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काबुल में शांति दूर की कौड़ी

Fri, 27 Oct 2017 08:42 AM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Fri, 27 Oct 2017 08:42 AM IST
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Peace in Kabul
मरिआना बाबर
अमेरिकी विदेश मंत्री के काबुल, इस्लामाबाद और नई दिल्ली दौरे के कारण अफगानिस्तान फिर से सुर्ख‌ियों में है। अफगानिस्तान को पिछले कई दशकों से नजदीक से देखने के कारण मैं यह कह सकती हूं कि निकट भविष्य में वहां स्थ‌िरता की कोई गुंजाइश नहीं है। अफगानिस्तान की अस्थ‌िरता का पूरे क्षेत्र पर असर पड़ेगा। अपने रणनीतिक हितों के साथ जो क्षेत्रीय खिलाड़ी अफगानिस्तान में पसरे हुए हैं, वे ज्यादा भ्रम और जटिलताएं पैदा कर रहे हैं। सोवियत संघ, पाकिस्तान,  ईरान और अमेरिका पहले अफगानिस्तान में बड़े खिलाड़ी थे। आज नाटो, यूरोपीय संघ के सदस्य, चीन, रूस और भारत वहां सक्रिय हैं। इनमें से हरेक के वहां निहि त स्वार्थ हैं। दूसरी ओर, वहां अफगान तालिबान, उनसे टूटे आतंकी संगठन, आईएस और अल कायदा की भी वहां मौजूदगी है।

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कुछ समय पहले तक अफगान तालिबान का असर वहां सबसे अधिक था, आज भी अफगानिस्तान के चालीस फीसदी इलाके पर उसका कब्जा है। वे धूर्त और ताकतवर हैं तथा उनकी राजनीतिक क्षमता मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ गनी से अधिक है। यह कोई रहस्य नहीं है कि अफगान तालिबान दुनिया भर में अलग-अलग खुफिया एजेंसियों के संपर्क में हैं। अफगान तालिबान पाकिस्तान के अलावा गनी सरकार, चीन, रूस समेत यूरोप की कई सरकारों के संपर्क में हैं। कतर में उनका एक राजनीतिक दफ्तर भी है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बंद करने की कोशिश कर रहे हैं। तालिबान के प्रवक्ता बहुत पहले जता चुके हैं कि उनके संगठन के प्रमुख का नाम संयुक्त राष्ट्र की काली सूची से हटाने और अफगानिस्तान से तमाम विदेशी सैनिकों को बाहर करने की शर्त पर ही वे अमेरिका से शांति वार्ता के लिए राजी होंगे।

अफगान तालिबान की बढ़ती ताकत का राज क्या है? इतने सारे देश उनके साथ बातचीत करने के लिए तैयार भी आखिर क्यों हैं? पा‌क विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन से इस हफ्ते बात करते हुए कहा, 'अमेरिका को अफगानिस्तान में अपनी स्थ‌िति का भी आकलन करना चाहिए। पिछले दस-बारह साल में अमेरिका अगर अफगानिस्तान में पैंतालीस फीसदी भू-भाग पर नियंत्रण खो चुका है, तो उसकी क्या वजह है?'

पाकिस्तान अपने यहां से हक्कानी नेटवर्क समेत अफगान तालिबान के बड़े हिस्से को खदेड़ चुका है। अब पाकिस्तान में इनसे जुड़े कम ही लोग बचे हैं। लेकिन अफगान तालिबान के सभी आतंकियों को पाकिस्तान से खदेड़ देने के बाद भी अफगानिस्तान में शांति और समृद्ध‌ि की कोई गारंटी नहीं है। दरअसल अफगानिस्तान के अंदर इतनी समस्याएं हैं कि उन सबके समाधान के बाद ही वहां स्थायी शांति की उम्मीद की जा सकती है। भ्रष्टाचार,  कबीलों में बंटे समाज, नशे का व्यापार और सरकार के अंदर एकता की कमी-इन सबके लिए कोई बाहरी मुल्क जिम्मेदार नहीं है। ख्वाजा आसिफ ने टिलरसन से पूछा भी कि अमेरिका और दूसरी अंतरराष्ट्रीय ताकतें अफगानिस्तान की समस्याओं का समाधान खोज पाने में अब तक कामयाब क्यों नहीं हुईं।

