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दो बड़े लोकतंत्रों की साझेदारी

Mon, 24 Feb 2020 06:46 PM IST
Raman Singh सलमान हैदर
सलमान हैदर Published by: Raman Singh Updated Mon, 24 Feb 2020 06:46 PM IST
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Partnership between two big democracies
भारत में ट्रंप - फोटो : a

दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहली दो दिवसीय यात्रा पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की धरती पर पधारे हैं। 'अतिथि देवो भव' हमारे देश की संस्कृति का मूल मंत्र रहा है, इसलिए स्वाभाविक है कि अहमदाबाद पहुंचने पर उनका भव्य स्वागत किया गया। हालांकि इससे पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति भारत आए हैं, लेकिन इतने बड़े स्तर पर स्वागत समारोह हुआ हो, यह मुझे याद नहीं आता है। अगर हम चाहते हैं कि अपना मकसद हासिल करें, अपने हित को आगे बढ़ाएं, तो इस तरह की तैयारी करनी ही होगी। मुझे लगता है कि इससे भारत को फायदा हो सकता है।


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राष्ट्रपति ट्रंप की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब अमेरिका में जल्द ही राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। अमेरिका में गुजरात के लोगों की एक बड़ी आबादी रह रही है। दुनिया भर में गुजरातियों की व्यावसायिक विशेषज्ञता प्रसिद्ध है। इसके अलावा गुजरात हमारे प्रधानमंत्री मोदी का गृह राज्य भी है। मुझे लगता है कि इन्हीं सब चीजों को ध्यान में रखकर ट्रंप की यात्रा के पहले पड़ाव के लिए अहमदाबाद को चुना गया। दोनों नेताओं के व्यक्तिगत संबंधों की झलक हमें ह्यूस्टन में भी देखने को मिली थी, जहां दोनों हाथ में हाथ डालकर चल रहे थे। दोनों नेता अपने-अपने देश के पारंपरिक नेताओं से बिल्कुल अलग हैं और बेझिझक नए रास्ते पर चलते और जोखिम उठाकर भी नए कदम उठाते हैं।

निश्चित रूप से राष्ट्रपति ट्रंप की इस यात्रा से दोनों देश के दोस्ताना ताल्लुकात और मजबूत होंगे। दोनों देशों की कोशिश है कि द्विपक्षीय रिश्ते और आगे बढ़े। ट्रंप के रंगारंग स्वागत का मकसद यही संदेश देना है कि भारत अमेरिका को अपना विश्वसनीय दोस्त मानता है और इस रिश्ते को बहुत आगे ले जाना चाहता है। भारत यह दिखाना चाहता है कि यदि हमसे बेहतर रिश्ते बनाएं, तो न केवल हमारा फायदा है, बल्कि आपका भी फायदा है। दूसरी तरफ ट्रंप ने भी यह दिखाने की कोशिश की है कि अमेरिका भारत के साथ है और भारत से दोस्ती को और मजबूत करना चाहता है। हालांकि इस यात्रा से पहले उनकी तरफ से यह संकेत मिला था कि वह भारत में मानवाधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर भी चर्चा करेंगे। हालांकि भारत यह कहता रहा है कि यह हमारा अंदरूनी मामला है, लेकिन वे चाहेंगे कि हम उन्हें समझाएं कि भारत में इन दिनों जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है।

इसके अलावा भारत चाहेगा कि अमेरिका हमारे साथ व्यापारिक रिश्तों को आगे बढ़ाए और कोई व्यापार समझौता करे। साथ ही भारत यह भी चाहेगा कि विकास के जिसे रास्ते पर भारत आगे बढ़ रहा है, उसमें उसे अमेरिका का साथ मिले। जहां तक व्यापार समझौते की बात है, तो मुझे नहीं लगता कि इस यात्रा में इस मुद्दे पर कोई खास नतीजा निकलेगा।

