीतर ही कुछ अन्य लोगों ने भी उनकी इंदिरा गांधी के साथ तुलना की। 'अघोषित आपातकाल', यहां तक कि 'धीरे धीरे आगे बढ़ते फासीवाद' की भी बात कई गई। मुझे खुद प्रधानमंत्री की केंद्रीकृत प्रवृत्तियों को लेकर कोई भ्रम नहीं था, फिर भी मेरे भीतर का इतिहासकार 1975 के भारत और 2014 के भारत के बीच के बुनियादी फर्क को लेकर सचेत था। इंदिरा गांधी ने जब आपातकाल लगाया था, तब केंद्र में सत्तारू़ढ़ उनकी कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु को छोड़कर बाकी सारे बड़े राज्यों में भी या तो अपने दम पर या गठबंधन के साथ सत्ता में थी। दूसरी ओर जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब संघ के अनेक राज्य उनकी भारतीय जनता पार्टी के नियंत्रण से बाहर थे। तब मुझे उम्मीद थी कि हमारी संघीय व्यवस्था पूर्ण अधिनायकवाद के विरुद्ध बचाव का काम करेगी। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल में भाजपा ने कुछ बड़े राज्यों में चुनावी जीत हासिल की और कुछ बड़े राज्यों में चुनावी हार का सामना किया। यहां तक कि 2019 में केंद्र में मोदी और भाजपा भारी जीत दर्ज करने के बावजूद कई राज्यों में जीत हासिल नहीं कर सके, जैसा कि महाराष्ट्र और झारखंड में दिखा।

सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों से भारतीय संघवाद के लोकतांत्रिक संभावनाओं के प्रति आस्था मजबूत हुई। नागरिकों का बड़ा हिस्सा भेदभाव करने वाले इस अधिनियम के खिलाफ उठ खड़ा हुआ, जो संविधान का घोर उल्लंघन करता प्रतीत होता था। अनेक बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री भी नए कानून के खिलाफ थे। इससे फिर पुष्टि हुई की वर्तमान अतीत जैसा नहीं है। इंदिरा गांधी ने जो किया वह सिर्फ इसलिए कर सकी थीं, क्योंकि केंद्र के साथ ही तकरीबन सारे राज्यों (इमरजेंसी लागू होने के कुछ महीने बाद तमिलनाडु की द्रमुक सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था) में उनकी पार्टी की सरकार थी।हालांकि कोविड-19 ने हर चीज को बदल कर रख दिया है। इसने नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को संघीय ढांचे को कमजोर करने और केंद्र के साथ ही राज्यों की शक्तियों में मौलिक रूप से बदलाव लाने का अवसर दिया है। उन्होंने इस लक्ष्य की मजबूती के लिए विभिन्न तरह के औजारों का इस्तेमाल किया हैः

1. राज्यों के हिस्से के रूप में पहले से तय जीएसटी संग्रह से आवंटन को स्थगित किया गया। यह राशि 30,000 करोड़ रुपये से अधिक है। यदि शीघ्र इस राशि को आवंटित किया जाए, तो इससे लोगों की हताशा कम हो सकती थी।
2. केंद्र में एक नए कोष का निर्माण, तथाकथित पीएम-केयर्स, जो राज्यों के साथ इस मामले में भेदभाव करता है कि यह विशेष छूट देता है (दान को 'कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांब्लिटी' के रूप में मान्यता देकर) जबकि ऐसे लोग इससे वंचित होंगे, जो राज्यों के मुख्यमंत्री कोष में दान देना चाहते हैं। इस कोष से प्रधानमंत्री को हजारों करोड़ रुपये खर्च करने का व्यापक विशेषाधिकार मिल जाता है। इस कोष का इस्तेमाल गोपनीय है, यहां तक कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को भी इसके आडिट की इजाजत नहीं है।
3. संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) को खत्म किया जाना केंद्रीकरण का एक और नग्न उदाहरण है, इससे संसद सदस्यों को अपने क्षेत्र की तकलीफों को कम करने की इजाजत नहीं होगी।
4. गैर भाजपा सरकारों के प्राधिकार को कम करने और उनके कामकाज को प्रभावित करने के इरादे से राज्यपालों का भेदभावपूर्ण व्यवहार, जैसा कि महाराष्ट्र के राज्यपाल ने विधान परिषद में मुख्यमंत्री के नामांकित नामों को मंजूरी देने में अनावश्यक विलंब किया और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल द्वारा अपनी मुख्यमंत्री के खिलाफ इस्तेमाल की गई असाधारण भाषा (' मैं बता सकता हूं कि आपकी पूरी रणनीति पश्चिम बंगाल में कोरोना वायरस को नियंत्रित करने की अपनी घनघोर नाकामी से ध्यान भटकाने से जुड़ी है। अल्पसंख्यक समुदाय का आपका तुष्टीकरण एकदम स्पष्ट और अजीब है...' इत्यादि।) यह साफतौर पर नहीं लगता कि ये राज्यपाल अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं; ऐसा लगता है कि भाजपा हाई कमांड उनके जरिये अपना विभाजनकारी एजेंडा इन दो बड़े राज्यों में आगे बढ़ाना चाहता है, जहां अभी सरकार में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है।

