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नजरिया: गांधी, ग्राम स्वराज और भारतीय संविधान बनाम आधुनिक भारत का नेहरू दृष्टिकोण

Wed, 02 Oct 2024 07:31 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Wed, 02 Oct 2024 07:31 AM IST
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सार
गांधीजी चाहते थे कि भारतीय संविधान की मूल इकाई गांव हों, व्यक्ति नहीं। पर उनके शिष्य और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू का नजरिया गांवों को लेकर कुछ दूसरा ही था।
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Perspective: Gandhi, Gram Swaraj and the Indian Constitution versus Nehru's view of modern India
सांकेतिक तस्वीर।

विस्तार

हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक कहावत प्रचलित है कि पहाड़ का पानी और जवानी उसके ही काम नहीं आती। कम से कम जवानी के संदर्भ में यह कहावत देश के ज्यादातर गांवों पर लागू होती है। उत्तर भारत के दिवाली, दशहरा और छठ, जैसे त्योहारों को छोड़ दीजिए, तो गांव वीरान नजर आते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार गांवों में, जहां 68.84 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती थी, वहीं 2022 का अनुमान है कि यह घटकर 56.9 प्रतिशत हो गई है। हालांकि वास्तविकता कुछ और ही है। इसे खेत और जमीन पर मालिकाना हक का दबाव कहें या लालच, इसकी वजह से जनगणना के रिकॉर्ड में शहरी निवासियों का बड़ा वर्ग अब भी गांवों में ही रहता है।



गांधी जयंती के मौके पर इन आंकड़ों और ग्रामीण जीवन एवं व्यवस्था में आ रहे बदलावों की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। गांधी स्वाधीन भारत को गांवों का ही देश बनाए रखने के हिमायती थे। उनके तमाम सपनों को जिस तरह देश ने भुला दिया, उनके ग्राम स्वराज और संस्कृति के सपनों को भी हमने खारिज कर दिया है। सवाल यह उठ सकता है कि क्या विकास की मौजूदा अवधारणा ने देश की ग्रामीण संस्कृति को चोट पहुंचाई है? इस प्रश्न की मीमांसा से पहले हमें ग्रामीण जीवन में आ रहे बदलावों और उनकी समस्याओं की ओर देखना होगा। आज भारत का हर शहर जनसंख्या के भारी दबाव से जूझ रहा है। शहरों को गौर से देखिए तो लगता है, जैसे किसी गुफा में लंबे समय से बंद मनुष्य मौका मिलते ही सबको पीछे छोड़ने की दौड़ में समाहित है। शहरी जीवन में आपाधापी, प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, उफनते सीवर, पानी की कमी जैसी समस्याएं रोजाना की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। बिजली गांवों की तुलना में ज्यादा जरूर है, लेकिन दड़बेनुमा मकानों में रहना यहां की बड़ी उपलब्धि बन चुकी है।


राष्ट्रवादी विचारक गोविंदाचार्य दिल्ली जैसे शहर में रह रहे लोगों के लिए कहते हैं कि यहां की सत्तर फीसदी आबादी या तो झुग्गियों में रहती है या ऐसे ही हालात में रहने को मजबूर है। इसकी तुलना में गांवों को देखिए। पंचायती राज अधिनियम के बाद वहां पैसे तो जा रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में जमीनी बदलाव नहीं दिख रहा है। पंचायती राज का भ्रष्टाचार इसका एक बड़ा कारण है। आज भी नीति निर्माण में शहरी इलाके प्राथमिकता पर हैं, ग्रामीण इलाकों का नंबर उसके बाद आता है। जानकार मानते हैं कि गांवों को शहरों की तुलना में पिछड़ा और प्राथमिकता सूची में दूसरे स्थान पर रखने वाली व्यवस्था की सोच को विकसित करने के पीछे हमारी सांविधानिक व्यवस्था है।

गांधीजी चाहते थे कि भारतीय संविधान की मूल इकाई गांव हों, व्यक्ति नहीं। उनकी यह सोच 10 सितंबर, 1931 को यंग इंडिया में लिखे उनके एक लेख में भी जाहिर होती है। गांधी ने लिखा है, ‘मैं ऐसे संविधान की रचना कराने का प्रयास करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलंबन से मुक्त कर दे। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब भी यह महसूस करे कि यह उसका देश है, जिसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है।’

