फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Parinirvan Diwas: Ambedkar's ideological legacy which shows the path of proper development

परिनिर्वाण दिवस : आंबेडकर की वैचारिक विरासत... जो दिखाती है सम्यक विकास का मार्ग

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Fri, 06 Dec 2024 06:26 AM IST
विज्ञापन
सार
डॉ. आंबेडकर दक्षिण-पंथ-वामपंथ, पुरातनता-आधुनिकता की प्रतिद्वंद्विता की अतियों के बीच ‘सम्यक-विकास’ का मार्ग निकाल कर लाए।               
 
loader
Parinirvan Diwas: Ambedkar's ideological legacy which shows the path of proper development
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

आज छह दिसंबर, डॉ. बीआर आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस है। उनके लिए शुक्रवार का एक और खास महत्व था। इस दिन उनके ‘अस्पृश्यता’ विरोधी आंदोलन के सहयोगी बाल गंगाधर तिलक के सुपुत्र ‘श्रीधरपंत बलवंत तिलक’ ने डॉ. आंबेडकर के नाम एक पत्र लिखकर शुक्रवार 25 मई, 1928 को आत्महत्या कर ली थी। डॉ. आंबेडकर ने बलवंत पर एक मृत्युलेख लिखा और उनके पत्र की छाया प्रति के साथ ‘दुनिया’ (मराठी सा.) 2 जून, 1928 के ‘तिलक’ विशेषांक में बताया कि वह ‘समाज समता संघ’ पूना के उपाध्यक्ष थे। अस्पृश्यता का अंत करना जरूरी मानते थे। इस कारण उन्हें ‘केसरी’ की पत्रकारिता से पहले ही बाहर कर दिया गया था। 



छह दिसंबर, 1956 को डॉ. आंबेडकर चले गए। दो दिन बाद ‘दैनिक मराठा’ के मुख्य पृष्ठ पर एक कविता उनको श्रद्धांजलि के साथ छपी, उसका हिंदी अनुवाद है, ‘अग्नि पर ही आजीवन प्रकाशित रहे, अग्नि पर ही चिर निद्रा ले रहे हो।/यह चिता तो बुझ जाएगी, परंतु तुम्हारा प्रकाश चिरंतन रहेगा।।’ चांद सितारों की तरह उनके विचारों का प्रकाश तो दसों दिशाओं में फैला है, परंतु सूरज की भांति तेज पूर्ण प्रकाश यदि है, तो वह ‘भारत का संविधान’ है। हाल ही में 75वां संविधान दिवस मनाया गया है। केंद्र तथा राज्य सरकारों में पक्ष-विपक्ष सबने संविधान के प्रति अपनी आस्था प्रकट की है। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष शब्द को मूल ढांचे का अंग’ मानते हुए प्रस्तावना से नहीं हटाए जाने की घोषणा करके संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि की पुष्टि की है। 


आंबेडकर और संविधान को अलग करके नहीं देखा जा सकता। डॉ. आंबेडकर दक्षिण-पंथ और वामपंथ, पुरातनता और आधुनिकता की प्रतिद्वंद्विता की अतियों के बीच ‘सम्यक-विकास’ का मार्ग निकाल कर लाए। विगत एक-डेढ़ दशक से संविधान और आंबेडकर को लेकर समसामयिक विमर्श अधिकाधिक तीव्र हुआ है। सरकार ने ऐसे कई संविधान संशोधन प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कराए हैं, जिसके बारे में डॉ. आंबेडकर का पक्ष विचारणीय है। इनमें दो संशोधन तो आरक्षण को लेकर हैं, जिनमें एक 103वां संविधान संशोधन 2019 ‘दस फीसदी आरक्षण’ को लेकर है। संविधान के प्रति पहला सम्मान तो, सांविधानिक पदों को रिक्त न छोड़ा जाना है। दूसरा, जिन नागरिकों की माली हालत अच्छी नहीं है, उन आम नागरिकों तक भी न्याय पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए। इस दिशा में संसद की सकारात्मक सक्रियता ही है, जो कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने संसद में लिखित उत्तर में बताया है, ‘सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक न्यायाधीशों के पांच हजार छह सौ ग्यारह (5,611) पद रिक्त पड़े हैं। ग्रामीण नागरिकों का सर्वाधिक वास्ता जिला न्यायालयों से ही होता है।’ 

सवर्ण गरीबों के लिए संविधान संशोधन संसद में सर्वसहमति से पास हुआ था। कांग्रेस, सपा, बसपा सहित वे दल, जो संविधान का रक्षक होने के दावे करते हैं और वर्तमान सरकार को संविधान विरोधी बताते हैं, उन्होंने इसे समर्थन दिया था। उसी तरह जब यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरात प्रश्न करते हैं कि एससी, एसटी में विभाजन करने से न्याय कैसे मिलेगा? शताब्दियों से अस्पृश्यता के शिकार वंचितों को समानता का लक्ष्य कैसे प्राप्त कराया जाएगा, तो कहीं से कोई उत्तर नहीं आता? एससी, एसटी में उपजाति वर्गीकरण आंबेडकर की संकल्पना के अनुकूल नहीं है। संविधान से इतर भी उनके विपुल साहित्य में इसके कोई संकेत नहीं मिलते। 

डॉ. आंबेडकर ने संविधान की मसौदा समिति के सक्रिय अध्यक्ष के रूप में अपनी सेहत की कुर्बानी दी। तथापि अपने इस महान कार्य को लेकर उन्होंने अपनी आलोचनात्मक दृष्टि नहीं बदली। वे किसी खुशफहमी का शिकार नहीं हुए, बल्कि उन्होंने न केवल संविधान, अपितु लोकतंत्र के भविष्य को लेकर भी अपनी आशंकाएं व्यक्त कीं। उन्होंने स्पष्ट कहा था, ‘संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो परिणाम अच्छे नहीं निकलेंगे।’ दूसरी आशंका उन्होंने बीबीसी के ब्रिटिश पत्रकार को दिए साक्षात्कार में व्यक्त की, ‘लोकतंत्र तो नाम के लिए ही रह जाएगा।’ 

आज देखना होगा कि संविधान को लेकर विमर्श किस दिशा में जा रहा है और लोकतंत्र के प्रति आंबेडकर की आशंकाएं सच तो नहीं होने जा रहीं। उन्होंने कहा था कि ‘मैंने तो संविधान निर्माण का दायित्व बहिष्कृत-वंचित वर्गों को अधिकार दिलाने के लिए लिया है।’ वह मानते थे कि सवर्णता की मनोवृत्ति दलित मुक्ति की राह को कभी आसान नहीं होने देगी। उनके जाने के बाद भय और असुरक्षा की अभिव्यक्ति भाषायी दलित साहित्य में तीव्रता से हुई। वैचारिक रूप से वह और अधिक सशक्त प्रेरणा-पुंज बने।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed