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पीएम मोदी ने दिया पचास खरब डॉलर का लक्ष्य, इन नीतिगत पहल से गुजर कर होगी पूरी

Sun, 15 Sep 2019 12:19 AM IST
टी वी मोहनदास पाई टीवी मोहनदास पई और निशा होला
टीवी मोहनदास पई और निशा होला Published by: टी वी मोहनदास पाई Updated Sun, 15 Sep 2019 12:19 AM IST
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PM Modi gave target five trillion dollars, will be fulfilled through these policy initiatives
अर्थव्यवस्था - फोटो : फाइल फोटो

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और इसके नागरिकों को 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था को पचास खरब डॉलर तक पहुंचाने का एक ऊंचा लक्ष्य दिया है। हर आगे बढ़ते देश के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य जरूरी होता है, सो हर कोई इस लक्ष्य तक पहुंचने में योगदान करना चाहता है। इस दृष्टिकोण पर आगे बात करने से पहले हम मौजूदा हालात पर गौर करते हैं। वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आकार 190 लाख करोड़ रुपये या 27 खरब डॉलर (एक डॉलर 70 रुपये के मूल्य के आधार पर) था। यानी अगले छह वर्ष तक आठ फीसदी की विकास दर से, यानी 3.5 फीसदी मुद्रास्फीति के साथ 11.5 फीसदी की सामान्य विकास दर से 27 खरब डॉलर से पचास खरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य अव्यवहारिक नहीं है।


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प्रधानमंत्री मोदी ने भारत और इसके नागरिकों को 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था को पचास खरब डॉलर तक पहुंचाने का एक ऊंचा लक्ष्य दिया है। हर आगे बढ़ते देश के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य जरूरी होता है, सो हर कोई इस लक्ष्य तक पहुंचने में योगदान करना चाहता है। इस दृष्टिकोण पर आगे बात करने से पहले हम मौजूदा हालात पर गौर करते हैं। वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का आकार 190 लाख करोड़ रुपये या 27 खरब डॉलर (एक डॉलर 70 रुपये के मूल्य के आधार पर) था। यानी अगले छह वर्ष तक आठ फीसदी की विकास दर से, यानी 3.5 फीसदी मुद्रास्फीति के साथ 11.5 फीसदी की सामान्य विकास दर से 27 खरब डॉलर से पचास खरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य अव्यवहारिक नहीं है।

रुपये के अवमूल्यन जैसी चिंता को किनारे रखते हुए असल मुद्दा यह है कि क्या हम अगले छह वर्ष तक आठ फीसदी की विकास दर हासिल कर सकते हैं? 1991 में जब देश की अर्थव्यवस्था को मुक्त किया गया था, तब जीडीपी 275 अरब डॉलर थी; 27 खरब डॉलर पहुंचने तक देखें तो डॉलर के संदर्भ में औसतन 8.5 फीसदी की विकास दर की जरूरत थी। 8.5 फीसदी की विकास दर अवधारणात्मक है और इस बात का प्रमाण है कि भारत के पास यह क्षमता है। भारत के 28 वर्ष के मजबूत इतिहास और विकास की क्षमता को देखते हुए भारत के पचास खरब डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने की संभावना 80 फीसदी से भी अधिक है। आठ फीसदी की विकास दर हासिल करने और उसे कायम रखने के लिए अगले छह वर्षों तक अनेक नीतिगत पहलों की जरूरत होगीः-

समाज में स्थिरता : प्रधानमंत्री मोदी ने प्रत्येक भारतीय तक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने की बुनियाद रख दी है। 2021 तक हर भारतीय के पास अपना मकान, भोजन, गैस कनेक्शन सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी, हर कोई अपने जीवन को बेहतर करने की आकांक्षा को पूरा कर सकेगा।

उत्पादन क्षेत्र में बेहतरी : आंकड़े दिखाते हैं कि 2016-17 में भारत के कुल कार्यबल में से 42.7 फीसदी कृषि क्षेत्र से जुड़े थे, जो कि 3.4 फीसदी की सुस्त गति से आगे बढ़ रहा था और जीडीपी में जिसकी हिस्सेदारी सिर्फ 17.3 फीसदी थी। जबकि 57.3 फीसदी कार्यबल उद्योग और सेवा क्षेत्र से जुडे थे, जोकि क्रमश: 5.5 फीसदी और 7.6 फीसदी की दर से आगे बढ़ रहे थे। यह उच्च स्तर की आय गैरबराबरी को दिखाता है। 2030 तक भारत को कृषि पर निर्भर आबादी को उद्योग और सेवा क्षेत्रों की ओर ले जाना होगा। कृषि क्षेत्र के लिए दस फीसदी कार्यबल पर्याप्त है, अमेरिका और चीन दोनों ने ऐसा किया है और उनके यहां कृषि क्षेत्र का उत्पादन सरप्लस है। सर्वाधिक मूल्य संवर्धन सेवा और उद्योग क्षेत्रों में हो रहा है; कुशल श्रम और प्रोत्साहन के जरिये हम आर्थिक विकास में बड़ा योगदान करेंगे।

