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एक कवि का जाना
विश्वनाथ त्रिपाठी
Updated Tue, 20 Mar 2018 07:04 PM IST
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केदारनाथ सिंह
मेरे मित्र, मेरे सहपाठी कवि केदारनाथ सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। यह कहते हुए मेरा गला रुंध रहा है। यह मेरा दुर्भाग्य ही है कि अस्वस्थता की वजह से मैं उनके अंतिम दर्शन करने और उन्हें अंतिम विदाई देने भी नहीं जा सका। कवि केदारनाथ सिंह का जाना हिंदी कविता या हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य की एक बड़ी क्षति है।
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हमारा उनका बहुत लंबा साथ रहा। वर्ष 1954 में केदारनाथ सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एमए में दाखिला लिया। हालांकि मैंने उनसे एक वर्ष पहले ही दाखिला लिया था, लेकिन एक वर्ष मैंने पढ़ाई छोड़ दी थी, इसलिए केदारनाथ सिंह हमारे सहपाठी बने। उस समय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह और मैं, हम तीनों उनके शिष्य थे, इसलिए हम तीनों में काफी जमती थी। डॉ. नामवर सिंह ने मुझे और केदारनाथ सिंह को पढ़ाया है। अज्ञेय ने तीसरा सप्तक में केदारनाथ सिंह को छापा था। केदारनाथ सिंह के साथ होना हमारे लिए ईर्ष्या और गौरव की बात थी। केदारनाथ सिंह शुरू में गीत लिखते थे। उनके गीतों में ग्रामीण जीवन की लोकगंध थी, जो उनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह थी। हिंदी साहित्य का यह वह दौर था, जब कवि अपने गीतों में लोकजीवन और लोकलय को देसज शब्दों के माध्यम से रचते थे। वह जितना सुंदर गीत लिखते थे, उतना ही अच्छा उसे गाते भी थे और सुदर्शन तो थे ही। उनका एक गीत, जो उन दिनों काफी लोकप्रिय हुआ था, उसकी एक पंक्ति है-झरने लगे नीम के पत्ते/बढ़ने लगी उदासी मन की। इसी तरह एक और लोकप्रिय गीत है-रात पिया पिछवाड़े, पहरू ठनका किया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उनका यह गीत उन दिनों की चर्चित फिल्म बाबुल (नरगिस और दिलीप कुमार की) के गाने की तर्ज पर है। वह गाना था-पंछी वन में पिया-पिया गाने लगा।
केदारनाथ सिंह बहुत बड़े पढ़ाकू कवि थे। अंग्रेजी और उर्दू की कविताओं की वह विलक्षण विवेचना करते थे। बाद में वह नए ढंग की कविताएं लिखने लगे। उन्हीं दिनों उनकी एक नई कविता आई थी, जिसकी चंद पंक्तियां मुझे आज भी याद हैं-समुद्र वहां नहीं है/जहां दिन के सतरंगी घोड़े उतरते हैं/समुद्र हमारी धड़कनों में कैद है। यह उनकी कविताओं का नया रूप था। उन पर फ्रेंच कवि बादलेयर का काफी असर था। बांग्ला के जीवनानंद दास को उन्होंने काफी पढ़ा था।
