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इन चुनावी मसीहाओं से क्या मिलेगा?
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sun, 22 Sep 2013 03:25 AM IST
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पिछले हफ्ते एक प्रमुख टेलीविजन चैनल ने अपनी शाम का अच्छा-खासा वक्त एक बहस 'मध्य वर्ग के मसीहा नरेंद्र मोदी बनाम गरीबों के मुक्तिदाता राहुल गांधी' पर खर्च कर दिया। यह बहस भी अपने यहां की ज्यादातर टेलीविजन बहसों जैसी ही थी।
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भाजपा और कांग्रेस के जाने-पहचाने चेहरे जुबानी जंग कर रहे थे। इस शब्दयुद्ध के खत्म होने पर यह दर्शक और शायद कई अन्य दर्शक भी मध्य वर्ग या गरीबों के बचाव मिशन के बारे में कुछ नहीं समझ सके।
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हालांकि एक चीज बिलकुल स्पष्ट है, अब से लेकर 2014 तक हम मसीहाओं और मुक्तिदाताओं के बारे में काफी कुछ सुनेंगे। लेकिन इससे किसी को कोई मतलब नहीं है कि आखिर इन लोगों के पास ऐसी कौन-सी जादुई शक्ति है, जिससे ये सारी समस्याओं का हल निकाल लेंगे? पौराणिक कथाओं, सिनेमा और काल्पनिक कहानियों में तो ऐसा हो सकता है, लेकिन वास्तविक जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं होता।
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वैसे तमाम तकलीफों से निजात दिलाने वाले किसी मसीहा पर भरोसा करना भारतीय राजनीति के लिए नया नहीं है। खुद को देवताओं जैसी अद्भुत शक्ति वाला साबित करने के लिए हमारे देश के राजनेता हर तरीका अपनाते हैं, रही बात आम लोगों की तो वह भी अंधभक्ति में खुद को धकेलना पसंद करता है।
1987 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन के निधन के बाद उनके दर्जनों भक्तों ने दुख से आत्महत्या कर ली। तमिलनाडु की मौजूदा मुख्यमंत्री जे. जयललिता के एक प्रशंसक के पास खून से बना उनका एक पोट्रेट है। उत्तर प्रदेश में मायावती के समर्थक उन्हें देवी जैसा पूजते हैं।
कुछ किताबों और प्रदर्शनियों में भी बसपा सुप्रीमो को देवी जैसा महिमामंडित किया गया है। पिछले साल एक स्थानीय अखबार में दिए गए भाजपा के एक विज्ञापन में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भगवान कृष्ण के रूप में दिखाया गया, जो अपने सभी दुश्मनों का संहार करने के लिए तैयार हैं।
कांग्रेस में, सोनिया गांधी का स्थान एक देवी मां जैसा है। वैसे राहुल गांधी के भक्त उनके लिए अभी कोई पौराणिक चरित्र नहीं खोज पाए हैं, जो उनसे मिलता-जुलता हो, पर अपने यहां कुछ भी संभव है।
सवाल यह है कि भक्ति की यह सनक, जो अब तक एक सुरक्षित हथियार रही है, क्या अब भी लोगों पर कारगर साबित होगी? अगले साल लोकसभा चुनाव को देखते हुए मेरा मानना है कि ऐसा नहीं होगा। आर्थिक मोर्चे पर भारत की दिक्कत न तो बिलकुल अलग तरह की है और न विशेष तरह की।
सभी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं इसी तरह की समस्या से जूझ रही हैं। इसके अलावा हमारे पास अनेक तरह के सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे हैं। दिल्ली से चंद घंटों के सफर वाली एक जगह पर एक युवा जोड़े की केवल इसलिए हत्या कर दी जाती है, क्योंकि उन्होंने अपने परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी कर ली थी।
खुद को सभ्य कहने वाला कोई भी देश ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होने दे सकता। इस नाजुक वक्त में भारत को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो लोगों के आत्मविश्वास को बढ़ा सके। क्या हमें ऐसी व्यक्ति पूजा की जरूरत है, जिसकी आलोचना बर्दाश्त न की जा सके?
लोगों के प्रतिनिधि को देवताओं का दर्जा देने का मतलब है कि हम खुद को ऐसी भूमिका में ले आएं, जो हमेशा ही उनका पक्ष लेगा। यह लोगों को शक्ति देने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। खुद को मसीहा की उपाधि दिए जाने के इच्छुक नेताओं को सवालों, संदेहों और आलोचनाओं से परे नहीं होना चाहिए।
यह सब उत्तर प्रदेश में क्यों प्रासंगिक है? तकरीबन 20 करोड़ आबादी वाला राज्य इस मामले में ब्राजील के बराबर है और यहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। इसलिए यह प्रदेश मसीहाओं के केंद्र में है। नरेंद्र मोदी अक्तूबर के पहले सप्ताह से लेकर नवंबर के मध्य तक उत्तर प्रदेश के कई प्रमुख क्षेत्रों में रैलियां करने जा रहे हैं।
राजनीतिक तौर पर देखें, तो उत्तर प्रदेश मुख्य रूप से सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और विपक्ष बहुजन समाज पार्टी के बीच बंटा हुआ है। यहां राष्ट्रीय दलों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, लेकिन दक्षिण और पूर्वी भारत में भाजपा की उपस्थिति नाममात्र होने के कारण अगली सरकार के गठन को लेकर मोदी की उम्मीदें उत्तर प्रदेश में अच्छे प्रदर्शन पर टिकी हैं।
गरीबों के लिए सपने लेकर राहुल गांधी भी सड़क पर उतरेंगे। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इस राज्य में लाखों गरीब हैं। स्थानीय मसीहा चुपचाप बैठे रहेंगे, ऐसी उम्मीद करना तो खुद को धोखा देने जैसा है। कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन यह वक्त है कि उत्तर प्रदेश के लोग यहां आने वाले मसीहाओं से मुश्किल सवालात करें।
आर्थिक मोर्चे के साथ-साथ सामाजिक सूचकांकों में भी यह राज्य काफी पिछड़ा हुआ है। 2009-2013 के बीच सबसे ज्यादा सांप्रदायिक दंगे इसी राज्य में हुए। मुजफ्फरनगर के दंगों के दंश को जल्दी नहीं भुलाया जा सकता। अब वक्त है कि उत्तर प्रदेश के लोग खुद को मुक्तिदाता बताने वालों से कुछ ज्यादा मांग करें।