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स्थायी शांति का मार्ग: स्वार्थ से छुटकारा पाने पर ही जीवन जीने योग्य होगा, दिशा स्वयं निर्धारित करें

Fri, 31 Jan 2025 05:35 AM IST
जेम्स ऐलन Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 31 Jan 2025 05:35 AM IST
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सार
अहंकार, लालसाओं पर विजय, मायामोह का त्याग और अंत:करण की शुद्धि करना ही स्थायी शांति का मार्ग है। अपनी इच्छाएं और भावनाएं अपने वश में रखिए। इसके अलावा शांति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
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path to permanent peace Life will be worth living get rid of selfishness decide the direction yourself
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस दुनिया में हर जगह कलह-क्लेश और अशांति देखने में आती है। किंतु इनके मध्य भी शांति का निवास है। जिस प्रकार समुद्र में बहुत-से ऐसे गहरे स्थान हैं, जहां तेज से तेज तूफान नहीं पहुंच सकता, उसी प्रकार मनुष्य के हृदय में भी शांति का नीरव स्थान है, जिस पर पाप और दुख का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। इस स्थान पर पहुंचकर शांति का अनुभव करने और बाहरी दुनिया के झगड़ों के बीच निर्लेप होकर काम करने का नाम शांति है। जब मनुष्य मानसिक विकारों से और संसार के कलह-क्लेशों से ऊब जाता है, तो वह निष्कलंक जीवन की ओर बढ़ने लगता है। इस प्रकार जीवन व्यतीत करने का नाम ही शांति है। घृणा से मनुष्य, मनुष्य से विमुख हो जाता है और वह दूसरों से दुर्व्यवहार करने लगता है।



घृणा से दो जातियों में अथवा दो राष्ट्रों में क्रूर युद्ध होता है। लेकिन तब भी मनुष्य पूरी तरह से यह जानते हुए भी कि ऐसा क्यों हो रहा है, पूर्ण प्रेम की छाया में थोड़ा-सा विश्वास रखता है। प्रेम की सृष्टि करके इसी आधार पर जीवन बिताना ही सच्ची शांति है। हृदय की शांति और हृदय का प्रेम ही स्वर्ग का राज्य है। किंतु लोगों को यह इस कारण कठिन मालूम होता है, क्योंकि वे अपने स्वार्थों को न तो छोड़ने के लिए तैयार हैं और न वे छोटे बच्चों की तरह एक-दूसरे से प्रेम ही कर सकते हैं। स्वर्ग का द्वार बड़ा तंग और छोटा है। दुनिया के भ्रमों में पड़े मूढ़ इसे नहीं देख सकते।


अहंकार, लालसा, लोभ और विलासिता इससे दूर ले जाने वाले हैं। मनुष्य शांति-शांति चिल्लाता है, किंतु उसके स्थान में उसे अशांति और लड़ाई-झगड़े दिखलाई पड़ते हैं। त्याग और विश्व-प्रेम से ही स्थायी शांति मिल सकती है, और दूसरे स्थानों में शांति नहीं मिल सकती। सुख-सुविधा, इच्छा-पूर्ति और सांसारिक सफलताओं से जो शांति मिलती है, वह असली शांति नहीं है। अग्नि-परीक्षा के समय वह कपूर की भांति उड़ जाती है। केवल हृदय की सच्ची शांति ही जीवन की कठिन घड़ियों में रह सकती है। ऐसी शांति का अनुभव वही लोग कर सकते हैं, जिन्होंने अपने हृदय से स्वार्थ को निकाल दिया है। पवित्र जीवन ही सच्ची शांति का मूल है, जो आत्मसंयम से प्राप्त होती है। आत्मसंयम से मनुष्य की बुद्धि प्रखर होती है और वह उससे प्रगति करता चला जाता है। ज्यों ही मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलना शुरू करता है, उसे कुछ शांति मिलने लगती है, किंतु उसे पूर्ण रूप से शांति तभी मिल पाती है, जब वह अहं को छोड़कर निर्दोष जीवन व्यतीत करने लगता है।

अहंकार पर विजय, जीवन की लालसाओं पर विजय, मायामोह का त्याग और अंत:करण की शुद्धि करना ही स्थायी शांति प्राप्त करना है। अपनी इंद्रियों को अपने वश में कीजिए और अपनी इच्छाएं और भावनाएं वश में रखिए। इसे छोड़कर शांति पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। यदि आप पवित्र और संयमित जीवन नहीं बिताएंगे, तो चाहे आप जितने देवी-देवताओं की पूजा करें और जितनी धार्मिक पुस्तकें पढ़ें, आपका यह सब काम व्यर्थ जाएगा।  

सूत्र- दिशा स्वयं निर्धारित करें
आपके पाप, दुख, भय और चिंता-यह सब आपके ही उत्पन्न किए हुए हैं। आप चाहे उनसे चिपके रहें या छोड़ दें। जीवन के झगड़ों से, मानसिक विकारों से अपने को अलग कीजिए, तभी आप सुखदायी शांति पा सकेंगे। हृदय के भीतर विश्राम-स्थल में प्रवेश कीजिए, जहां आप सुखमय शांति पा सकेंगे। अपने जीवन की दिशा खुद निर्धारित कीजिए।

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