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शुचिता और सवाल: हंगामे और बहिष्कार के बीच खोता संवाद, संसद की परंपराओं पर गहराता संकट

Fri, 06 Feb 2026 06:16 AM IST
अमर उजाला Published by: देवेश त्रिपाठी Updated Fri, 06 Feb 2026 06:16 AM IST
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सार
संसद का बजट सत्र 2026 भी शीतकालीन सत्र की तरह ही हंगामेदार रहा है। केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोंक-झोंक की वजह से सदन की कार्यवाही लगातार बाधित होती रही। वहीं, पीएम मोदी के भाषण के बगैर ही लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया।
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parliamentary dignity under question pm modi reply opposition walkout motion of thanks to president address
संसद में विपक्ष का प्रदर्शन - फोटो : ANI

विस्तार

आज संसद को ऐसा दिन देखना पड़ा, जब विपक्ष की नारेबाजी और वॉकआउट के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण पर जवाब दिया और उससे पहले लोकसभा में भारी शोर-शराबे के बीच उनके भाषण के बगैर ही धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया। सरकार और विपक्ष के बीच यह तनातनी संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं और गरिमा के लिहाज से अत्यंत क्षोभजनक और चिंताजनक भी है।



उल्लेखनीय है कि 2004 के बाद यह पहली बार है, जब यह प्रस्ताव लोकसभा में प्रधानमंत्री के भाषण के बगैर पारित हुआ है। विपक्ष के सवाल उठाने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, अगर वे अवसर, सांविधानिक मूल्यों और संसदीय प्रक्रिया के अनुरूप हों। ऐसा होने पर सरकार भी उन सवालों के जवाब देने के लिए बाध्य होगी। बेवजह के हंगामे में मूल प्रश्न तो खो ही जाते हैं, सदन का कीमती समय भी नष्ट होता है।


संसद भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है, जहां राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा और धन्यवाद प्रस्ताव पारित करना दोनों सदनों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। परंपरागत रूप से प्रधानमंत्री बहस के अंत में जवाब देते हैं, जिसमें वे सरकार की उपलब्धियों का बचाव करते हैं, विपक्ष के आरोपों का खंडन करते हैं और भविष्य की दिशा स्पष्ट करते हैं। यह न केवल सदन की कार्यवाही को पूर्णता प्रदान करता है, बल्कि जनता को भी सरकार और विपक्ष, दोनों की स्थिति समझने का अवसर देता है।

संसद को चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार की होती है, पर सही मायनों में सदनों का सुचारु संचालन सरकार और विपक्ष, दोनों से परिपक्वता की मांग करता है। शोर-शराबा और वॉकआउट संसद को कमजोर ही करते हैं। नहीं भूलना चाहिए कि संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है, और ऐसी तस्वीरें देश-विदेश में लोकतंत्र की छवि को धूमिल तो करती ही हैं, संसदीय संस्कृति के क्षरण की ओर भी इशारा करती हैं। संसदीय लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब सभी दल नियमों का पालन करें, एक-दूसरे का सम्मान करें और जनहित को सर्वोपरि रखें।

विपक्ष की भूमिका सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, न कि सदन को ठप करना। दोनों को मिलकर ही संसद की गरिमा बहाल कर सकते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा और प्रधानमंत्री का जवाब लोकतंत्र की जीवंतता का प्रतीक है। अगर यह बाधित हो रहा है, तो यह सरकार और विपक्ष, सभी के लिए आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए। मूल सवाल संसद की शुचिता का है, वरना एकतरफा बहिष्कार और संवादहीनता की स्थिति कहीं नहीं ले जाएगी।

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