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अंतरराष्ट्रीय राजनीति: बड़ी शक्तियों से परे भी एक दुनिया है..., फिलीपीन के बहाने पश्चिम को व्यापक संदेश
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विदेश मंत्री एस जयशंकर (फाइल)
- फोटो :
X/@DrSJaishankar
विस्तार
दक्षिण चीन सागर में फिलीपीन के क्षेत्रीय दावे पर चीन के आक्रामक रुख से भारत को अरुणाचल प्रदेश में अपनी संप्रभुता पर चीन के अतिक्रमण के खिलाफ पलटवार करने का अवसर मिला है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा द्वारा चीनी डेवलपर बाइटडांस की सोशल मीडिया सेवा 'टिकटॉक' पर प्रतिबंध को मंजूरी देने से निराश बीजिंग अचानक अपने राष्ट्रवादी रुख के प्रति संवेदनशील हो गया है और पड़ोस में अपने क्षेत्रीय दावों के प्रति कठोर रवैया अपना रहा है। अरुणाचल प्रदेश पर दावा जताने के तुरंत बाद चीन दक्षिण चीन सागर में स्थित स्प्रैटली द्वीप समूह में फिलीपीन की संप्रभुता को कमजोर करने के अपने मंसूबों को लेकर काफी आक्रोश में है।
चीन की इस नई आक्रामकता का भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खुला विरोध किया है, जो दक्षिण पूर्व एशिया के तीन देशों के दौरे पर थे। विगत 26 मार्च को मनीला की यात्रा के दौरान उन्होंने दक्षिण चीन सागर के द्वीपों पर फिलीपीन के दावों के बारे में उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता को बनाए रखने के प्रति भारत के समर्थन को दृढ़ता से दोहराया। उन्होंने कहा कि समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (यूएनसीएलओएस) को 'समुद्र का संविधान' माना गया है और सभी देशों से आग्रह किया गया है कि वे इसका 'अक्षरशः एवं भावों में' पूरी तरह से पालन करें।
दक्षिण चीन सागर की स्थिति पर करीब से नजर डालते हुए अमेरिकी उप रक्षा मंत्री ने मई, 2015 में सीनेट की बैठक में पुष्टि की कि वियतनाम ने 48 चौकियां स्थापित की हैं, फिलीपीन ने आठ, मलयेशिया ने पांच और ताइवान ने स्प्रैटली द्वीप समूह में एक चौकी स्थापित की है। छोटे पैमाने पर, वियतनाम और फिलीपीन ने दशकों तक द्वीप निर्माण जारी रखा। चीन बदलती जमीनी हकीकत के प्रति देर से जागा, लेकिन उसने अभूतपूर्व पैमाने पर द्वीप निर्माण शुरू किया। वर्ष 2014 से 2016 के बीच चीन ने पूरे इतिहास में अन्य सभी देशों द्वारा निर्मित द्वीपों की तुलना में सबसे ज्यादा नए द्वीपों का निर्माण किया और अपने सैन्य उपकरण भी तैनात किए। विशेषज्ञों ने दक्षिण चीन सागर में चीनी कार्रवाई को 'धीरे-धीरे नष्ट करने' की रणनीति बताया है।
दक्षिण चीन सागर में और अधिक गिरावट से बचने के लिए जुलाई 2016 में यूएनसीएलओएस के तहत गठित मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों के खिलाफ फैसला सुनाया। हालांकि चीन और ताइवान, दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे न्यायाधिकरण को नहीं मानते हैं और इस मामले को अन्य दावेदारों के साथ द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए। जनवरी, 2022 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने दक्षिण चीन सागर में चीनी दावे को 'गैर-कानूनी' बताया।
