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अमेरिका में पीएम: क्या बाइडन पर चलेगा मोदी का जादू

Thu, 23 Sep 2021 06:52 AM IST
Surendra Kumar सुरेंद्र कुमार
Updated Thu, 23 Sep 2021 06:52 AM IST
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सार
कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी और बाइडन के बीच रिश्ते बेहद अच्छे रहेंगे। बावजूद इसके कि इस बार उनका रॉक स्टार जैसा स्वागत समारोह नहीं हो रहा है, जैसा कि बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुआ था या फिर हाउडी मोदी जैसा कार्निवाल, जब डोनाल्ड ट्रंप ने पचास हजार भारतीय अमेरिकियों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी की थी। 
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PM Narendra Modi in America: Will Modi s magic work on Joe Biden
पीएम मोदी - फोटो : ANI

विस्तार

भले ही उनके कट्टर विरोधी कुछ भी कहें, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी ऐसी विशिष्ट और अद्वितीय आकर्षण शैली विकसित की है, जो उन्हें अपने विदेशी समकक्षों में सकारात्मक भावना पैदा करने और व्यक्तिगत रिश्ते बनाने में मदद करती है। वह दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों-बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप के साथ मजबूत व्यक्तिगत रिश्ते बनाने में सक्षम रहे, जो व्यक्तिगत रूप से एक-दूसरे के विपरीत थे। 



ऐसे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी और बाइडन के बीच रिश्ते बेहद अच्छे रहेंगे। बावजूद इसके कि इस बार उनका रॉक स्टार जैसा स्वागत समारोह नहीं हो रहा है, जैसा कि बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान मैडिसन स्क्वायर गार्डन में हुआ था या फिर हाउडी मोदी जैसा कार्निवाल, जब डोनाल्ड ट्रंप ने पचास हजार भारतीय अमेरिकियों की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी की थी। 


22 सितंबर से शुरू हुई अपनी चार दिवसीय अमेरिका यात्रा के दौरान मोदी क्वॉड सम्मेलन में शामिल होने के साथ ही संयुक्त राष्ट्र महासभा को भी संबोधित करेंगे। इससे पहले बाइडन और मोदी ने फोन पर बात की है और आभासी तौर पर तीन बार (21 मार्च को क्वाड शिखर सम्मेलन में, 21 अप्रैल को जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में और इसी वर्ष जून में जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में) मुलाकात की है। 

अमेरिकी रक्षामंत्री लॉयड ऑस्टिन और विदेशमंत्री एंटनी ब्लिंकन ने क्रमशः इस साल मार्च और जुलाई में भारत का दौरा किया था। और 2050 तक अपनी शून्य उत्सर्जन प्रतिबद्धता की घोषणा करने के लिए भारत पर दबाव बनाए रखते हुए जलवायु परिवर्तन पर अमेरिकी राष्ट्रपति के दूत, जॉन केरी ने अप्रैल और सितंबर में भारत का दौरा किया है। अपनी अंतिम यात्रा के दौरान, केरी ने भारत के साथ क्लाइमेट ऐक्शन ऐंड फाइनेंस मोबिलाइजेशन (सीएएफएम) लॉन्च किया, जो वित्तीय संसाधन जुटाने, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु अनुकूलन उपायों पर ध्यान केंद्रित करेगा। 

भारत को अमेरिकी रक्षा निर्यात उच्च स्तर पर बना हुआ है। दोनों देशों ने तीन बुनियादी संचार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं: एलईएमओए, सीओएमसीएएसए और बीईसीसीए। भारत को अमेरिका के नाटो सहयोगियों के बराबर लाने के लिए प्रमुख रक्षा भागीदार और सैट-1 का दर्जा दिया गया है, जो नागरिक और रक्षा उपयोग के लिए संवेदनशील अमेरिकी प्रौद्योगिकियों के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करेगा। 

