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बीमार व्यवस्था की नब्ज पर
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sun, 16 Feb 2014 01:01 AM IST
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बादलों की गड़गड़ाहट, चमकती हुई बिजली और मूसलाधार बारिश के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी की 49 दिन की सरकार को विदाई मिली। और इसके साथ ही एक बार फिर दिल्ली की गलियां राजनीतिक घटनाक्रमों का केंद्र बन गई हैं। बावजूद इसके कि वे सत्ता से दूर हो गए हैं, आने वाले हफ्तों में अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अखबार और टेलीविजन जगत की सुर्खियों में बने रहेंगे।
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जैसे-जैसे लोकसभा चुनावों की घड़ी नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे वोटों की जुगत में लगे दूसरे राजनीतिक दलों की तरह आम आदमी पार्टी के भी दिलो-दिमाग में रस्साकशी चलती रहेगी।
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इस राजनीतिक हलचल के बीच एक मुद्दा सरकारी अधिकारियों के असमय होने वाले स्थानांतरणों का भी है, जिस पर सार्थक बहस होनी चाहिए। वजह यह है कि यह सार्वजनिक संस्थानों को ईमानदारी, पारदर्शिता और कुशलता के साथ काम करने से रोकता है। इससे न केवल संबद्ध अधिकारी परेशान होता है, बल्कि आम आदमी को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
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ज्यादातर सिविल सेवक जानते हैं कि ऐसे फैसले अमूमन उनके राजनीतिक आकाओं की इच्छा से ही किए जाते हैं, और यही वजह है कि वह ज्यादा हाय-तौबा न करते हुए इनके आगे सिर झुका देते हैं। अपवाद के तौर पर जब कोई अधिकारी जनता के हित में, दूसरे शब्दों में कहें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होता है तो उसे निलंबन या स्थानांतरण का दंश झेलना पड़ता है।
अभी पिछले ही हफ्ते की बात है कि साफ-सुथरी छवि वाले 1978 बैच के आईएएस अधिकारी केशव देसीराजू को एकाएक केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव के पद से हटा कर उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय में भेज दिया गया। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस फैसले के ठीक एक दिन पहले भारत सरकार दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में अंतरराष्ट्रीय जगत के गणमान्य व्यक्तियों के सामने पोलियो को परास्त्ा करने की कहानी का गुणगान कर रही थी। देसीराजू ने इस सम्मेलन में शिरकत की थी। दरअसल देसीराजू वह अधिकारी हैं, जिन्होंने पोलियो के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सम्मेलन के ठीक एक दिन बाद उनके साथ ऐसे व्यवहार की आखिर वजह क्या थी? स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की मानें तो ऐसे स्थानांतरण रोजमर्रा की बात हंै, इसलिए इसे बेवजह तूल नहीं दिया जाना चाहिए।
वहीं सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रहे तमाम समूह स्वास्थ्य मंत्री की बात पर भरोसा नहीं करते। इनका कहना है कि ऐसे समय में जबकि यूपीए सरकार आम आदमी के स्वास्थ्य को लेकर चिंताएं दिखाने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दे रही है, एक योग्य अधिकारी को एकाएक स्वास्थ्य मंत्रालय से हटाया जाना, समझ से बाहर है। सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत 20 नेटवर्कों और 1000 से भी ज्यादा संगठनों के एक समूह 'जन स्वास्थ्य अभियान' की राष्ट्रीय समन्वय समिति से जुड़े अमित सेनगुप्ता कहते हैं, 'हमारे लिए यह केवल एक अधिकारी की बात नहीं है। दरअसल यह इस बात का एक और सबूत है कि निहित स्वार्थ किस तरह से अपने लिए रास्ता ढूंढ लेते हैं।'
बतौर स्वास्थ्य सचिव देसीराजू को काम संभाले हुए अभी 11 महीने ही हुए थे। ऐसे में, जिस तरह से उन्हें स्थानांतरित किया गया, उसे लेकर यह समूह सार्वजनिक तौर पर अपनी चिंताएं प्रकट कर चुका है। इस समूह की दलील है कि यह स्थानांतरण अक्टूबर 2013 को दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का साफ उल्लंघन है। इस फैसले में केंद्र और सभी राज्य सरकारों को साफ तौर पर हिदायत दी गई थी कि नौकरशाही को राजनीतिक दबावों से मुक्त कराने के लिए उन्हें तीन महीने के भीतर कदम उठाने होंगे।
इसके अलावा सर्वोच्च अदालत ने सिविल सेवकों के कार्यकाल को निश्चित करने की बात भी की थी। दरअसल देसीराजू के स्थानांतरण की एक वजह यह बताई जा रही है कि वह मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) में केतन देसाई की पुनर्नियुक्ति के सख्त खिलाफ थे। एमसीआई एक वैधानिक निकाय है, मेडिकल कॉलेजों को मान्यता देना इसका महत्वपूर्ण काम है। देश में मेडिकल शिक्षा के निजीकरण की बढ़ती हुई प्रवृत्तियों के चलते काउंसिल की शक्तियां और जिम्मेदारियां दोनों ही बढ़ी हैं।
आयकर विभाग और खोजबीन संस्थाओं की नजर में आने से पहले कई वर्षों से इस काउंसिल की बागडोर केतन देसाई के हाथों में ही रही है। फिलहाल देसाई जमानत पर हैं। मरीजों के अधिकारों को लेकर काम कर रहे एक समूह 'पीपुल फॉर बेटर ट्रीटमेंट (पीबीटी)' के अध्यक्ष कुणाल साहा के मुताबिक देसाई जैसों को एमसीआई में लौटने से रोकने की राह में बलि बनने वाला ताजा शिकार देसीराजू हैं।
स्वास्थ्य कार्यकर्ता बताते हैं कि किस तरह के हाल के वर्षों में अन्य मंत्रालयों की नीतियों की वजह से दवाओं की कीमत और दवाओं के पेटेंट से संबंधित जनहित के मुद्दों की अनदेखी हो रही है। बेशक, देसाई को अभी दोषी नहीं ठहराया गया है और मुद्दा केवल देसीराजू के स्थानांतरण का ही नहीं है, सवाल यह भी है कि देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के संदर्भ में इतने महत्वपूर्ण संगठन का नियंत्रण ऐसे हाथों में सौंपा जा सकता है, जिस पर तमाम आरोप लगे हुए हों। इसके अलावा क्या वाणिज्यिक फायदों को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्राथमिकता देना उचित होगा? इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य मंत्रालय को देना ही होगा।