अफगानिस्तान को हथियारों की आपूर्ति कौन कर रहा है? अफगानिस्तान में लंबे समय से जारी युद्ध का हथियार लॉबी को बहुत लाभ मिला है, जो अफगान सरकार, अमेरिकी व नाटो सैनिकों तथा अफगान तालिबान को हथियार मुहैया करा रही है। यह लॉबी चाहती है कि अफगानिस्तान में युद्ध की यह स्थ‌ि‌ति बरकरार रहे, ताकि वह और अमीर हो सके। एक बड़ा सवाल यह है कि अमेरिकी और नाटो सैनिक अफगानिस्तान में अफीम की खेती अब तक बंद क्यों नहीं कर पाए हैं। पूर्व अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि अमेरिका के आईएस से रिश्ते हैं, और इस आतंकवादी संगठन को हथियारों की आपूर्त‌ि अमे‌रिका ही करता है। उनका कहना है, 'अमेरिका के सैनिक हेलिकॉप्टर आईएस को मदद देते हैं। मैं आईएस और अमेरिका में कोई फर्क नहीं कर पाता।'

अफगानिस्तान में भारत की भूमिका पर भी पाकिस्तान को आपत्ति है। वह भारत पर उस पाक तालिबान की मदद करने का आरोप लगाता है, जो पाकिस्तान में हमले करते हैं। अफगानिस्तान की अशरफ गनी सरकार, अमेरिका और नाटो सैनिक पाक तालिबान को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया कराते हैं। अफगान तालिबान के लिए सिर्फ एक ही देश है, जो निरपेक्ष और संजीदा है। वह देश है चीन। बीजिंग एक स्थ‌िर और समृद्ध अफगानिस्तान चाहता है, ताकि वहां शुरू की गई उसकी एकाधिक परियोजनाओं का उसे लाभ मिल सके और जिससे वह अफगानिस्तान के भीतर से मध्य एशियाई गणतंत्रों को जोड़ने वाली सड़क बना सके। चीन के लिए अफगानिस्तान में व्यापार ही सबसे बड़ा आकर्षण है।

हर कोई अफगानिस्तान में शांति और स्थ‌िरता तो चाहता है, लेकिन यह बात स्पष्ट है कि हर देश इस युद्धजर्जर देश में अपना प्रभाव फैलाते हुए रणनीतिक नियंत्रण हासिल करना चाहता है। इस समय तो अफगान तालिबान और वहां के कई पूर्व कबीलाई प्रमुख विजेता बनकर उभरे हैं, जिनमें से कई अशरफ गनी की सरकार का हिस्सा भी बन चुके हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री टिलरसन ने काबुल में जो टिप्पण‌ियां कीं, वे आश्चर्यजनक थीं, लेकिन उन पर किसी का ध्यान नहीं गया। उन्होंने कहा, 'हम मानते हैं कि तालिबान में कुछ उदारवादी आवाजें भी हैं, ये ऐसी आवाजें हैं, जो अब युद्ध नहीं चाहतीं। वे लोग नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी इस लड़ाई के हिस्सेदार बनें। इसलिए हम ऐसी ताकतों से जुड़ रहे हैं। अगर वे खून-खराबा बंद कर एक समृद्ध अफगानिस्तान की कामना करते हैं, तो सरकार में उनके लिए जगह है।' 

यह कैसे संभव है कि अमेरिका एक तरफ तो तालिबान से लड़ने के लिए फौज तैनात करे और दूसरी तरफ यह भी कहे कि सरकार में उनका स्वागत है? क्या अफगानिस्तान की जनता तालिबान को सरकार में देखना चाहती है? मुश्किल यह है कि अफगानिस्तान में शांति के लिए सक्रिय कोई भी देश अफगान जनता की राय जानना जरूरी नहीं समझता।

-पा‌किस्तान की वरिष्ठ पत्रकार
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