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पीएम मोदी की लोकप्रियता पर असर :कितनी कारगर होगी विपक्षी एकता

Tue, 24 Aug 2021 03:39 AM IST
rashid Kidwai रशीद किदवई
Updated Tue, 24 Aug 2021 03:39 AM IST
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PM Modi popularity: How effective will opposition unity be?
पीएम मोदी - फोटो : ANI

विपक्षी दल अपने ही फीडबैक से उत्साहित हैं कि नरेंद्र मोदी का जादू खत्म हो रहा है। एक मीडिया प्रतिष्ठान द्वारा हाल ही में किए गए सर्वेक्षण में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में भारी गिरावट देखी गई। फिलहाल दो चीजें मोदी के खिलाफ जा रही हैं-एक तो देश की आर्थिक स्थिति और दूसरा, कोविड-19 को संभालने में सरकार द्वारा वांछित कार्रवाई में कमी। लेकिन विपक्ष बेहद चतुराई से विधानसभा चुनावों में हाथ मिलाने की कोशिश नहीं कर रहा, खासकर उत्तर प्रदेश को विपक्ष की नाकामी के तौर पर देखा जा सकता है। हाल ही में संपन्न हुए संसद के मानसून सत्र में विपक्षी दलों ने एकता का दुर्लभ प्रदर्शन किया। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अब कांग्रेस पार्टी का नए गठबंधन के प्रति बड़े भाई वाला रवैया नहीं है। उतनी ही उल्लेखनीय बात यह है कि सोनिया या राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। इसका मतलब यह है कि विपक्षी गठबंधन में प्रधानमंत्री का पद किसी के भी पास जा सकता है। 


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इस संदर्भ में यह भी पता चलता है कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल के बाहर अपना आधार क्यों बढ़ा रही हैं और असम व त्रिपुरा में पैठ क्यों बना रही हैं? तृणमूल को उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनाव में वह अपनी सीटों की संख्या 50 से अधिक तक ले जाएगी। सुष्मिता देव के कांग्रेस से तृणमूल में जाने के बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा गया है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि वह एक समान विचारधारा वाली दोस्ताना पार्टी में गई हैं। जिस दिन से तृणमूल एक पार्टी के रूप में अस्तित्व में आई थी, उसी दिन से कांग्रेस और तृणमूल के बीच अवैध शिकार चल रहा है। तृणमूल कांग्रेस में ज्यादातर लोग पूर्व कांग्रेसी हैं। विपक्ष के पास एक स्पष्ट रोडमैप है, जिसकी परिकल्पना बहुत अच्छे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने की थी और जिसे कई तत्वों का मिश्रण कहा जा सकता है। 

लोकसभा में बहुमत पाने की जादुई संख्या 272 है। कांग्रेस इसका आधा यानी 136 सीटें जीतने की उम्मीद करती है, बाकी आधी सीटें गैर-कांग्रेस और गैर-राजग पार्टियों द्वारा जीते जाने की योजना है। कांग्रेस सरकार बनाने का दावा तभी करेगी, जब उसे 150 या इससे अधिक सीटें मिलेंगी, जिसकी संभावना फिलहाल बहुत कम है। सोनिया के नेतृत्व वाली कांग्रेस का स्पष्ट उद्देश्य भाजपा को हराना है। कांग्रेस 2024 में प्रधानमंत्री मोदी को एक और कार्यकाल नहीं देना चाहती और इसके लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार है। कांग्रेस किसी भी वैकल्पिक सरकार का हिस्सा होगी, जिसमें भाजपा नहीं होगी। वह वित्त, गृह और विदेश मामलों जैसे मंत्रालयों पर नजर रखेगी, जहां उसके पास उस क्षेत्र की विशेषज्ञता और राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य है। इससे उसका उस गठबंधन के भीतर दबदबा रहेगा। यह पूछना एक फैशनेबल और अभिजात दृष्टिकोण है कि 'मोदी नहीं तो कौन?' 

वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में भी यह सवाल पूछा जा रहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी नहीं, तो कौन? यह याद किया जाना चाहिए कि उस वक्त चुनाव होने से पहले सभी चुनावी सर्वेक्षण में वाजपेयी को बढ़त दिखाई जा रही थी, और हम सब उस चुनाव के नतीजे जानते हैं। तब वाजपेयी चुनाव हार गए थे। चुनाव से पहले डॉ. मनमोहन सिंह तस्वीर में कहीं नहीं थे और सोनिया गांधी को वाजपेयी के प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी नहीं देखा गया था। यदि आप विभिन्न विपक्षी दल के नेताओं के बीच के रिश्ते देखें, तो यह अधिक सौहार्दपूर्ण और मैत्रीपूर्ण है। शरद पवार, उद्धव ठाकरे, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन और कई अन्य जैसे, आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, बीजू जनता दल और यहां तक कि अकाली दल, वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टी के नेता कपिल सिब्बल के आवास पर कांग्रेस के जी-23 समूह द्वारा आयोजित उनके जन्मदिन समारोह के लिए मौजूद थे। 

हालांकि कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं। उसे अपना घर व्यवस्थित करना होगा। जब तक प्रशांत किशोर औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल नहीं होते, तब तक गैर-राजग दलों के बीच समन्वय एक चुनौती है। कांग्रेस को अहमद पटेल की कमी महसूस होती है। विपक्ष की पिछली आभासी बैठक में काफी परेशानी हुई थी, जब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के दिग्गज नेताओं के बजाय कांग्रेस सोशल मीडिया टीम के कुछ कम महत्वपूर्ण पदाधिकारी विपक्षी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ समन्वय करने की कोशिश कर रहे थे। यदि हम 1984, 1999, 2009 और 2019 को छोड़कर 1980 के दशक के बाद भारत के मतदान पैटर्न को देखें, तो देश के लोग आम तौर पर बदलाव के लिए मतदान करते हैं। वे सत्तारूढ़ दल के खिलाफ मतदान करते हैं। 

राजीव गांधी, वी पी सिंह और पी वी नरसिंह राव चुनाव हार गए थे। वाजपेयी ने 1999 में जीत हासिल की, क्योंकि एक साल बाद चुनाव हुए थे, लेकिन 2004 में वह हार गए थे। आम तौर पर मतदाताओं द्वारा सत्ताधारी दल को जनादेश नहीं दिया जाता। मतदाताओं ने मोदी को दो मौके दिए। वर्ष 2024 में वह 74 वर्ष के हो जाएंगे। बड़ा सवाल यह है कि क्या भाजपा को 2024 में निर्णायक जनादेश मिलेगा। कुछ लोग अब भी यह तर्क देंगे कि बहुप्रचारित विपक्षी एकता एक मृगतृष्णा है। उत्तर प्रदेश के चुनाव के अलावा जुलाई, 2022 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव विपक्ष के लिए लिटमस टेस्ट होंगे। आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में उत्तर प्रदेश विधानसभा के नतीजे अहम होंगे। अगर भाजपा जीत जाती है, तो विपक्षी गठबंधन को कड़ी टक्कर देने का मौका नहीं मिलेगा। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी के पास व्यापक स्वीकृति वाले किसी गैर-राजनीतिक व्यक्ति को मैदान में उतारने का विकल्प होगा। यदि वह अन्नाद्रमुक, बीजद, बसपा, वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को अपने खेमे में मिला लेते हैं, तो विपक्ष मजबूत चुनौती देने की स्थिति में नहीं होगा। कुल मिलाकर, वर्ष 2024 तक शह और मात का खेल जारी रहेगा।

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