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जरूरत इन्हें इनका हक देने की है
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sun, 10 Aug 2014 01:43 AM IST
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उत्तर प्रदेश एक बार फिर गलत वजहों से सुर्खियों में है। यहां की जनसंख्या तकरीबन 20 करोड़ है, जो ब्राजील की कुल जनसंख्या के बराबर है। पिछले कुछ महीनों से इस राज्य में हिंसा, आगजनी, बलात्कार और हत्याओं के तमाम मामले सामने आए। और अब सांप्रदायिक तनाव के मामले भी इसी कड़ी में जुड़ गए हैं। प्रदेश के ऐसे हालात पर काफी कुछ कहा जा रहा है। किसकी बात पर भरोसा करें, यह आप पर निर्भर है। यहां दो बाते हैं, जो निर्विवाद तौर पर मानी जा सकती हैं।
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कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि सांप्रदायिक हिंसा की वारदातें उन बारह सीटों पर ज्यादा हो रही हैं, जहां आने वाले समय में विधानसभा उपचुनाव होने हैं। और दूसरा, यह साफ हो चला है कि जिस तरह से देश के दो सबसे ज्यादा वंचित समुदायों यानी दलितों और मुस्लिमों के बीच संघर्ष बढ़ने लगा है, राज्य के भीतर ध्रुवीकरण में भी बढ़ोतरी हो रही है। पिछले काफी समय से राजनीतिक विश्लेषक आगामी चुनावों को देखते हुए राजनीतिक वजहों से तनाव को उकसाने के मद्देनजर चेतावनी देते रहे हैं। साथ ही इस तनाव के बारे में उनका यह भी कहना है कि इस पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो सकता है, और यह न केवल पूरे राज्य में, बल्कि राज्य की सीमाओं के बाहर भी फैल सकता है।
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उपचुनावों के नतीजे कुछ भी हों, मगर कुछ बातें याद रखनी होंगी। उत्तर प्रदेश के आकार और भारतीय राजनीति में इसके महत्व के बावजूद यह एक गरीब राज्य बना हुआ है। यह देश के उन राज्यों में शुमार किया जाता है, जो न केवल मानव विकास, बल्कि औद्योगिक विकास में भी काफी पिछड़े हुए हैं। उत्तर प्रदेश के ज्यादातर लोग 18 से 35 वर्ष के युवा हैं, जिन्हें शिक्षा, कौशल, अवसर और रोजगार के सिवा कुछ नहीं चाहिए। मगर इसके लिए प्रयास करने होंगे। सवाल यह है कि केंद्र और राज्य सरकार का फोकस किस बात पर होना चाहिए। शिक्षा एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो रोजगार से जुड़ी गतिशीलता के लिए जरूरी है। शिक्षा से विकल्प खुलते हैं।
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और भारत के युवा अपने जीवन और कार्यों में विकल्प चाहते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि उत्तर प्रदेश या देश में कहीं और वंचित समुदायों के बच्चों की स्थिति क्या है? यूनीसेफ की जनवरी, 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मुस्लिम और वंचित समूहों के बच्चों में पढ़ाई पूरी किए बगैर स्कूल छोड़ देने की प्रवृत्ति ज्यादा है। रिपोर्ट बताती है कि प्राथमिक स्कूलों में अनुसूचित जाति और जनजाति के बच्चों के बीच इसकी औसत दर क्रमशः 5.6 और 5.3 प्रतिशत है। जबकि इसकी राष्ट्रीय दर 3.6 प्रतिशत है। अनुसूचित जाति की लड़कियों में यह दर सर्वाधिक 6.1 प्रतिशत है।
ऐसी दूसरी कई रिपोर्टों में युवा दलित और मुस्लिमों की दिक्कतों का उल्लेख है। गौरतलब है कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत राज्य सरकार और संबद्ध स्थानीय अधिकारी की यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि स्कूल की कक्षा, मध्याह्न भोजन, खेल के मैदान, पीने का साफ पानी और शौचालय की सुविधा के संदर्भ में किसी भी बच्चे के साथ भेदभाव न हो। इसके बावजूद स्कूलों में बच्चों के साथ भेदभाव बदस्तूर जारी है। एक अंतरराष्ट्रीय गैरसरकारी संगठन, ह्यूमन राइट्स वाच (एचआरडब्ल्यू) की रिपोर्ट, 'दे से वी आर डर्टी- डिनाइंग एन एजुकेशन टू इंडियाज मार्जिनलाइज्ड', में भी आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली में दलितों, जनजातियों और मुस्लिमों के बच्चों के साथ स्कूलों में हो रहे भेदभाव का जिक्र है। उत्तर प्रदेश के एक चौदह वर्ष के दलित बच्चे ने एचआरडब्ल्यू रिपोर्ट के शोधकर्ताओं को बताया, 'महिला शिक्षक हमेशा हमें कक्षा के कोने में बिठाती थीं, और गुस्सा होने पर वह हम पर जोर से अपनी चाभियां फेंक देती थीं। सब बच्चों के भोजन करने के बाद अगर कुछ बचता था, तो हमें खाने को मिल जाता था। आखिर तंग आकर हमने स्कूल जाना ही बंद कर दिया।'
एचआरडब्ल्यू की इस रिपोर्ट में अबूसालेह शरीफ की 2012 की एक रिपोर्ट का भी जिक्र है, जिन्होंने 2004-05 से 2009-10 के बीच शिक्षा से जुड़े आंकड़ों पर शोध किया, और पाया कि पहली से दसवीं कक्षा के बीच पढ़ रहे मुस्लिम बच्चों में सबसे कम प्रगति देखने को मिली। शरीफ ने यह भी पाया कि अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों समेत शैक्षिक तौर पर पिछड़े बच्चों के लिए सर्वशिक्षा अभियान के तहत जो पैसा आवंटित होता है, वह ठीक ढंग से खर्च नहीं किया जाता। मतलब साफ है। उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा के स्तर पर अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। ऐसे में, यह राज्य विभाजनकारी राजनीति और सांप्रदायिक तनावों झेलने की स्थिति में नहीं है।
सामाजिक-आर्थिक पायदान पर सबसे नीचे खड़ा दलित और मुस्लिम वर्ग ही अगर आपस में लड़ता रहा, तो इसमें सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं दोनों का होगा। और फिर अगर उत्तर प्रदेश का युवा इन्हीं संकीर्ण लड़ाइयों में फंसा रहा, तो इससे नुकसान राज्य का ही नहीं, पूरे देश का होगा।