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इन लड़कियों का गुनाह क्या है?

Sat, 05 Oct 2013 07:57 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार
पत्रलेखा चटर्जी/वरिष्ठ पत्रकार Updated Sat, 05 Oct 2013 07:57 PM IST
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patralekha chatterjee

भारत के मध्यम वर्ग के चहेतों की सूची काफी लंबी है। दुनिया के बारे में इसके विचार देश के प्रमुख समाचार पत्रों के कॉलम में, टीवी पैनल की चर्चा में और सोशल मीडिया पर प्रमुखता से छाए रहते हैं। वैश्विक नेताओं के लिए पिछले दो दशकों के दौरान बुलंद भारत की कहानी में यह सबसे अहम किरदार रहा है। इसकी पसंद और नापसंद को वैश्विक ब्रांड काफी अहमियत देते हैं।

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आने वाले महीनों के दौरान राजनीतिक विश्लेषक अपना काफी वक्त मध्यम वर्ग के वोट की चर्चा में बिताएंगे, लेकिन इस खुशगवार पक्ष का एक असहज पहलू पिछले सप्ताह सामने आया। संभ्रांत इलाके के रूप में मशहूर दक्षिण दिल्ली में रहने वाली एक बहुराष्ट्रीय कंपनी की एक कम्युनिकेशंस डायरेक्टर ने अपनी किशोर नौकरानी को बुरी तरह प्रताड़ित किया। यह खबर सामने आई तो हर कोई स्तब्ध रह गया। जब शक्तिवाहिनी नामक एक स्वयंसेवी संस्था के सदस्यों ने उस लड़की को वहां से छुड़ाया तो वह विकृत अवस्था में थी। उसकी त्वचा छिली हुई थी। शरीर और सिर पर चोट के निशान थे। यह झारखंड की रहने वाली एक आदिवासी लड़की थी।
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इस घटना ने शहरी भारत के कुछ सबसे ज्यादा परेशान करने वाले सवालों की तरफ लोगों का ध्यान एक बार फिर आकृष्ट किया है। आखिर यह वर्ग क्यों घरेलू नौकरों को उनका मूलभूत हक देने के लिए तैयार नहीं है? शिक्षित, सम्पन्न और वैश्विक जुड़ाव वाला यह वर्ग आखिर क्यों सामंती मानसिकता से बाहर नहीं निकल पा रहा है? और अब क्या किया जा सकता है?
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भारत उन चंद देशों में शामिल है, जहां घरेलू नौकरों के संरक्षण के लिए कोई राष्ट्रीय कानून नहीं है। कोई भी यह नहीं बता सकता कि देश में कितने घरेलू नौकर होंगे। ये घरेलू नौकर देश के भारी-भरकम असंगठित क्षेत्र का हिस्सा हैं, जो देश के कुल कार्यबल में सबसे ज्यादा हैं। इनमें सबसे ज्यादा संख्या उन महिलाओं की है, जो देश के सबसे पिछड़े राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से आती हैं। इन्हें निजी प्लेसमेंट एजेंसियों के स्वयंभू एजेंटों के जरिये नौकरियां मिलती हैं। इन लड़कियों में कई तो अवस्यक भी होती हैं। ऐसी कई एजेंसियां बेहद शातिर तरीके से गरीब परिवार की लड़कियों को झूठे आश्वासन देकर यहां ले आती हैं। अपने परिवार, समुदाय से दूर और पूरी तरह से अलग तरह के माहौल में रहकर घरेलू काम करने वाली इन लड़कियों को अनेक तरह से शोषण का सामना करना पड़ता है। यह सब कई वर्षों से चला आ रहा है।

पिछले सप्ताह सामने आई घटना, इस तरह के बर्बर हादसों की एक पुनरावृत्ति भर है।  मई, 2012 में समाचार चैनलों के जरिये हमने देखा था कि किस तरह नोएडा में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी 14 साल की नौकरानी को यातना देती थी। ऐसे आरोप सामने आए थे कि लड़की को रोजाना पीटा जाता था और उसे अपने मालिक के घर की चारदीवारी से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी।

सवाल यह है कि बार-बार इस तरह की घटनाएं सामने आने के बाद भी इन्हें दुरुस्त करने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं? घरेलू नौकरों के संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय कानून को पारित करने का प्रयास कहीं नहीं दिख रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) ने 2010 में घरेलू नौकरों के कल्याण और सामाजिक सुरक्षा अधिनियम का मसौदा तैयार किया था, लेकिन इस पर कोई प्रगति नहीं दिखाई दी। अपवादस्वरूप कुछ राज्यों - आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बिहार और केरल के अलावा घरेलू कामकाज करने वालों को राज्य के विशिष्ट न्यूनतम मजदूरी कानून के दायरे में नहीं रखा गया है। जिन राज्यों में न्यूनतम मजदूरी कानून है भी, वहां उसे ठीक से लागू नहीं किया जा सका है।

कम मजदूरी के साथ-साथ ऐसे लोगों को कई-कई घंटे और अनियमित तरीक से काम करना होता है। इन घरेलू नौकरों को साप्ताहिक छुट्टी, बीमारी, त्योहार और मातृत्व अवकाश जैसे अधिकारों से वंचित रखा जाता है। साथ ही पेंशन और बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा भी नहीं मिलती।  इन सबके अलावा सबसे बुरा पहलू यौन शोषण और शारीरिक प्रताड़ना का है। इन समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाए भी हैं पर वह भी आधे-अधूरे तरीके से। दो साल पहले भारत सरकार ने घोषणा की थी कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (आरएसबीवाई) की लाभार्थी सूची में घरेलू नौकरों को भी शामिल किया जाएगा।

यह योजना गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों के लिए एक स्वास्थ्य बीमा योजना है। पर लाभार्थियों को चिह्रित करने और उसके बाद योग्य लोगों को इसका लाभ दिलाने के लिए कोई व्यापक क्रियान्वयन तंत्र नहीं है। देश की कुल आबादी में अनुसूचित जनजातियों की भागीदारी आठ फीसदी है। संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जनजाति बाहुल्य कई सीटें सुरक्षित भी हैं। फिर भी इन क्षेत्रों के सांसदों और विधायकों ने शायद ही कभी उन अप्रवासी महिलाओं के हक की आवाज उठाई हो, जो घरेलू नौकरानी के रूप में काम करती हैं। आखिर ऐसा क्यों है? इसका जवाब बहुत कड़वा, लेकिन सीधा है कि ये लोग राजनीतिक रूप से महत्व नहीं रखते। ये लोग बिखरे हुए हैं।


जिन शहरों में ये लोग काम करते हैं वहां की मतदाता सूची में इनका नाम नहीं है। यह मध्य वर्ग जब खुद को असुरक्षित पाता है तो सड़कों पर उतर आता है। पर क्या यह वर्ग घरेलू नौकरों के शोषण के खिलाफ भी प्रदर्शन करेगा? क्या यह वर्ग घरेलू नौकरों के हक की सुरक्षा के उद्देश्य से कानून बनाने और उसे सख्ती से लागू करने के लिए दबाव बनाएगा?

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