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अमेरिका पर निर्भरता घटाने की राह: भारत को निर्यात के तेज प्रयास करने होंगे, अफ्रीका समेत किन हिस्सों में अवसर?

Tue, 06 Oct 2026 04:13 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Tue, 06 Oct 2026 04:13 AM IST
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सार
अमेरिका पर निर्भरता घटाने के लिए भारत को लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और प. एशिया में निर्यात बढ़ाने के प्रयासों में तेजी लानी होगी।
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path reducing reliance on US India must accelerate efforts to boost exports Many regions including Africa
अमेरिका पर निर्भरता घटाने की राह तलाश रहा भारत (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यकीनन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीति और टैरिफ संबंधी रणनीति के कारण इस समय अमेरिका और भारत के आर्थिक संबंध संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। 30 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच द्विपक्षीय रचनात्मक बातचीत हुई थी, पर हाल ही में अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) जैमीसन ग्रीर ने कहा कि भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौता जल्द होने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में, आगे का आर्थिक रास्ता चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है। अमेरिका के बढ़ते टैरिफ और सख्त आर्थिक नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था, निर्यातकों व पेशेवरों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।



उल्लेखनीय है कि पिछले माह ट्रंप ने रूसी तेल खरीदने वाले भारत-चीन समेत पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने वाले बिल पर हस्ताक्षर कर दिया है। हालांकि, यह कानून स्वचालित रूप से तुरंत टैरिफ लागू नहीं करता है। किस देश पर कितना टैरिफ लगाना है या राष्ट्रीय हित में किसे छूट देनी है, इसका अंतिम निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति के पास ही रहेगा। अमेरिका-चीन की नजदीकी भी भारत के लिए नई चुनौती बनती दिख रही है। शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान ट्रंप ने 10 जनवरी, 2027 तक चीन पर 100 प्रतिशत या अन्य कोई नया टैरिफ नहीं लगाने का आश्वासन दिया है, जबकि भारत के लिए यह चुनौती बनी हुई है।


एक तरफ जहां रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता है, वहीं अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। यदि अमेरिका भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू करता है, तो इससे भारतीय निर्यात को भारी झटका लग सकता है। इसके अलावा, हाल ही में एक आदेश के माध्यम से ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी वीजा पर लगाए गए एक लाख डॉलर के अतिरिक्त शुल्क को एक साल के लिए बढ़ा दिया है और वीजा नियमों को पहले से अधिक सख्त कर दिया है। हालांकि, इस भारी-भरकम शुल्क से उन विदेशी नागरिकों को राहत दी गई है, जो पहले से अमेरिका में छात्र वीजा एफ-1 पर रह रहे हैं या अपने मौजूदा वीजा का नवीनीकरण करा रहे हैं।

इस फैसले का सबसे गहरा असर भारतीय पेशेवरों, डॉक्टरों और आईटी कंपनियों पर पड़ेगा, क्योंकि कुल मंजूर एच-1बी वीजा में भारतीय मूल के लोगों की हिस्सेदारी करीब 71 प्रतिशत है। यही नहीं, ट्रंप प्रशासन ने एच-1बी और अन्य गैर-आप्रवासी वीजाधारकों की नौकरी छूटने के बाद मिलने वाली 60 दिन की मोहलत को खत्म करने का प्रस्ताव दिया है। यदि नया प्रस्ताव लागू होता है, तो नौकरी समाप्त होते ही कर्मचारी का वैध गैर-आप्रवासी दर्जा भी तुरंत खत्म हो जाएगा। ऐसे में, नई नौकरी मिलने पर भी उन्हें अमेरिका से बाहर जाकर दोबारा वीजा के लिए आवेदन करना पड़ सकता है। इसका सर्वाधिक असर भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ेगा, जो बड़ी संख्या में एच-1बी वीजा पर निर्भर हैं।

इसी प्रकार व्हाइट हाउस के ‘ऑफिस ऑफ ट्रेड एंड मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी’ की द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम रिपोर्ट में भारत समेत 40 से अधिक देशों पर चीन द्वारा अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए अवैध री-रूटिंग नेटवर्क का हिस्सा होने का आरोप लगाया गया है। भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि भारत में सख्त कस्टम्स नियम और मजबूत कानून लागू हैं। अमेरिकी प्रशासन द्वारा आयातित जेनेरिक औषधियों पर चरणबद्ध तरीके से एक अगस्त, 2026 से नई शुल्क नीति लागू कर दी गई है। हालांकि शुरुआती दो वर्षों के लिए आयातित दवाओं को शुल्क से मुक्त रखा गया है, ताकि अमेरिकी बाजार में दवा आपूर्ति बाधित न हो। लेकिन, एक अगस्त, 2029 के बाद इस शुल्क को बढ़ाकर 200 प्रतिशत के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा दिया जाएगा।

इस तरह बढ़ती आर्थिक और व्यापारिक चुनौतियों के बीच भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के तहत कृषि व एमएसएमई सहित अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के प्रति अत्यंत सतर्क रहना होगा। एक संतुलित और औपचारिक व्यापार समझौता भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों (जैसे औषधियां, रत्न एवं आभूषण, वस्त्र, मसाले और हस्तशिल्प) पर अमेरिकी शुल्क दरों को शून्य या न्यूनतम स्तर पर ला सकता है।

अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता घटाने के लिए लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया के गैर-पारंपरिक बाजारों में निर्यात का विस्तार करना जरूरी है। साथ ही, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ मुक्त व्यापार समझौतों को शीघ्र लागू करते हुए व्यापारिक विविधता सुनिश्चित करनी होगी।

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