पानी के लिए तरसते लोग
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तालाब के किनारे मवेशियों की भीड़ है। उनकी तरफ इशारा करते हुए तोलेसर गांव के मांगीलाल राव कहते हैं, 'कुछ ही हफ्ते में ये सब मर जाएंगे। आप देख रही हैं कि तालाब में कितना थोड़ा पानी रह गया है। हम अपने लिए तो टैंकरों से खरीद कर व्यवस्था कर लेंगे, लेकिन इनके लिए पानी कहां से लाएंगे? एक महीने के अंदर यह तालाब पूरी तरह सूख जाएगा।’ यह गांव राजस्थान के बाड़मेर जिले में है और मैं यहां जल भागीरथी फाउंडेशन (जेबीएफ) के एक अधिकारी के साथ आई हूं, जो मुझे बताते हैं कि किस तरह इस संस्था ने तालाब की गहराई और चौड़ाई बढ़ाने में गांव की सहायता की है। लेकिन तालाब का पानी बरसात पर निर्भर है। इस वर्ष बरसात न होने के बराबर हुई है। गांव में अकाल की स्थिति बन रही है, लेकिन अकाल घोषित नहीं हुआ है। ऊपर से समस्या यह है कि राजस्थान में विधानसभा चुनाव की घोषणा किसी भी समय हो सकती है। अकाल राहत के लिए किसी के पास समय नहीं होगा।
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बात एक गांव की होती, तो समस्या का समाधान आसान होता। अनुमान लगाया जाता है कि इस क्षेत्र में सैकड़ों गांवों का यही हाल है। पिछले सप्ताह मैंने बाड़मेर-जैसलमेर के अंदरूनी ग्रामीण क्षेत्र के दौरे पर पाया कि अकाल का साया मंडराने लग गया है। तोलेसर हाइवे से थोड़ी ही दूरी पर है, सो वहां तक राहत पहुंचाना कठिन नहीं होगा, लेकिन जिस अगले गांव में मैं रुकी, वहां तक दो-तीन घंटों के सफर, टूटी सड़कों पर धीरे-धीरे चलने के बाद पहुंची। गांव का नाम तेलीवाड़ा है, जिला जैसलमेर। मुसलमानों का गांव है।
कड़ी धूप में गांव के कुछ बुजुर्ग विशाल तालाब के किनारे एक पेड़ की छांव में पुरानी दरी पर बैठकर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके सामने पानी की दो बोतलें पड़ी हुई थीं, जिसमें पानी का रंग लाल था। ‘क्या आप यह पानी पिएंगे,’ मैंने आश्चर्य से पूछा। ‘जी हम इसी तालाब का पानी पीते हैं और यह ऐसा ही होता है। हमारे पास और कोई चारा नहीं है।’ एक बुजुर्ग ने मुस्करा कर कहा।
बैठे हुए बाकी लोगों ने भी एक स्वर में कहा कि उनकी समस्या अच्छे या गंदे पेयजल की नहीं है, उनकी समस्या अधिक गंभीर है। इस तालाब में अब सिर्फ तीन महीने का पानी रह गया है, क्योंकि इस बरस बरसात दो-तीन दिन ही हुई। हमारी फसलें सूख गई हैं और खेती के अलावा हमारे पास पेट भरने का कोई साधन नहीं है। अकाल अभी तक घोषित नहीं हुआ है, सो राहत कहां से आएगी।
अगला गांव रंजितपुरा राजपूत बहुल था। वहां भी यही बातें सुनने को मिलीं। कड़ी धूप में छोटी बच्चियां एक छोटे तालाब से प्लास्टिक के बर्तनों में पानी सिर पर ले जाती हुई दिखीं। इस क्षेत्र में पानी की समस्या दशकों से है, जिसका समाधान राजस्थान सरकार ने पाइपलाइन द्वारा हिमाचल से पानी लाना ढूंढा है। जिस सड़क से हम इन गांवों तक पहुंचे, उसके दोनों तरफ पाइपलाइन बिछाए जाने के आसार दिखे। मोटी पाइप के टुकड़े, खुदे हुए गड्ढे और जल विभाग के अधिकारियों के दफ्तर और मकान।
कहने का मतलब यह है कि इस क्षेत्र की सबसे गंभीर समस्या का समाधान करने की सारी व्यवस्था हो गई है। समस्या अब यह है कि पानी की एक बूंद भी यहां के प्यासे लोगों तक पहुंची नहीं है। कौन कहता है कि जल ही जीवन है? राजस्थान के मारवाड वासियों ने साबित कर दिया है कि जल बिना भी जीवन है। वापसी में जेबीएफ के तरुण गोयल ने मुझे याद दिलाया कि शहरों में हम आपको 80 फीसदी सब्सिडी मिलती है। गांव में कहने को पानी मुफ्त है। लेकिन वह मिले तो।