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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   philosophy of life hidden in Garba: Message tradition of feet trembling on beat of drum in Navratri festival

गरबे में छिपा जीवन का फलसफा : नवरात्र उत्सव में नगाड़ों की थाप पर थिरकते पैरों की परंपरा का संदेश

Fri, 30 Sep 2022 03:03 AM IST
Mahesh Parimal महेश परिमल
Updated Fri, 30 Sep 2022 03:03 AM IST
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सार
वास्तव में इन्हीं नृत्यों में छिपा होता है जीवन का ककहरा। नृत्य के साथ जीवन जीने की कला को समझा जाए, तो जीवन आसान हो सकता है। आप उन कोरियोग्राफर्स पर ध्यान दें, उनके पास जीवन की समस्याओं का समाधान मिल जाएगा।
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philosophy of life hidden in Garba: Message tradition of feet trembling on beat of drum in Navratri festival
गरबा - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अभी नवरात्रि चल रही है। इसी के साथ शुरू हो गई है युवाओं की मस्ती। गुजरात ही नहीं, अब तो पूरे देश में इन दिनों एक उत्सव का माहौल देखा जाता है। इन दिनों युवाओं के पैर थिरकने से नहीं चूकते। वे नगाड़ों की थाप पर अपने पांवों को थिरकने का मौका अवश्य देते हैं। 



वैसे देखा जाए, तो गरबा खेलना एक परंपरा ही नहीं, बल्कि इसके पीछे एक दर्शन है। गरबा लय और ताल का सामंजस्य है। इसी में छिपा है जीवन का फलसफा। जिस तरह से गरबा खेलने के दौरान पता होता है कि कब कदम आगे बढ़ाना है, कब रोकना है और कब किसी के इंतजार में खड़े रहना है। 


यही कदमताल जीवन में भी दिखाना होता है, तभी जीवन सार्थक होता है। अन्यथा सही कदमताल न होने के कारण कई जीवन बर्बाद हो जाते हैं। गरबा में दर्शन को तलाशना थोड़ा हास्यास्पद लग सकता है। पर जीवन को दूसरे नजरिये से देखने वालों के लिए यह किसी दर्शन से कम नहीं है। 

इसके फलसफे को वही समझ सकते हैं, जिन्होंने गरबा खेला है। बचपन में अक्सर गरबा खेलते समय डांडिया हमारे सिर पर लग जाता था। तब जोश-जुनून के आगे कुछ नहीं होता था, पर देर रात डांडिए की वह चोट असर दिखाना शुरू कर देती थी। 

सिर के उस हिस्से पर उभार महसूस होने लगता था। जीवन में विपदाएं आती ही रहती हैं। हम समझते हैं कि आखिर ये विपदाएं हमारे सामने ही क्यों आती हैं? अब जरा कामयाब लोगों की जिंदगी को देखें, तो समझ में आ जाएगा कि उन्होंने सारी विपदाओं का मुकाबला करने के लिए खुद को तैयार किया। 

मुसीबतों का सामना करने की उनकी हिम्मत नहीं थी, फिर भी उन्होंने आगे बढ़ने का हौसला जुटाया। अवसर ही हमें सिखाते हैं कि कब कदम आगे बढ़ाना है, कब पीछे करना है। कब कदमों को थाम लेना है। अब इसी से हम गरबे के दर्शन को समझने की कोशिश करें। 

गरबा खेलने वाले यह अच्छी तरह से जानते हैं कि कब कदम आगे बढ़ाना है, कब पीछे खींचना है। कब डांडिए को सामने वाले के डांडिए से टकराना है। कब थम जाना है। कब किसी के लिए खड़े होना है। अगर कोई इसे नहीं जानता, तो वह गरबा ही क्यों, कोई भी नृत्य नहीं कर सकता। 

लेकिन नगाड़ों की थाप के दौरान जो अपने कदमों को थिरकने से रोक दे, उसे क्या कहा जाए? अन्यायी? जी हां, उसे हम अन्यायी ही कहेंगे। मेरा विचार इससे एक कदम आगे जाकर ठहरता है, उसे अत्याचारी कहा जाएगा। जो अपनी इच्छाओं को मार डाले, अपनों के लिए जीने की जुगत में अपना सारा जीवन ही दांव पर लगा दे। 

सारी योग्यताएं होने के बाद भी उससे गाफिल रहे। चाहकर भी कुछ न कर पाए, उसे अत्याचारी ही कहेंगे न? जिसे भी संगीत की थोड़ी-सी भी समझ है, वह उसकी सुरलहरी में खो ही जाता है। गुजरात के बच्चे-बच्चे गरबा के लिए बजने वाले नगाड़ों की थाप की अनुगूंज से जुड़े होते हैं। 

इसकी थाप सुनते ही उनके पांव थिरकने लगते हैं। यह उन्हें विरासत में मिला है। इसलिए गरबा खेलते समय युवाओं ही नहीं, बल्कि बुजुर्गों और बच्चों में भी एक विशेष प्रकार का उत्साह देखने को मिलता है। कुछ ऐसी ही स्थितियां ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखने को मिलती हैं, जहां किसी समारोह में लोग गाजे-बाजे के साथ पूरी शिद्दत से नृत्य करने लगते हैं। 

वास्तव में इन्हीं नृत्यों में छिपा होता है जीवन का ककहरा। नृत्य के साथ जीवन जीने की कला को समझा जाए, तो जीवन आसान हो सकता है। आप उन कोरियोग्राफर्स पर ध्यान दें, उनके पास जीवन की समस्याओं का समाधान मिल जाएगा, क्योंकि उन्हें यह अच्छी तरह से पता होता है कि किस रिदम में किस पांव को उठाना है, हाथ को कब और कैसे लहराना है। कब पीछे हटना है, कब आगे बढ़ना है। नृत्य में इसे ही अनुशासन कहते हैं। 

वास्तव में यही जीवन का अनुशासन है। जीवन जीने की कला किसी किताब में नहीं, बल्कि चारों तरफ बिखरी पड़ी है। छोटे-छोटे ताल-मेल से जीवन संवरता है। फिर चाहे गरबा हो या कोई अन्य लोकनृत्य। जीवन को समझना है, तो उसमें डूबो, फिर देखो कि वह किस तरह से हमारे सामने एक नए रूप में आता है। यही है जीने का सूत्र और यही है जीवन जीने का सही तरीका।

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