लेबर इंटेंसिव इंडस्ट्री (एलआईआई) के जरिये शहरीकरण : शहरीकरण से मानवीय गतिविधियों में तेजी आती है और इससे उत्पादन तथा विशेषज्ञ गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलता है। हर किसी को रोजगार मुहैया कराने के लिए तेज शहरीकरण की जरूरत है, और यह सिर्फ दस बड़े शहरों तक सीमित न हो, बल्कि पूरे भारत भर में पांच हजार छोटे शहरों और कस्बों का विकास भी जरूरी है। इन शहरों-कस्बों के आसपास एलआईआई के निर्माण से पलायन रुकेगा और लोगों को अच्छे वेतन वाला रोजगार मिल सकेगा। अच्छे नियोजन से इन पांच हजार शहरों-कस्बों का नेटवर्क भारत का विकास इंजन बन सकता है।

आधारभूत संरचना का विकास : भारत के निर्माण क्षेत्र यानी सड़क, रेलवे, बंदरगाहों, पर्यटन, बिजली आदि को पर्याप्त प्रोत्साहन की जरूरत है। मसलन रेलवे के जरिये माल ढुलाई की मौजूदा 25 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार को 50-60 किलोमीटर प्रति घंटे तक बढ़ाने की जरूरत है। चीन की तरह इससे आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के साथ ही रोजगार पैदा करने में मदद मिलेगी। आज सप्लाई चेन की लागत जीडीपी के 14 फीसदी के बराबर है। जीएसटी ने इसे दो फीसदी कम किया है। अगले तीन वर्षों में इसे और कम कर आठ से नौ फीसदी तक लाया जा सकता है।

रोजगार और कौशल : भारत को सालाना 1.5 करोड़ रोजगार पैदा करने जरूरत है। समस्या रोजगार की कमी की नहीं, बल्कि कम गुणवत्ता और कम वेतन वाले रोजगार की है। एलआईआई और कंस्ट्रक्शन उद्योग के जरिये इस समस्या को सुलझाया जा सकता है।

कर और न्याय : कर आतंक ने भारत को खासा नुकसान पहुंचाया है और इसके कारण पांच वर्ष में कानूनी मामले दोगुना हो गए। कर न्याय प्रणाली में सुधार की जरूरत है, ताकि अनावश्यक मामलों को और कर आतंक को कम किया जा सके। कॉरपोरेट टैक्स को तुरंत कम कर 25 फीसदी के वैश्विक औसत तक लाने की जरूरत है।

न्यायिक सुधार : हमारे न्यायिक ढांचे और पुलिस जांच की क्षमता को बेहतर बनाने की अत्यंत आवश्यकता है, ताकि आम आदमी को आज के औसतन 15 से बीस वर्ष की तुलना में तीन वर्ष में न्याय मिल सके। ढाई लाख से अधिक विचाराधीन कैदी जेलों में बंद हैं, जिनकी तारीखें शायद कभी नहीं आएंगी और वे इतने गरीब हैं कि जमानत के लिए भी अर्जी नहीं दे पा रहे हैं। आज हमारे यहां प्रति दस लाख आबादी के पीछे 18 जज हैं, जिसे अगले पांच-छह वर्ष में बढ़ाकर पचास करने की जरूरत है।

डिजिटल अर्थव्यवस्था : भारत तेजी से डाटा विपन्न से डाटा समृद्ध देश की ओर बढ़ रहा है। अधिकांश भारतीयों के पास आज डिजिटल पहचान मौजूद है। एक अरब से अधिक मोबाइल फोन, 56 करोड़ इंटरनेट कनेक्शन के साथ 2014 से 35 करोड़ अतिरिक्त बैंक खाते खोले गए हैं। भुगतान के नए तरीकों, ई कॉमर्स और स्टार्टअप के जरिये हम आगे बढ़ रहे हैं। डाटा हमारा है, लेकिन इन्हें प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने वाली गूगल, फेसबुक, ट्वीटर टेनसेंट और अलीबाबा जैसी कंपनियां अमेरिका, चीन और जापान की हैं। हम एक बंधक डिजिटल कॉलोनी बनने के जोखिम के करीब हैं। हमें ऐसे कानून बनाने की जरूरत है, ताकि भारतीय डाटा हमारी सीमाओं के भीतर मौजूद डाटा केंद्रों में ही रहें।

उच्च शिक्षा : किसी देश की वास्तविक क्षमता उसकी उच्च शिक्षा प्रणाली में निहित होती है। अमेरिका की राजनीतिक और सैन्य क्षमता उसके विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों में होने वाले नवोन्मेष में निहित है। भारत को अपने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की जरूरत है और उसे अपने विश्वविद्यालयों को स्वायत्तता देनी होगी और आधुनिकतम शोध प्रयोगशालाएं स्थापित करनी होंगी।

राज्यों की भूमिका : हम ऐसे दौर में हैं, जब केंद्र की भूमिका सीमित होती जा रही है और राज्यों का खर्च बढ़ता जा रहा है। पूरे भारत में राज्य की जीडीपी में भारी फर्क है, जिसके लिए आबादी, उर्वरता और ऐसे कई कारक जिम्मेदार हैं। भारत तब तक विकास नहीं कर सकता, जब तक कि उत्तर-मध्य-पूर्व के सघन आबादी वाले क्षेत्र समृद्ध न हों। भारत विशालकाय है, जिसके पास समृद्ध सभ्यता और विरासत है। पर्याप्त क्षमता है, ताकि वैश्विक प्रभाव डाल सके। अपने इतिहास के बड़े हिस्से में भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। भारत के पास दुनिया को दिशा देने की क्षमता है।
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