इससे पहले के अनुभव भी बताते हैं कि जब भी व्यापार पर बात होती है, तो वह अंत-अंत तक चलती है और उसके बारे में जब तक कुछ ठोस निकलकर सामने नहीं आता, कुछ भी कयास लगाना मुश्किल है। हमें यह समझना होगा कि व्यापार के मामले में अमेरिकी बहुत चालाक हैं। हालांकि भारत की कोशिश होगी कि अमेरिका इस मामले में भारत को कुछ राहत प्रदान करे, लेकिन मुझे लगता है कि चूंकि अमेरिका में आगे चुनाव होने वाले हैं, इसलिए अगर उन्होंने इस मामले कुछ ढील दिखाई, तो वहां उनके अपने देश में नुक्ताचीनी बहुत होगी। हो सकता है कि इस मामले में थोड़ी-बहुत बात आगे बढ़े, लेकिन कोई खास फैसला होने की उम्मीद नहीं है। आज जब दोनों नेताओं की बात होगी, तभी ठीक-ठीक पता चल पाएगा। वैसे भी ट्रंप ने पहले ही संकेत दे दिया है कि वह भारत के साथ व्यापार समझौता करना चाहते हैं, लेकिन देखने वाली बात होगी कि वह कब होता है। दूसरी बात यह है कि रक्षा के मामले में हमारे ताल्लुकात बहुत आगे बढ़ने वाले हैं। मोटेरा स्टेडियम में अपने संबोधन में ट्रंप ने इसका संकेत भी दिया है। मुझे लगता है कि मोदी-ट्रंप की इस मुलाकात में रक्षा क्षेत्र में कुछ सौदे हो सकते हैं। इसका दोनों देशों को फायदा उठाना चाहिए।

इस मुलाकात के जरिये दोनों देश दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि दो बड़े लोकतंत्र अब एक साथ हैं। इससे भारत के विरोधी देशों, जैसे पाकिस्तान और चीन की मुश्किलें और बढ़ेंगी। ट्रंप ने सोमवार के अपने संबोधन में स्पष्ट तौर पर पाकिस्तान का नाम लेकर कहा कि हम पाकिस्तान के साथ सकारात्मक तरीके से काम कर रहे हैं, ताकि पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठनों को नष्ट किया जा सके। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अमेरिका और भारत ने मिलकर आतंकवाद को रोकने और उसकी विचारधारा से लड़ने का फैसला किया है। इसके साथ-साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि अगर भारत और अमेरिका साथ आ गए, तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व और विस्तारवादी नीतियों पर भी प्रभाव पड़ेगा। आज की बातचीत से मुझे यकीनी तौर पर लगता है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति पर भी बातें हो सकती हैं।

आज की मुलाकात को लेकर दोनों देशों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा है। लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप बातचीत की मेज पर बैठेंगे, तो मुझे लगता है कि वे रोजमर्रा के सवालों पर कम, बल्कि बड़े-बड़े सवालों पर ज्यादा गौर करेंगे कि वे किस तरह की दुनिया चाहते हैं। मसलन, हमारे पड़ोस में अफगानिस्तान के मुद्दे पर बात हो सकती है। ट्रंप अफगानिस्तान से अपनी सेना की वापसी चाहते हैं और वे चाहेंगे कि अफगानिस्तान को संभालने में भारत भी सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन भारत भी सोच-समझकर कदम बढ़ाएगा, क्योंकि हमें अच्छी तरह से पता है कि वहां किस तरह की चुनौतियां हैं।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि दो बड़े लोकतंत्र के दिग्गज नेताओं की मुलाकात से दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे और दोनों चाहेंगे कि अपने-अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए एक-दूसरे को आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। यकीनन सबकी नजरें आज की बातचीत पर टिकी है, लेकिन इतना तो तय है कि भारत-अमेरिकी रिश्ते में इस मुलाकात से और प्रगाढ़ता आएगी।

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