लेकिन उनके ही शिष्य और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू का नजरिया गांवों को लेकर कुछ दूसरा ही था। राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक मोहनदास में नेहरू के 1946 के एक वक्तव्य का हवाला दिया है। जिसके अनुसार, गांवों को संविधान की मूल इकाई बनाने के गांधी के विचार की खिल्ली उड़ाते हुए नेहरू ने एक चिट्ठी ही उन्हें लिख भेजी थी। नेहरू ने लिखा था, ‘जिसे सामान्य तौर पर गांव कहा जाता है, वह सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से पिछड़ा है। और पिछड़े माहौल में कोई प्रगति नहीं हो सकती।’ जिसका एक तरह से जवाब देते हुए आजादी के ठीक पहले एक जुलाई, 1947 के यंग इंडिया के अंक में गांधी ने लिखा, ‘आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर एक गांव में पंचायत का राज होगा। उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी। हर एक गांव को अपने पैरों पर खड़ा होना होगा। यहां तक कि वह सारी दुनिया से अपनी रक्षा खुद कर सके।’ पर गांधी की इस सोच को संविधान की प्रारूप समिति के कुछ अन्य सदस्यों ने भी स्वीकार नहीं किया।

नतीजा यह हुआ कि गांधी के सपनों के मुताबिक भारत का गांव अपने उस संविधान की पवित्र पुस्तक में शामिल नहीं किया जा सका, जिसकी हम हर अंधेरे वक्त में दुहाई देते नहीं थकते। संविधान को जब नवंबर, 1949 में मंजूरी मिल रही थी, तब संविधान सभा में महावीर त्यागी जैसे कुछ सदस्यों ने यह सवाल भी पूछ लिया था कि संविधान में गांधी कहां हैं? लेकिन इस सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया। चाहे नेहरू हों या अन्य कोई, भारतीय गांवों की अहमियत को भूल गए। भारतीय गांव क्या थे, उनकी ताकत और उपलब्धि क्या थी, इसे जवाहर लाल के एक दौर में करीबी रहे जयप्रकाश नारायण ने सही तरीके से व्याख्यायित किया है। अपने लेख 'भारतीय राज व्यवस्था का पुनर्निर्माण' में जेपी ने प्राचीन काल से चली आ रही ग्राम व्यवस्था को लेकर बहुत उम्मीद जताई है जेपी ने लिखा है, ‘भारत शायद लोकतंत्र की सबसे प्राचीन भूमि रहा है और उसके कुछ गणतंत्र हजार-हजार साल तक जीवित रहे हैं। ग्राम समुदायों का लोकतंत्र इतना सुदृढ़ और सक्षम था कि वह ब्रिटिश काल तक जारी रहा।’

सच तो यह भी है कि राजनीति के साथ आई कई कमियों के बावजूद आज भी गांव इन्सानियत के सबसे बड़े रखवाले हैं। गांव मनुष्य को जगह और खुलापन देने के मामले में भी आगे हैं। इन्सान की मशीनी जिंदगी और इससे उपजी पराधीनता की तुलना में गांवों में स्वाधीनता कहीं ज्यादा है। अवसाद भी वहां कम है। रिश्तों को निभाने का जज्बा अब भी ग्रामीण समाज में कहीं ज्यादा है। आर्थिक संसाधन खत्म होने के बाद शहरी इन्सान को लगता है कि उसकी जिंदगी के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं, ऐसी सोच के बाद वह आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे हालात में भी गांव इन्सान को यह बताता है कि उसके लिए राहें अब भी खुल सकती हैं। बेशक वे ऐश्वर्य न दे पाएं, लेकिन पेट की भूख शांत करने में सहायक जरूर होंगे। गांधी जयंती पर गांवों को इस तरह से याद करते हुए क्या हम अपनी सांविधानिक गलतियों को दूर करने की कोशिश कर सकते हैं? प्रबुद्ध और नियंता समाज को इस दिशा में सोचना होगा।

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