यह सूची (जो कि सिर्फ उदाहरण के लिए है और किसी भी रूप में समग्र नहीं है) दिखाती है कि शायद केंद्र की ओर से राज्यों को झुकाने के प्रयास हो रहे हैं। यह रेखांकित किया जा सकता है कि संघवाद को कमजोर करने के लिए कोविड-19 महामारी के इस्तेमाल के साथ ही प्रधानमंत्री की व्यक्ति पूजा की छवि गढ़ने के प्रयास भी हो रहे हैं। दूरदर्शन, वरिष्ठ मंत्रीगण और सत्तारूढ़ दल का आईटी सेल लगातार यह दावा करने के लिए काम कर रहे हैं कि सिर्फ मोदी ही भारत को बचा सकते हैं। 

2002 के पहले और उसके बाद अक्सर गुजरात जाने वाले किसी भी शख्स की तरह मुझे नरेंद्र मोदी की राजनीतिक शैली को लेकर कोई भ्रम नहीं है। मुझे पता था कि वह बहुलतावादी, सामंजस्यपूर्ण और खुले मन वाले नेता नहीं हैं, जिसकी हमारे विविधतापूर्ण और विभाजित देश को जरूरत है। इसके बजाए उनका यकीन अपनी पार्टी, मंत्रिमंडल, अधिकारियों और अपने राज्य पर पूरा नियंत्रण करने में था। इसीलिए मैंने फरवरी, 2013 में उनकी तुलना एक अन्य स्वाभाविक निरंकुश इंदिरा गांधी से की थी। इसके बावजूद मैं मानता था कि जब मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे, तब जमीनी तथ्य उनकी पूर्ण नियंत्रण और केंद्रीकरण वाली महत्वाकांक्षाओं को रोकेंगे।

मई, 2014 और जनवरी, 2020 के दौरान इस लेखक ने, जो इमरजेंसी का गवाह रहा है और उस पर शोध किया है, इस तथ्य पर विचार किया, चूंकि अनेक बड़े राज्यों में केंद्र में सत्तारूढ़ दल से भिन्न पार्टियों की सरकारें हैं, गणतंत्र वैसी तानाशाही में नहीं बदल सकता, भारत 1975 से मार्च 1977 के बीच जिसका गवाह रहा। अतीत के आधार पर राहत के इस एहसास में भविष्य में क्या कुछ घटने वाला है, उसका अनुमान नहीं था। इस महामारी ने मोदी सरकार को भारतीय संघवाद को आक्रामक तरीके से कमजोर करने का अवसर दिया है। उन्हें इसमें सफल होने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। राज्यों को उन्हें जितना संभव हो सके रोकना चाहिए। इमरजेंसी ने हमें कोई सबक दिया है, तो यही कि एक पार्टी, एक विचारधारा और एक नेता को हमारे शानदार विविधतापूर्ण गणतंत्र पर फिर कभी अपनी इच्छा थोपने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
 

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