फिर उनके जीवन में परेशानियां शुरू हो गईं। उनकी पत्नी कैंसरग्रस्त हो गईं। उनकी पांच बच्चियां थीं और एक लड़का। उन्हें बहुत बाद में नौकरी मिली। जिन दिनों नामवर सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष थे, उन्हीं दिनों उनकी नियुक्ति जेएनयू में हुई। हालांकि उन्हें अपनी प्रतिभा और विद्वता के बल पर नौकरी मिली थी। फिर वह अपनी संतानों को लेकर दिल्ली आए। उनके ऊपर पांच बच्चियों की शादी की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी और अपने जीवन में वह बहुत अकेले थे। पांच-पांच बेटियों की शादी को मैं इसलिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी कहता हूं कि जब दिनकर को ज्ञानपीठ सम्मान मिला था, और उनसे पूछा गया था कि आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, तो उन्होंने कहा था कि अपनी बेटियों की शादी करना मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। केदारनाथ सिंह ने बिना पत्नी के अकेले इस जिम्मेदारी को चुपचाप पूरा किया।
जेएनयू में आने के बाद और विश्व साहित्य का व्यापक अध्ययन करने के बाद उनकी कविताओं पर ब्रेख्त का प्रभाव पड़ा। उनकी एक कविता की पंक्ति है-और भाषा जो मैं बोलना चाहता हूं/ बल्कि दांतों के बीच की जगहों में सटी हुई है। उनकी एक और कविता की पंक्तियां याद आती है-पर सच तो यह है/ कि यहां या कहीं भी फर्क नहीं पड़ता। / तुमने जहां लिखा है 'प्यार'/ वहां लिख दो 'सड़क'/ फर्क नहीं पड़ता। मेरे युग का मुहावरा है : 'फर्क नहीं पड़ता'।
केदारनाथ सिंह ने अपने समकालीन कवियों को काफी प्रभावित किया। उनका अनुसरण करने वाले कवियों की एक बड़ी संख्या है। उन्हें हिंदी के लगभग सभी बड़े सम्मान मिले। वह हिंदी के बेहद सम्मानित कवि थे। कलाकार के लिए शैतानियत बहुत जरूरी चीज होती है। उसके बिना आप बनी-बनाई दुनिया को नहीं बदल सकते। लेकिन केदारनाथ सिंह ने उसका उपयोग अपनी कविता में नहीं किया, क्योंकि वह काफी व्यावहारिक एवं शरीफ कवि थे। उनकी एक कविता है-उसका हाथ/अपने हाथों में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को/ हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए। उनकी कविता में स्थानीयता का रंग बहुत ज्यादा मिलेगा। बनारस से उनका बहुत लगाव था। वह वहां रहे थे। बनारस का नाता कबीर से भी है। वहां दशाश्वमेध और मणिकर्णिका घाट है, जहां चौबीसों घंटे चिताएं जलती रहती हैं। मणिकर्णिका घाट पर बड़े-बड़े कलाकारों का रियाज चलता रहता है। बनारस में कोठे भी हैं, जिसका प्रभाव भारतेंदु और जयशंकर प्रसाद पर भी पड़ा। बनारस मनोरम और मिथकीय नगरी है। बनारस शीर्षक उनकी कविता की पंक्ति है-अद्भुत है इसकी बनावट/ यह आधा जल में है/ आधा मंत्र में/ आधा फूल में है/ आधा शव में/ आधा नींद में है/ आधा शंख में/ अगर ध्यान से देखो/ तो यह आधा है/ और आधा नहीं है। उनकी कविताओं में आपको नारे नहीं मिलेंगे। अपनी कविताओं में उन्होंने उद्दात्त मानवीय मूल्यों को स्थान दिया है।
व्यक्तिगत जीवन में वह बहुत अकेले थे, बेहद तन्हा। इस महानगर में हमारे जैसे मित्र भी थे, लेकिन हमारा घर दूर-दूर था, इसलिए ज्यादा मिल नहीं पाते थे। पत्नी की कमी की भरपाई न तो शराब से हो सकती है, और न ही प्रेमिकाओं से। कभी-कभी जब हमारी महफिल जमती थी और खाने-पीने के बाद वह जाने लगते थे, तो उनको जाते हुए देखना बहुत हृदय विदारक लगता था। कहा नहीं जा सकता था कि वह कहां जा रहे हैं। अब जबकि वह सचमुच चले गए हैं, तो उन्हीं की एक कविता को याद करते हुए कहना चाहता हूं कि जाना सबसे खौफनाक क्रिया है।