जाहिर है, भारत और अमेरिका ने इतिहास की झिझक को दूर किया है और सैन्य रूप से पहले से कहीं ज्यादा करीब आ गए हैं। अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, साइबर अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग से लड़ने के लिए सूचना, उपग्रह छवियों और खुफिया सूचनाओं का व्यापक आदान-प्रदान किया गया है। कोविड-19 के व्यवधानों के बावजूद, 2019-20 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 88.75 अरब डॉलर होने का अनुमान लगाया गया था; 2020-21 में अमेरिका के साथ भारत का व्यापार अधिशेष 23 अरब डॉलर था। अमेरिका ने तेल के दूसरे सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में सऊदी अरब की जगह ले ली है। 

बहरहाल, व्यापार और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के हवाले से हाल ही में कहा गया था कि निकट भविष्य में अमेरिका के साथ एक छोटा व्यापार समझौता होने की भी संभावना नहीं है। अमेरिका अपने कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में पहुंच, जो भारत के लिए एक संवेदनशील क्षेत्र है और बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) तथा डेटा संरक्षण से संबंधित कानूनों में पर्याप्त संशोधन की मांग कर रहा है। 

भारत भी अपने ऑटोमोबाइल पार्ट्स, इंजीनियरिंग और कृषि उत्पाद के लिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच और जीएसपी पर पुनर्विचार की मांग कर रहा है, जो वापस ले लिया गया है और एक समग्र समझौते के लिए लंबे समय से मांग लंबित है। एच1बी वीजा मुद्दे और कुछ अन्य नियमों ने भारतीय टेक कंपनियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। कुछ शुरुआती झिझक के बाद, अमेरिका ने कोरोना महामारी की दूसरी लहर के कारण हुई तबाही के बीच भारत को मिशन मोड पर सहायता प्रदान की। 

वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पार चीनी आक्रमण के मुद्दे पर ट्रंप और बाइडन प्रशासन दोनों ही भारत का समर्थन करते रहे हैं। वास्तव में, बढ़ती चीनी मुखरता और आक्रामकता भारत-अमेरिका को करीब लाती है। काफी हद तक चीन ही वह कारक है, जिसने अमेरिका को क्वाड और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के महत्व को स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया है। 

क्वाड के नेता, अपने शिखर सम्मेलनों में, इस बात पर जोर देते रहे हैं कि वे एक स्वतंत्र, खुले और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए खड़े हैं, जिसमें नौवहन और विमानों के आवागमन की स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अनुसार क्षेत्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान शामिल है। आगामी क्वाड शिखर सम्मेलन में भी इसे दोहराया जाएगा। मोदी क्षेत्र में सबकी सुरक्षा और विकास (सागर) की अपनी अवधारणा पर जोर दे सकते हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी ने बराक ओबामा और ट्रंप, दोनों को सलाह दी थी कि अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को बुलाने में जल्दबाजी न करें। भारत ने बार-बार दोहराया कि अच्छा या बुरा तालिबान नाम की कोई चीज नहीं है, वे एक ही हैं और अनिवार्य रूप से बुरे हैं। लेकिन युद्ध से थका हुआ अमेरिका अफगानिस्तान से बाहर निकलने के लिए इतना बेताब था कि उसने पाकिस्तान और कतर की मदद से विगत 21 मार्च को दोहा समझौता किया, जो तालिबान के सामने उसका आत्मसमर्पण था। 

उपराष्ट्रपति कमला हैरिस और डेमोक्रेट सांसद प्रमिला जयपाल के पृष्ठभूमि में होने के बावजूद जो बाइडन भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक सहिष्णुता के कथित उल्लंघनों में वृद्धि की रिपोर्ट को मंजूरी दे सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र में उनके भाषण में कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई शामिल हो सकती है और संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन और डब्ल्यूएचओ को मजबूत करने की जरूरत को रेखांकित किया जा सकता है तथा चीन और पाकिस्तान जैसे कुछ देशों की नकारात्मक भूमिका की ओर इशारा किया जा सकता है।

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