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शहर में एक कवि की जगह

sudhir vidyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Sun, 08 Dec 2019 02:19 AM IST
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place of a poet in urban by Sudhir Vidyarthi
वीरेन डंगवाल - फोटो : अ

हमारे देश के किसी शहर में क्या कवि के लिए कोई जगह हो सकती है? इस संदर्भ में केदारनाथ सिंह की कविता महानगर में कवि की कुछ पंक्तियां सहसा याद आती हैं, इस इतने बड़े शहर में/कहीं रहता है एक कवि/ वह रहता है जैसे कुएं में रहती है चुप्पी। आज के परंपरा और संस्कृति विरोधी समय में, जब साहित्य को नितांत हाशिये की वस्तु में तब्दील कर दिया है, तब क्या यह कल्पना करना भी संभव है कि किसी नगरीय या महानगरीय बस्ती में हिंदी कवि का कोई ऐसा स्मारक दिखाई दे, जिस पर उसके जिंदगीनामे के साथ उसकी कविताएं भी दर्ज हों?


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पश्चिम ने अपने साहित्यकारों की स्मृतियों को बहुत सम्मान के साथ संजोकर रखा है। हमारे यहां साहित्यकारों की स्मृतियों को संजोकर रखने की ऐसी परंपरा नहीं है। हालांकि पश्चिम बंगाल की धरती पर ऐसे दृश्य प्रायः हमारी आंखों को थाम लेते हैं, जहां बांग्ला कवियों को उनके कृतित्व के साथ यथोचित सम्मान दिया गया है। कुछ और प्रदेशों में कवियों और लेखकों को प्रासंगिक बनाए रखने की परंपरा निश्चय ही होगी। लेकिन उत्तर भारत ने इस पहल से सर्वथा निरपेक्ष बने रहकर जैसे अपने बौद्धिक परिदृश्य को धुंधला ही किया है। 

हिंदी के शीर्षस्थ कवियों में नागार्जुन, शमशेर बहादुर सिंह, केदार नाथ अग्रवाल, त्रिलोचन शास्त्री, शील, रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाम पर कहीं एक शिलालेख तक का न होना दरअसल हमारी सांस्कृतिक विपन्नता को ही इंगित करता है। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और महादेवी का भी उनकी गरिमा के अनुकूल कोई स्मारक नहीं है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बरेली नगर में अब से करीब चार साल पूर्व दिवंगत हुए साहित्य अकादमी पुरस्कार से समादृत हिंदी के चहेते कवि वीरेन डंगवाल के ऐसे स्मारक का निर्माण संभव हुआ है।

इसका शहर के साहित्य-प्रेमियों और बाहर से आए वीरेन के मित्रों-अतिथियों की उपस्थिति में लोकार्पण एक अलग ही सांस्कृतिक वातावरण की सृष्टि करता है। बरेली के मुख्य डाकघर से कचहरी जाने वाले मार्ग पर नेहरू युवा केंद्र के सामने इस कद्दावर कवि की काव्य पंक्तियां बेसाख्ता लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं। कहना न होगा कि इस स्मारक का वीरेन डंगवाल के घर के नजदीक होना भी एक सुखद संयोग है।

यह सचमुच बेहद आश्चर्यजनक और गौरवशाली बात है कि एक कवि अपनी जीवंत उपस्थिति और रचनात्मक सक्रियता के चलते हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर अपनी सशक्त पहचान दर्ज कर 28 सितंबर, 2015 को जब हमारे बीच से विदा हुआ, तब वह इस बरेली शहर को भी एक साहित्यिक चेहरा सौंपकर गया, जिस पर हमें गर्व है। वीरेन डंगवाल बहुत सामर्थ्यवान कवि होने के अलावा एक बेहद अच्छे इंसान भी थे। 

रामसिंह, इतने भले नहीं बन जाना साथी, उजले दिन जरूर, कुछ नई कस्में, दुश्चक्र में स्रष्टा, कटरी की रुक्मिनी, समोसा, पपीता, तोप, पीटी उषा जैसी न जाने कितनी लोकप्रिय और जनप्रतिबद्ध कविताएं रचने वाला अपनी भाषा का यह करिश्माई कवि अपने संपूर्ण रचना संसार (चार कविता-संग्रह) में एक ऐसे मार्ग की तलाश और पहचान करता है, जो जन के हित और उसकी मुक्ति की ओर जाता है। 

हिंदी और अंग्रेजी की पत्रकारिता के साथ ऐतिहासिक बरेली कॉलेज (1837 में स्थापित) में हिंदी अध्यापन के साथ ही यह कवि जनप्रतिबद्ध प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े रहकर राजनीतिक रूप से बेहद सचेत कर्मशील चिंतक और गद्यकार भी था, जिसकी शिनाख्त अभी बाकी है। 

बरेली शहर पारसी-हिंदी नाटक के इतिहास में उल्लिखित त्रयी में प्रमुख पंडित राधेश्याम कथावाचक, एमएन राय के विचारों से जुड़े चिंतक और ख्यात बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक तथा हिंदी के शीर्षस्थ और बेहद लोकप्रिय व्यंग्य लेखक केपी सक्सेना से भी जुड़ा है। इन लोगों की यादगारें अगर इस जमीन पर उकेर ली जाएं, तो यह विशाल शहरी आबादी अपने साहित्यिक और सांस्कृतिक गौरव से निश्चय ही संपन्न हो उठेगी।

प्रिय कवि और खूब जिंदादिल दोस्त-भाई वीरेन डंगवाल के इस आकर्षक और सादगीपूर्ण स्मारक में एक तरफ उनका जिंदगीनामा तथा तीन ओर उनकी कविताओं को अंकित किया गया है। चूंकि वीरेन और उनकी कविताओं के साथ मेरा आत्मीय जुड़ाव रहा है, इसलिए इस स्मारक के निर्माण में मेरे साथ उनके परिवार की सघन संलग्नता भी रेखांकित किए जाने योग्य है। 

याद आता है कि वीरेन के रहते कभी मैंने एक कविता में कहा था, शहर बड़ा हो रहा है और लोग छोटे/छोटे लोगों का शहर बड़ा नहीं हो सकता/चिकनी और चौड़ी सड़कों से नहीं बनते बड़े शहर/ बहुमंजिली इमारतों और रेस्तराओं से भी नहीं/चमचमाती गाड़ियां, फ्लाइओवर और हवाई अड्डे भी/किसी शहर को बड़ा नहीं बनाते/ शहर को बड़ा बनाती है वीरेन डंगवाल की कविता। सही अर्थों में कोई भी शहर अपने कवि की कविता से ही बड़ा और संपन्न बनता है। बरेली की धरती पर वीरेन का यादनामा सचमुच एक तसल्ली देने वाला सांस्कृतिक बोध भी है।

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