दक्षिण चीन सागर वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि सालाना 33.7 खरब डॉलर मूल्य का व्यापारिक सामान इससे होकर गुजरता है। चीन के लिए इस क्षेत्र के महत्व को कोई भी समझ सकता है, क्योंकि उसकी 80 प्रतिशत ऊर्जा और देश के कुल व्यापार का अनुमानित 39.5 प्रतिशत दक्षिण चीन सागर से होकर ही गुजरता है। यह क्षेत्र तेल और प्राकृतिक गैस भंडार से समृद्ध है। चीनी भूवैज्ञानिक संसाधन और खनन मंत्रालय के अनुसार, दक्षिण चीन सागर में 17.7 अरब बैरल कच्चा तेल हो सकता है, जो तेल समृद्ध कुवैत के 13 अरब बैरल के भंडार से बड़ा है। ऐसे उच्च महत्व वाले क्षेत्र में चीन के आक्रामक व्यवहार द्वारा अन्य देशों की जल संप्रभुता के उल्लंघन और द्वीपों पर क्षेत्रीय दावे का न सिर्फ भारत ने विरोध किया है, बल्कि फिलीपीन, वियतनाम और इंडोनेशिया सहित कई अन्य एशियाई देशों ने भी विरोध किया है।
कई एशियाई देशों की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने वाली चीनी कार्रवाइयों के प्रति भारत की सीधी टक्कर ने हिंद-प्रशांत दृष्टिकोण के प्रति इसकी रणनीति में एक नए मोड़ का संकेत दिया है। नई दिल्ली तेजी से हिंद-प्रशांत के विशाल भौगोलिक क्षेत्रों में 'समान विचारधारा वाले देशों' द्वारा 'नियम-आधारित व्यवस्था' के जरिये चीन पर नियंत्रण करने के विचारों से सहमत होती दिख रही है। कहा जा सकता है कि बीजिंग के आक्रामक एकपक्षवाद को रोकने के लिए भारत हिंद-प्रशांत स्तर पर 'सहकारी बहुपक्षवाद' को कायम कर रहा है।
क्षेत्रीय सहयोग में 'आसियान केंद्रीयता' का समर्थन करके भारत ने इस क्षेत्र में न सिर्फ आर्थिक, बल्कि रणनीतिक संबंध बनाने के लिए अपनी 'एक्ट ईस्ट' नीति को पुनर्जीवित किया है। नई दिल्ली आसियान सदस्यों को एक ऐसे संभावित समूह के रूप में देखती है, जो सामूहिक रूप से बीजिंग पर 'नियम आधारित उदार व्यवस्था' का पालन करने के लिए दबाव डाल सकते हैं, जो चीन के क्षेत्रीय अलगाव का कारण बन सकता है।
अपनी बदली हुई मानसिकता के तहत भारत ने फिलीपीन के साथ रणनीतिक रूप से खुद को जोड़ा है। भारत ने फिलीपीन को परमाणु-सक्षम सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलें बेचने का फैसला किया, जो भारत-रूस सहयोग का एक उत्पाद है। भारत ने वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ अपनी रणनीतिक निकटता को भी प्राथमिकता दी है। लगता है कि भारत ने बीजिंग का प्रतिकार करने के लिए 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' के ढांचे में 'उभरती शक्ति कूटनीति' को व्यक्त किया है।
भारत की 'उभरती शक्ति कूटनीति' हिंद-प्रशांत ढांचे के तहत परिकल्पित वैश्विक रणनीतिक दृष्टि से बेहतर ढंग से मेल खाती है। इस क्षेत्र में कई उभरती हुई शक्तियां हैं, जो हिंद-प्रशांत समूह के भीतर एक छोटा समूह बनाने में सक्षम हैं, और चीन को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर सकती हैं। एशिया की उभरती शक्तियों में लगातार बढ़ते चीन-अमेरिका विवाद को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता है।
फिलीपीन की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त करके भारत इस क्षेत्र की अन्य शक्तियों को बता रहा है कि महान शक्तियों और उनकी कटु प्रतिद्वंद्विता से परे भी एक दुनिया है। दक्षिण चीन सागर में चीन के आक्रामक रुख को उभरती शक्तियों के समूह द्वारा दबाव बनाकर शांतिपूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है। फिलीपीन पर अपना स्टैंड लेने से भारत को चीन और अमेरिका के बीच कड़वाहट कम करने की एक नई भूमिका मिली है।